
दिल्ली की ठंड में गर्माएगी ग्लोबल जियो-पॉलिटिक्स; भारत-रूस शिखर सम्मेलन पश्चिम के लिए है अलार्म?
23वीं भारत-रूस वार्षिक शिखर बैठक ऐसे वक्त हो रही है जब पश्चिमी देश, खासकर अमेरिका को लगता था कि वे भारत पर मॉस्को से दूरी बनाने का दबाव डालकर कामयाब हो जाएंगे। लेकिन इसके उलट मोदी और पुतिन कंधे से कंधा मिलाकर खड़े नजर आ रहे हैं।
दिसंबर में दिल्ली की सर्दी चरम पर होगी। ठिठुरन भरी ठंड के बीच ग्लोबल जियो-पॉलिटिक्स पूरी तरह गर्म रहेगी। क्योंकि दुनिया के दो सबसे बड़े नेता एक साथ नई दिल्ली में होंगे। दरअसल 23वीं भारत-रूस वार्षिक शिखर बैठक ऐसे वक्त हो रही है जब पश्चिमी देश, खासकर अमेरिका को लगता था कि वे भारत पर मॉस्को से दूरी बनाने का दबाव डालकर कामयाब हो जाएंगे। लेकिन इसके उलट भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पुतिन कंधे से कंधा मिलाकर खड़े नजर आ रहे हैं और दुनिया को साफ संदेश दे रहे हैं कि यह साझेदारी कम नहीं, बल्कि और मजबूत हो रही है।
बता दें कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दिसंबर में भारत आने वाले हैं। उनकी इस यात्रा को लेकर अभी से तरह-तरह के कयास लगने शुरू हो गए हैं। माना जा रहा है कि पुतिन का यह भारत दौरा किसी साधारण कूटनीतिक मुलाकात से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय सामानों पर 50 फीसदी तक टैरिफ लगाया और आरोप लगाया कि नई दिल्ली 'अप्रत्यक्ष रूप से रूस के युद्ध प्रयासों को फंडिंग कर रही है', तब भी भारत ने घुटने नहीं टेके।
प्रधानमंत्री मोदी ने भारत के संप्रभु ऊर्जा विकल्पों का पुरजोर बचाव किया और पुतिन ने मोदी के इस 'अपमान स्वीकार न करने' के रुख की तारीफ की। अब जब पुतिन दिल्ली पहुंचने वाले हैं, तो दांव पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गए हैं। दोनों देश एक ऐतिहासिक श्रम गतिशीलता समझौते पर हस्ताक्षर करने की तैयारी में हैं, जिससे हजारों कुशल भारतीय कामगारों को रूस में कानूनी और सुगम तरीके से काम करने का रास्ता खुलेगा।
रूस के लिए यह प्रतिबंधों से उपजी गंभीर श्रम कमी को पूरा करने का जरिया बनेगा, जबकि भारत के लिए प्रवास के नए अवसर पैदा होंगे। पश्चिमी देशों के लिए यह एक और झटका है कि उनके प्रतिबंध अपेक्षित रूप से काम नहीं कर रहे।
ऊर्जा सहयोग अब भी मुख्य मुद्दा बना हुआ है। अमेरिकी निगरानी के बावजूद 2025 में भारत रूस का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल खरीदार बन जाएगा और रियायती कीमतों से करीब 13 अरब डॉलर की बचत करेगा। शिखर बैठक आपूर्ति व्यवस्था को और मजबूत करेगी और डॉलर सिस्टम से बाहर भुगतान के तरीकों को बढ़ावा देगी, जिसमें रुपया-रूबल सेटलमेंट का विस्तार भी शामिल है।
शिखर सम्मेलन में रक्षा सहयोग भी केंद्र में रहेगा। रूस आज भी भारत का सबसे बड़ा सैन्य आपूर्तिकर्ता है और मॉस्को पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट SU-57 की तकनीक 'बिना किसी शर्त' ट्रांसफर करने की पेशकश कर रहा है। वाशिंगटन को शायद यह रास न आए, लेकिन भारत अपनी रक्षा स्वायत्तता के लिए भू-राजनीतिक मंजूरी से समझौता करने को तैयार नहीं है।
इन सबके बीच सबसे अच्छी बात यह है कि पश्चिमी प्रतिबंधों ने भारत-रूस संबंधों को और मजबूत ही किया है। 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड 68.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जो कोरोना महामारी से पहले की तुलना में लगभग छह गुना अधिक है। दोनों देशों ने स्थानीय मुद्रा में समझौतों और वस्तु-विनिमय प्रणाली (बार्टर सिस्टम) के माध्यम से पश्चिमी प्रतिबंधों को सफलतापूर्वक दरकिनार कर दिया है।





