भारतीय राजदूत ने अमेरिकी सांसद को दिया करारा जवाब, FCRA बिल पर दूर किए 5 भ्रम
इससे पहले अमेरिकी सांसद ने इस विधेयक को लेकर यह कहते हुए आपत्ति जताई है कि इससे ईसाई संस्था और चर्च प्रभावित होंगे। उनका यह भी कहना है कि इसका विदेशों से अल्पसंख्यकों को मिलने वाली सहायता प्रभावित होगी।

विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक यानी FCRA बिल को लेकर मचे सियासी और कूटनीतिक घमासान के बीच अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने सारे भ्रमों को दूर करने की कोशिश की है। साथ ही उन्होंने इस बिल पर सवाल उठाने वाले अमेरिकी सांसद को भी करारा जवाब दिया है। भारतीय राजदूत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में बताया है कि किस तरह इस बिल को लेकर लोगों में अलग-अलग भ्रम हैं और उनकी सच्चाई क्या है।
भारतीय राजदूत का यह पोस्ट अमेरिकी रिपब्लिकन सांसद राइली मूर के विवादित बयान के बाद सामने आया है। इससे पहले राइली मूर ने आरोप लगाया था कि यह कानून भारत सरकार को चर्चों और धार्मिक संस्थाओं की संपत्तियों पर कब्जा करने की इजाजत दे देगा। इसके बाद अब भारतीय राजदूत ने एक्स पर एक पोस्ट में बिल से जुड़े 5 इन भ्रमों को दूर किया है।
भ्रम 1: भारत नागरिक समाज की विदेशी मदद रोकने के लिए नया कानून ला रहा है।
सच्चाई: राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए विदेशी फंडिंग को रेगुलेट करना भारत का संप्रभु अधिकार है। भारत में FCRA कानून 1976 से लागू है। 2010, 2016, 2018 और 2020 में भी इनमें बदलाव किए जा चुके हैं। 2026 का बिल इसी कड़ी का अगला कदम है। कानून नियम का पालन करने वाले NGO को फंडिंग से नहीं रोकता।
भ्रम 2: FCRA से NGO और चैरिटी संगठनों का काम ठप हो जाएगा।
सच्चाई: भारत में विदेशी फंडिंग घटी नहीं, बल्कि बढ़ी है। 2010-11 में जहां लगभग 1.2 बिलियन डॉलर विदेशी फंड आया था, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 2.67 बिलियन डॉलर हो गया। भारत के 30 लाख से ज्यादा NGO में से केवल 14,450 के पास ही FCRA रजिस्ट्रेशन है, यानी अधिकांश NGO इससे पूरी तरह बाहर हैं।
भ्रम 3: नए कानून से चर्चों, अस्पतालों और स्कूलों की संपत्तियां जब्त कर ली जाएंगी
सच्चाई: रजिस्ट्रेशन रद्द होने पर संपत्ति राज्य सरकार के पास ट्रांसफर होने से जुड़ा नियम 2010 से लागू है। 2026 के बिल में बस एक डेजिग्नेटेड अथॉरिटी बनाई जा रही है जो इन संपत्तियों की सुरक्षा करेगी। अगर NGO अपना रजिस्ट्रेशन दोबारा हासिल कर लेता है, तो उसकी पूरी संपत्ति और फंड वापस मिल जाएगा। धार्मिक स्थलों की जमीन उसी धर्म के किसी दूसरे FCRA-रजिस्टर्ड संगठन को दी जाएगी।
भ्रम 4: यह कानून किसी खास धर्म या समुदाय को निशाना बना रहा है।
सच्चाई: यह दावा पूरी तरह से बेबुनियाद है। FCRA कानून बिना किसी धर्म, समुदाय या विचारधारा के भेदभाव के सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होता है।
भ्रम 5: भारत ऐसा कड़ा कानून बनाने वाला अकेला देश है।
सच्चाई: अमेरिका में 1938 से FARA और 2010 से FATCA लागू है। ऑस्ट्रेलिया ने 2018, कनाडा ने 2024 और ब्रिटेन ने जुलाई 2025 में ऐसा कानून लागू किया है। यूरोपीय संघ (EU) भी ऐसा ही कानून बना रहा है।
विदेश मंत्रालय ने भी दिया था जवाब
बता दें कि अमेरिकी सांसद राइली मूर ने भारत पर निशाना साधते हुए यह तक कह दिया था कि इस बिल से भारत-अमेरिका के रिश्तों पर असर पड़ सकता है। हालांकि भारत ने इस तरह की आपत्तियों को सिरे से खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को मीडिया ब्रीफिंग में इस बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में कहा कि यह भारत का आंतरिक मामला है। भारतीय प्रवक्ता ने कहा, “हमने इस मामले को देखा है। इस पर कई टिप्पणी आई है। जहां तक भारत के विधायी मामले का सवाल है यह हमारा आंतरिक विषय है जिसपर हमारी संसद निर्णय लेती है। मैं आपको यह भी बताना चाहता हूं कि दुनिया के कई ऐसे देश हैं जिसमें अमेरिका भी शामिल है जो विदेशी कोष और फंड को विनियमित करते हैं।"


