
ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने के बेहद करीब सबसे बड़ा मुस्लिम देश, भारत दौरे पर हैं रक्षा मंत्री
ब्रह्मोस - भारत और रूस के संयुक्त उद्यम से विकसित मिसाइल दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में से एक है। इसकी रेंज 290 किलोमीटर से अधिक और यह भूमि, समुद्र तथा हवाई प्लेटफॉर्म से दागी जा सकती है।
भारत और इंडोनेशिया के बीच ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के संभावित निर्यात सौदे को आने वाले दिनों में बड़ा प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है। इंडोनेशिया के रक्षा मंत्री साफ्री समसुद्दीन बुधवार से भारत यात्रा पर हैं और इस दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को नई दिशा मिलने की संभावना है। ब्रह्मोस खरीद को लेकर वार्ता एडवांस स्टेज में है और रूस ने भी इस संभावित निर्यात पर सकारात्मक रुख दिखाया है। बता दें कि रूस भारत के साथ मिलकर ब्रह्मोस मिसाइल बनाता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ब्रह्मोस ने पाकिस्तान में अत्यंत सटीकता के साथ लक्ष्य भेदा था, जिससे इस हथियार प्रणाली की क्षमता पर इंडोनेशिया का भरोसा और मजबूत हुआ है।
भारत बन सकता है इंडोनेशियाई वायुसेना और नौसेना का MRO हब
ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक, रक्षा सहयोग के दायरे में भारत इंडोनेशियाई वायुसेना और नौसेना के लिए ‘मेंटेनेंस, रिपेयर एंड ओवरहॉल’ (MRO) हब के रूप में उभर सकता है। भारत पहले से ही सुखोई फाइटर जेट्स की देखरेख और तकनीकी सहयोग में महारत रखता है, और इंडोनेशिया के सुखोई बेड़े की सहायता भी कर रहा है।
प्रबोवो-मोदी शिखर वार्ता में ब्रह्मोस एजेंडे में शीर्ष पर
बता दें कि इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है। इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियान्तो और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच जनवरी में हुई शिखर वार्ता में ब्रह्मोस मिसाइल निर्यात शीर्ष मुद्दों में शामिल था। प्रबोवो इस वर्ष गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि थे। बैठक में प्रबोवो ने भारत के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र की प्रगति की सराहना की और भारतीय विशेषज्ञता के साथ इंडोनेशिया में घरेलू रक्षा उत्पादन बढ़ाने में रुचि जताई।
दोनों देशों ने संयुक्त रक्षा सहयोग समिति (JDCC) की मदद से रक्षा उद्योग में साझेदारी गहरी करने पर सहमति व्यक्त की। भारत ने इंडोनेशिया के चल रहे रक्षा आधुनिकीकरण कार्यक्रमों में तकनीकी और औद्योगिक सहयोग उपलब्ध कराने का वादा किया है।
ब्रह्मोस CEO की प्रबोवो से विशेष मुलाकात
जनवरी की यात्रा के दौरान एक अहम घटना तब हुई जब ब्रह्मोस के CEO डॉ. जैतीर्थ आर जोशी ने प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति प्रबोवो की उपस्थिति में इंडोनेशिया के उद्योगपतियों और रक्षा अधिकारियों से बातचीत की। कंपनी ने एक्स पर पोस्ट करते हुए बताया कि दोनों देशों के शीर्ष नेताओं ने रक्षा और सुरक्षा क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी पर विस्तृत चर्चा की।
इसके अलावा इंडोनेशियाई नौसेना के चीफ ऑफ स्टाफ, एडमिरल मुहम्मद अली के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने भारत में ब्रह्मोस फैसिलिटी का दौरा किया। यहां उन्हें सुपरसोनिक हथियार प्रणाली की क्षमताओं का विस्तृत परिचय कराया गया। दोनों पक्षों ने समुद्री सुरक्षा, रणनीतिक सहयोग और संभावित रक्षा साझेदारी पर विचार-विमर्श भी किया।
इंडोनेशिया की लंबे समय से ब्रह्मोस खरीदने में रुचि
प्रबोवो सुबियान्तो ने अपने रक्षा मंत्री कार्यकाल के दौरान ही ब्रह्मोस खरीदने में रुचि दिखाई थी, और अब राष्ट्रपति बनने के बाद इस दिशा में ठोस प्रगति होती दिख रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह सौदा अंतिम रूप लेता है, तो यह भारत के लिए रक्षा निर्यात के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक समीकरणों में एक महत्वपूर्ण बदलाव होगा।
साफ्री समसुद्दीन की यात्रा के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और प्रधानमंत्री मोदी से उनकी मुलाकात की संभावना है, जिससे ब्रह्मोस समझौते और द्विपक्षीय रक्षा सहयोग को निर्णायक दिशा मिल सकती है। भारत-इंडोनेशिया रक्षा साझेदारी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उभरते सुरक्षा परिदृश्यों के बीच नई ऊंचाइयों पर पहुंचती दिखाई दे रही है। भारत और इंडोनेशिया के बीच सभ्यतागत रिश्ते सदियों पुराने हैं। दोनों देश समुद्री पड़ोसी हैं, जो कई सदियों पुराने सांस्कृतिक, सभ्यता और ऐतिहासिक संबंध साझा करते हैं। हाल के दिनों में, दोनों देशों के बीच समग्र कूटनीतिक साझेदारी से अनेक क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग बढ़ा है।
ब्रह्मोस की बात करें तो यह भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और रूस के एनपीओ माशिनोस्त्रोएनिया के संयुक्त उद्यम से विकसित यह मिसाइल दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में से एक है। इसकी रेंज 290 किलोमीटर से अधिक, गति माच 2.8 और यह भूमि, समुद्र तथा हवाई प्लेटफॉर्म से दागी जा सकती है। अगर डील होती है तो यह सौदा फिलीपींस के बाद दक्षिण-पूर्व एशिया में ब्रह्मोस का दूसरा निर्यात होगा, जो 2022 में 375 मिलियन डॉलर के समझौते के तहत पूरा हो चुका है। वियतनाम और मलेशिया जैसे अन्य देश भी इस मिसाइल में रुचि दिखा रहे हैं।





