
कॉलेजियम सिस्टम बहुत जरूरी है क्योंकि… देश के भावी CJI ने कह दी बड़ी बात
संक्षेप: सुप्रीम कोर्ट के जज ने कहा है कि भारतीय संविधान में लचीलापन निहित है जो इसे समय के साथ विकसित होने की अनुमति देता है। उन्होंने यह भी कहा कि कॉलेजियम प्रणाली का आविष्कार बाद में नहीं हुआ बल्कि यह बेसिक स्ट्रक्चर का हिस्सा है।
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज और भारत के भावी मुख्य न्यायधीश जस्टिस सूर्यकांत ने हाल ही में कॉलेजियम सिस्टम को लेकर बड़ी बात कही है। जस्टिस सूर्यकांत ने बुधवार को एक कार्यक्रम में कहा है कि न्यायिक नियुक्तियों के लिए कॉलेजियम की प्रणाली बहुत अहम है। जस्टिस सूर्यकांत के मुताबिक भारतीय न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने और सरकार की तीनों शाखाओं के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए कॉलेजियम सिस्टम बहुत महत्वपूर्ण है।

भावी CJI श्रीलंका के सुप्रीम में 'जीवंत संविधान: भारतीय न्यायपालिका संविधानवाद को कैसे आकार देती है और उसकी रक्षा करती है' विषय पर व्याख्यान दे रहे थे। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने कहा, “भारत शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत के अमल का एक शानदार उदाहरण प्रस्तुत करता है। इसका एक प्रमुख उदाहरण उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में नियुक्तियों पर न्यायपालिका का अधिकार है।” न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि यह तंत्र न्यायालय के अंदर और बाहर, दोनों जगह, प्रशासनिक कार्यक्षमता के संबंध में न्यायपालिका की स्वायत्तता को संरक्षित करता है।
जस्टिस कांत ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता उसे समाज की लोकतांत्रिक कल्पना को आकार देने और लोकतांत्रिक जीवन के वास्तुकार के रूप में कार्य करने की अनुमति देती है। उन्होंने कहा, "अगर शक्तियों का पृथक्करण भारत के संवैधानिक लोकतंत्र का ढांचा है, तो न्यायिक समीक्षा उसकी धड़कन है।"
जस्टिस सूर्यकांत ने आगे ज्यूडिशियल रिव्यू जैसे मुद्दों पर भी राय रखी। उन्होंने कहा कि न्यायिक समीक्षा के तहत भारतीय न्यायपालिका को संवैधानिक पदाधिकारियों द्वारा लिए गए निर्णयों सहित, शासन के प्रत्येक अंग द्वारा किए गए कार्यों की संवैधानिकता की जांच करने की गहन शक्ति सौंपी गई है। उन्होंने कहा कि न्यायिक समीक्षा यह सुनिश्चित करती है कि शासन का कोई भी कार्य न्यायिक निगरानी के दायरे से बाहर न रहे।
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, "समीक्षा की यह व्यापक शक्ति भारत के संवैधानिक लोकतंत्र की आधारशिला और हमारे मूल ढांचे का एक हिस्सा है, जो इस बात की पुष्टि करती है कि वैधानिकता और संवैधानिकता सार्वजनिक शक्ति के प्रयोग की मूलभूत पूर्वशर्तें हैं।" उन्होंने कहा, "इसलिए, न्यायिक समीक्षा केवल एक प्रक्रियात्मक सुरक्षा नहीं है; यह जवाबदेही, वैधानिकता और संवैधानिक मानदंडों की सर्वोच्चता के प्रति एक ढांचागत प्रतिबद्धता है।"





