Explainer: इंदिरा गांधी का 2-2 बार हुआ था ममता बनर्जी जैसा हाल, कांग्रेस के इतिहास से सीखेंगी?

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आज जब ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं तो इंदिरा गांधी का यह इतिहास एक बड़ा सबक देता है। राजनीति में संगठन और पद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन अंतिम फैसला जनता की अदालत में होता है।

इंदिरा गांधी का 2-2 बार हुआ था ममता बनर्जी जैसा हाल, कांग्रेस के इतिहास से सीखेंगी?

दुख एक चक्र की तरह आता है और इसे चटाई की तरह समेटा नहीं जा सकता... ये शब्द देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के थे, जो उन्होंने 1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद अपने करीबी सहयोगियों द्वारा पाला बदलने पर कहे थे। उनकी जीवनी लिखने वाली पुपुल जयकर ने इंदिरा के इस गहरे दर्द को दर्ज किया था। उस समय आपातकाल के बाद देश में जनता पार्टी की लहर थी और कांग्रेस के बड़े-बड़े दिग्गजों ने मान लिया था कि इंदिरा गांधी का राजनीतिक करियर अब हमेशा के लिए खत्म हो चुका है। ऐसा ही कुछ उनके विरोधियों ने साल 1969 में भी सोचा था।

आज साल 2026 में इंदिरा गांधी के जीवन के ये दो किस्से अचानक भारतीय राजनीति के केंद्र में आ गए हैं। वजह है पश्चिम बंगाल की सियासत में आया भूचाल। इन दिनों राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी ही बनाई पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) पर से नियंत्रण खो रही हैं। तीन दशक पहले जिस पार्टी को ममता ने अपने खून-पसीने से सींचा था, आज उसी में बगावत हो चुकी है।

ममता बनर्जी का संकट और इंदिरा से तुलना

विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में बागी धड़े ने विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया है और इसे असली तृणमूल नाम देने की कवायद चल रही है। संसद में भी ममता के कई वफादार सांसद अब बागी गुट के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। ममता की पूर्व सहयोगी और सांसद काकोली घोष दस्तीदार का कहना है कि अब चुनाव आयोग तय करेगा कि असली तृणमूल कांग्रेस कौन सी है।

इस बीच सियासी गलियारों में यह सुगबुगाहट भी तेज है कि ममता बनर्जी अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में करने पर विचार कर रही थीं, हालांकि कांग्रेस नेतृत्व ने मैराथन बैठकों के बाद इन दावों को खारिज कर दिया है। अगर मौजूदा संकेतों को देखें तो ममता बनर्जी के हाथ से उनकी पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न भी निकल सकता है।

जाहिर है कि 1960 और 70 के दशक की कांग्रेस और आज की तृणमूल कांग्रेस में बड़ा अंतर है। इंदिरा गांधी और ममता बनर्जी के व्यक्तित्व और परिस्थितियां भी अलग हैं। लेकिन इतिहास खुद को दोहराता दिख रहा है। जब एक जननेता को उसकी ही बनाई गई पार्टी से बेदखल करने की कोशिश की जा रही हो तो तुलना अपरिहार्य हो जाती है। इंदिरा गांधी ने दो बार अपनी पार्टी खोई, दो बार नए धड़े बनाए और दोनों ही बार पहले से ज्यादा मजबूत होकर सत्ता में लौटीं।

1969: जब कांग्रेस के 'सिंडिकेट' से भिड़ गईं इंदिरा

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह किस्सा जनवरी 1966 से शुरू होता है, जब प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के असामयिक निधन के बाद कांग्रेस के ताकतवर क्षेत्रीय क्षत्रपों के समूह ने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद के लिए चुना। इस ग्रुप को सिंडिकेट कहा जाता था। इस सिंडिकेट में के. कामराज, एस. निजलिंगप्पा, अतुल्य घोष, एस.के. पाटिल और बीजू पटनायक जैसे कद्दावर नेता शामिल थे। वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी की किताब 'हाउ प्राइम मिनिस्टर्स डिसाइड' के अनुसार, इस सिंडिकेट की कांग्रेस संगठन पर फौलादी पकड़ थी। उन्हें लगा था कि मोरारजी देसाई की तुलना में इंदिरा गांधी को नियंत्रित करना आसान होगा। लेकिन उनका यह अनुमान जल्द ही गलत साबित हो गया। इंदिरा गांधी ने झुके बिना स्वतंत्र फैसले लेने शुरू कर दिए।

राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस का पहला विभाजन

साल 1969 में यह टकराव अपने चरम पर पहुंच गया। तत्कालीन राष्ट्रपति जाकिर हुसैन के निधन के बाद नए राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर इंदिरा और सिंडिकेट आमने-सामने आ गए। सिंडिकेट ने नीलम संजीव रेड्डी को कांग्रेस का आधिकारिक उम्मीदवार बनाया, जबकि इंदिरा गांधी ने उपराष्ट्रपति वी.वी. गिरि का समर्थन किया। इंदिरा ने सांसदों और विधायकों से अपनी अंतरात्मा की आवाज पर वोट करने की अपील की। वी.वी. गिरि चुनाव जीत गए और इसने सिंडिकेट के अहंकार को तोड़ दिया।

नाराज कांग्रेस अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा ने नवंबर 1969 में इंदिरा गांधी को पार्टी से निष्कासित कर दिया। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब 'द ड्रमैटिक डिकेड: द इंदिरा गांधी इयर्स' में लिखा है कि इस टकराव का नतीजा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के औपचारिक विभाजन के रूप में हुआ। पार्टी दो हिस्सों में बंट गई इंदिरा के नेतृत्व वाली कांग्रेस (R) और पुराने नेताओं की कांग्रेस (O)।

इंदिरा का दांव

पार्टी से निकाले जाने के बाद इंदिरा गांधी पीछे नहीं हटीं। उन्होंने खुद को हटाने वाले नेताओं की वैधता को ही चुनौती दे दी। प्रणब मुखर्जी के अनुसार, इंदिरा का मानना था कि मुट्ठी भर लोगों का जनता द्वारा चुनी गई नेता के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करना अहंकार है। संसद में भले ही शुरुआत में आंकड़े कांग्रेस (O) के पक्ष में दिख रहे थे और संगठन पर उनका कब्जा था, लेकिन इंदिरा के पास वो था जो दूसरों के पास नहीं था, अथाह जनसमर्थन। इंदिरा गांधी ने इसी दौरान एक बड़ा वामपंथी झुकाव लिया और जुलाई 1969 में 14 प्रमुख बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इस कदम ने उन्हें गरीबों के मसीहा के रूप में स्थापित कर दिया।

भले ही उन्होंने संसद में बहुमत खो दिया था और उन्हें सीपीआई (CPI) और द्रमुक (DMK) के भरोसे सरकार चलानी पड़ी, लेकिन जनता के बीच उनका जादू सिर चढ़कर बोल रहा था। असली परीक्षा 1971 के लोकसभा चुनावों में हुई, जिसे इंदिरा ने 'गरीबी हटाओ' के नारे के साथ अपने और सिंडिकेट के बीच सीधे मुकाबले में बदल दिया। नतीजा यह हुआ कि इंदिरा की कांग्रेस (R) ने चुनाव में बंपर जीत हासिल की और पुरानी कांग्रेस हाशिए पर चली गई।

1977: आपातकाल के बाद दूसरा निष्कासन

इंदिरा गांधी का दूसरा निष्कासन उनके राजनीतिक जीवन के सबसे बुरे दौर में हुआ। 1977 में आपातकाल के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा और केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी। कांग्रेस के भीतर ही इंदिरा को अलग-थलग करने की कोशिशें शुरू हो गईं। ब्रह्मानंद रेड्डी के नेतृत्व वाले कांग्रेस संगठन ने मान लिया कि पार्टी को बचाने के लिए इंदिरा से दूरी बनाना जरूरी है।

प्रणब मुखर्जी उस समय भी इंदिरा के वफादार थे। उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि राष्ट्रीय नेतृत्व के इशारे पर स्थानीय संगठन इंदिरा गांधी के कार्यक्रमों से दूरी बनाने लगे थे। उन्हें सामूहिक नेतृत्व का हिस्सा तक नहीं माना जा रहा था। लेकिन इंदिरा गांधी चुप बैठने वालों में से नहीं थीं। उन्होंने दिल्ली के कमरों से निकलकर सीधे जनता के बीच जाने का फैसला किया। 1977 में बिहार के बेलछी गांव में दलितों के खिलाफ भीषण जातीय हिंसा हुई। वह इलाका बाढ़ से घिरा हुआ था और वहां पहुंचना नामुमकिन था। लेकिन इंदिरा गांधी ने हार नहीं मानी। वह हाथी पर सवार होकर बाढ़ प्रभावित रास्ते को पार करते हुए पीड़ित दलित परिवारों से मिलने बेलछी पहुंच गईं।

