
पाक को जलाया, कश्मीर को बचाया? क्यों भारत के लिए 'जैकपॉट' साबित हुआ खामेनेई का 'कट्टर' ईरान
आज 2026 में, जब ईरान में फिर से बदलाव की बयार बह रही है, भारत को सतर्क रहने की जरूरत है। एक धर्मनिरपेक्ष लेकिन पाकिस्तान-परस्त नेतृत्व की वापसी भारत के लिए नई चुनौतियां ला सकती है।
आज जब ईरान की सड़कों पर रजा पहलवी की वापसी के नारे गूंज रहे हैं और इस्लामी गणतंत्र की नींव हिलती दिख रही है, तो भारत के कूटनीतिक गलियारों में एक पुरानी और अनकही हकीकत पर भी चर्चा हो रही है। इतिहास का यह विरोधाभास चौंकाने वाला है- एक उदारवादी शाह पाकिस्तान का 'सगा' था, जबकि एक कट्टरपंथी अयातुल्ला खामेनेई अनजाने में भारत के 'सुरक्षा कवच' बन गए।
1979 में जब अयातुल्ला खामेनेई की विचारधारा ने तेहरान की सत्ता संभाली, तो दुनिया को लगा कि यह कट्टरपंथ भारत के लिए खतरा होगा। लेकिन पिछले चार दशकों का लेखा-जोखा कुछ और ही कहानी कहता है। ईरान की उस क्रांति ने पाकिस्तान के अंदर एक ऐसी 'वैचारिक आग' लगा दी, जिसने पाकिस्तान को कश्मीर से ज्यादा अपनी ही हिफाजत में उलझा दिया।
इसे तीन प्रमुख परतों में समझा जा सकता है:
1. पाकिस्तान: प्रॉक्सी वॉर का 'ग्राउंड जीरो'
भारत के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ यह रहा कि 1979 के बाद पाकिस्तान इस्लाम का किला बनने के बजाय शिया-सुन्नी जंग का अखाड़ा बन गया।
दोहरी तलवार: जनरल जिया-उल-हक ने भारत के खिलाफ जेहाद के लिए जिस 'वहाबी/देवबंदी' विचारधारा को खाद-पानी दिया, उसे ईरान की शिया क्रांति ने सीधी चुनौती दी।
सऊदी-ईरान रस्साकशी: ईरान ने पाकिस्तान में 'तहरीक नफाज ए फिक्ह ए जाफरिया' (TNFJ) जैसे शिया संगठनों को समर्थन दिया। जवाब में, सऊदी अरब और जिया ने 'सिपाह-ए-सहाबा' जैसे उग्र सुन्नी संगठन खड़े कर दिए।
नतीजा: पाकिस्तान की सड़कों पर खून बहने लगा। कराची से लेकर लाहौर तक, मस्जिदें जंग के मैदान में बदल गईं। जो बंदूकें और संसाधन पूरी तरह से भारत की ओर मुड़ने को तैयार थे, वे आपस में ही एक-दूसरे पर तन गए।
2. कश्मीर: अल्पकालिक दर्द, दीर्घकालिक राहत
कश्मीर पर इसका प्रभाव एक जटिल पहेली जैसा रहा है। 90 के दशक में जब सोवियत संघ अफगानिस्तान से वापस गया, तो बेकार बैठे मुजाहिदीन को कश्मीर भेजा गया। यह भारत के लिए सबसे बुरा दौर था। लेकिन, तस्वीर का दूसरा पहलू 2000 के बाद सामने आया।
ध्यान भटकाव: पाकिस्तान जिस सांप्रदायिक सांप को दूध पिला रहा था, उसने अंततः उसी को डसना शुरू कर दिया। बलूचिस्तान की अस्थिरता और वजीरिस्तान में तालिबान के उभार ने पाकिस्तान आर्मी को अपनी ही पश्चिमी सीमा (ईरान-अफगानिस्तान बॉर्डर) पर व्यस्त कर दिया।
संसाधनों का बंटवारा: पाकिस्तान की सेना और ISI अपनी पूरी ताकत कश्मीर पर झोंकने में असमर्थ हो गई क्योंकि उनके अपने घर में (शिया-सुन्नी दंगों के रूप में) आग लगी हुई थी। भारत के लिए यह एक 'स्ट्रैटेजिक बफर' साबित हुआ। जैसा कि रक्षा विशेषज्ञ कहते हैं- अगर आपका दुश्मन अपनी ही बीमारी से लड़ रहा हो, तो सरहद पर उसकी पकड़ ढीली होनी तय है।
3. शाह बनाम अयातुल्ला: भारत का नफा-नुकसान
इतिहास गवाह है कि ईरान के शाह (रजा पहलवी के पिता) पाकिस्तान के बेहद करीबी दोस्त थे। 1965 और 1971 के युद्धों में शाह ने पाकिस्तान को लॉजिस्टिक मदद दी थी। लेकिन 1979 की क्रांति के बाद समीकरण पलट गए।
कट्टरपंथी होने के बावजूद, खामेनेई के नेतृत्व वाले ईरान ने कभी भी पाकिस्तान के साथ मिलकर 'सुन्नी इस्लामिक फ्रंट' नहीं बनाया। उलटा, ईरान और पाकिस्तान के बीच का अविश्वास भारत के लिए 'चाबहार पोर्ट' जैसे रास्तों को खोलने की वजह बना।

विरोधाभास: खामेनेई दोस्त नहीं, बस 'सुविधाजनक' पड़ोसी
ऐसा भी नहीं है कि अयातुल्ला खामेनेई का दिल भारत के लिए धड़कता था। कूटनीतिक गलियारों में यह याद रखा जाएगा कि खामेनेई ने कई मौकों पर कश्मीर और भारतीय मुसलमानों के मुद्दों पर नई दिल्ली को चुभने वाले बयान दिए। चाहे वह 2019 में अनुच्छेद 370 हटाने के बाद की आलोचना हो, या फिर हाल के वर्षों में भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर उनकी टिप्पणियां- तेहरान ने अपनी 'इस्लामिक उम्माह' की छवि बनाए रखने के लिए समय-समय पर भारत को निशाना बनाया। लेकिन कूटनीति का असली खेल यही था कि उनके 'शब्द' कड़े थे, मगर उनके 'कर्म' कभी पाकिस्तान के पक्ष में लामबंद नहीं हुए। उनकी आलोचना बयानबाजी तक ही सीमित रही, जबकि जमीनी हकीकत में उन्होंने पाकिस्तान के बजाय भारत के साथ आर्थिक और रणनीतिक संबंधों (जैसे चाबहार) को ही प्राथमिकता दी।
आज 2026 में, जब ईरान में फिर से बदलाव की बयार बह रही है, भारत को सतर्क रहने की जरूरत है। एक धर्मनिरपेक्ष लेकिन पाकिस्तान-परस्त नेतृत्व की वापसी भारत के लिए नई चुनौतियां ला सकती है। लेकिन इतिहास इस बात को दर्ज करेगा कि अयातुल्ला के 'कट्टर' ईरान ने पाकिस्तान के सामाजिक ताने-बाने को इतना कमजोर कर दिया कि वह भारत के लिए ऐसा 'अस्तित्व का खतरा' कभी नहीं बन पाया, जिसका सपना जनरल जिया ने देखा था। कुल मिलाकर भारत के लिए, ईरान की क्रांति एक ऐसा 'जैकपॉट' थी, जिसका टिकट भारत ने कभी खरीदा ही नहीं था।





