
युद्ध के मुहाने पर खड़ा ईरान, भारत ने चाबहार में छोड़ा नहीं है मैदान; फिर बजट से क्यों किया किनारा?
जानकारों का कहना है कि चाबहार के लिए बजट आवंटित ना करने का यह बिल्कुल मतलब नहीं है कि भारत चाबहार से पीछे हट रहा है। हालांकि अमेरिका के साथ बैलेंस बनाने के लिए एक ब्रेक की जरूरत थी। 2024 में ईरान के साथ हुआ समझौता आगे भी चलता रहेगा।
भारत के लिए रणनीतिक स्तर से बेहद अहम माने जाने वाले ईरान के चाबहार बंदरगाह में निवेश से सरकार ने इस बार हाथ पीछे खींच लिए हैं। भारत सरकार कई सालों से चाबहार के लिए कम से कम 100 करोड़ का बजट आवंटित करती थी। हालांकि आम बजट 2026-27 में एक पैसा भी चाबहार के लिए आवंटित नहीं किया गया है। जानकारों का कहना है कि इस साल के बजट में निवेश का आवंटन ना करने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि भारत चाबहार से मैदान छोड़ने जा रहा है बल्कि यह भी एक सोची-समझी रणनीति है जो कि वैश्विक स्तर पर संतुलन बनाने के लिए प्रयोग में लाई जा रही है।
चीन को मिलेगा फायदा?
भारत सरकार के इस फैसले को अलग-अलग ऐंगल से विश्लेषित किया जा रहा है। कई जानकारों का कहना है कि चाबहार सेअगर भारत की पकड़ ढीली होती है तो चीन इसपर हावी होने की कोशिश करेगा। वह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट तक पहुंच ही गया है। ईरान का चाबहार बंदरगाह भी पाकिस्तान की पूर्वी सीमा के करीब है। भारत इस खतरे को अच्छी तरहजानता है कि अगर वह चाबहार से पीछे हटता है तो चीन तुरंत वहां पकड़ मजबूत करेगा।
भारत ने कब शुरू किया था निवेश?
चाबहार में भारत ने निवेश 2017-18 में शुरू किया था। जानकारों का कहना है कि अमेरिकी प्रतिबंधों और आंतरिक कलह की वजह से ईरान कमजोर हो गया है। ऐसे में ईरान में ज्यादा निवेश भारत के लिए फायदेमंद नहीं है। दूसरी तरफ ईरान युद्ध के मुहाने पर खड़ा है। ऐसे में अगर अमरिका और ईरान के बीच युद्ध छिड़ता है तो चाबहार बंदरगाह को भी बड़ा नुकसान हो सकता है। भारत इसको लेकर कोई रिस्क नहीं लेना चाहता और इसलिए वह वेट ऐंड वॉच की भूमिका अख्तियार कर रहा है। ऐसा नहीं है कि भारत की तरफ से चाबहार पर खर्च करने पर विराम ही लग गया है। तनाव कम होने के बाद अगले साल फिर से बजट का आवंटन किया जा सकता है।
भारत के लिए कितना अहम है चाबहार
चाबहार में दो पोर्ट हैं। एक है शाहिद कलंतरी और दूसरा है शाहिद बहिश्ती। इसकी दूरी पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से मात्र 170 किलोमीटर है। अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक व्यापारिक पहुंच के लिए पाकिस्तान को बाइपास करने का भारत के पास यही एक रास्ता है। ऐसे में रणनीतिक और व्यापारिक स्तर पर यह बेहद मायने रखता है। यह पोर्ट इंटरनेशनल नॉर्थ-साथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर के लिए भी अहम है। इस रास्ते से भारत की पहुंच यूरोप तक भीआसान हो जाती है। साल 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ईरान गए थे और उन्होंने अफगानिस्तान, ईरान और भारत के बीच त्रिपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के लिए चाबहार पोर्ट को विकसित करने की बात कही थी और 5 5 करोड़ डॉलर निवेश करने का ऐलान कर दिया था। भारत अब तक शाहिद बहिश्ती टर्मिनल के विकास के लिए 20 मिलियन डॉलर दे चुका है। बजट अभी सिस्टम में है और इसलिए नए बजट की जरूरत भी नहीं थी।
अमेरिका के साथ बैलेंस भी जरूरी
जानकारों का कहना है कि भारत वॉशिंगटन के साथ बेवजह रार नहीं बढ़ाना चाहता। डोनाल्ड ट्रंप के स्वभाव से परिचित भारत केवल थोड़ा ब्रेक ले रहा है। अमेरिका ने भारत को चाबहार से ऑपरेशन बंद करने के लिए अप्रैल 2026 तक की छूट दी थी। ऐसे में संभव है कि भारत ने ट्रंप को साधने के लिए यह फैसला किया हो। 13 मई 2024 को ही भारत और ईरान के बीच शाहिद बहिश्ती टर्मिनल के 10 साल के संचालन के लिए समझौता किया गया था।
कई जानकारों का कहना है कि भारत चाबहार के संचालन से पीछे नहीं हटेगा। ईरान के साथ भारत के संबंध मजबूत हैं और भारत अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव पर नजर बनाए हुए है। 2016 में भारत ने ईरान के साथ 10 साल को जो समझौता किया था वह लगभग पूरा हो गया है। वहीं अब 2024 में किया गया समझौता आगे बढ़ेगा। शाहिद बहिश्ती टर्मिनल पर भारत अपनी पकड़ किसी भी कीमत पर ढीली नहीं होने देना चाहता है। ऐसे में जरूरत पड़ने पर भविष्य में बजट आवंटन से भी भारत पीछे नहीं हटेगा।