हाथी पर सवार इंदिरा की इस तस्वीर ने पूरे देश का राजनीतिक माहौल बदल दिया। जनता को लगा कि उनकी परवाह करने वाली नेता वापस आ गई है। प्रणब मुखर्जी ने जिक्र किया है कि इस दौरे के बाद इंदिरा की सभाओं में भारी भीड़ उमड़ने लगी, जिसने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को यह विश्वास दिलाया कि इंदिरा के बिना पार्टी का कोई भविष्य नहीं है।

1978: कांग्रेस (आई) का जन्म

जब इंदिरा समर्थकों ने नेतृत्व परिवर्तन की मांग की तो तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष ब्रह्मानंद रेड्डी ने जनवरी 1978 में इंदिरा गांधी को एक बार फिर पार्टी से निकाल दिया। इसके जवाब में इंदिरा के समर्थकों ने नई दिल्ली में एक राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाया और इंदिरा गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष चुन लिया। पार्टी का फिर विभाजन हुआ और इस बार अस्तित्व में आई कांग्रेस (आई) यानी 'कांग्रेस इंदिरा'। करीब 54 सांसद इंदिरा के साथ आए। यह एक बड़ा राजनीतिक जुआ था, जो बेहद सफल रहा। महज दो साल के भीतर 1980 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी ने प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की और विरोधी धड़ा इतिहास के पन्नों में खो गया।

ममता बनर्जी के लिए सबक

इतिहासकार राजमोहन गांधी ने इंदिरा गांधी के बारे में कहा था कि कोई भी इतिहासकार 1980 में उनकी वापसी और विरोधी भीड़ के सामने अडिग खड़े रहने की उनकी क्षमता को नजरअंदाज नहीं कर सकता। आज जब ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं तो इंदिरा गांधी का यह इतिहास एक बड़ा सबक देता है। राजनीति में संगठन और पद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन अंतिम फैसला जनता की अदालत में होता है। इंदिरा गांधी की कहानी यह साबित करती है कि अपनी ही बनाई पार्टी खो देने का मतलब जनता को खो देना नहीं होता। क्या ममता बनर्जी भी इंदिरा गांधी की तरह जनता के भरोसे अपनी राजनीतिक जमीन वापस पा सकेंगी? यह देखना दिलचस्प होगा।

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Himanshu Jha

लेखक के बारे में

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बिहार के दरभंगा जिले से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु शेखर झा डिजिटल मीडिया जगत का एक जाना-माना नाम हैं। विज्ञान पृष्ठभूमि से होने के बावजूद (BCA और MCA), पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून के कारण उन्होंने IGNOU से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया और मीडिया को ही अपना कर्मक्षेत्र चुना।


एक दशक से भी अधिक समय का अनुभव रखने वाले हिमांशु ने देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों जैसे दैनिक भास्कर, न्यूज़-18 और ज़ी न्यूज़ में अपनी सेवाएं दी हैं। वर्तमान में, वे वर्ष 2019 से लाइव हिन्दुस्तान के साथ जुड़े हुए हैं।


हिमांशु की पहचान विशेष रूप से राजनीति के विश्लेषक के तौर पर होती है। उन्हें बिहार की क्षेत्रीय राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति की गहरी और बारीक समझ है। एक पत्रकार के रूप में उन्होंने 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों और कई विधानसभा चुनावों को बेहद करीब से कवर किया है, जो उनके वृहद अनुभव और राजनीतिक दृष्टि को दर्शाता है।


काम के इतर, हिमांशु को सिनेमा का विशेष शौक है। वे विशेष रूप से सियासी और क्राइम बेस्ड वेब सीरीज़ देखना पसंद करते हैं, जो कहीं न कहीं समाज और सत्ता के समीकरणों को समझने की उनकी जिज्ञासा को भी प्रदर्शित करता है।

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