CJP आंदोलन के दौरान सरकार ने किया अच्छा काम; UN में हुई तारीफ; चीन-पाक को मिली सलाह
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख ने इस दौरान कई देशों के दमनकारी तरीकों को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में अधिकारियों ने विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए अत्यधिक घातक बल का प्रयोग किया।

दिल्ली में हाल ही में पेपर लीक के खिलाफ छात्रों का प्रदर्शन हुआ था। इसका नेतृत्व कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने की थी। इसके बाद केंद्र सरकार ने सीजेपी नेताओं से वार्ता कर उनकी तीन प्रमुख मांगें मान ली और इसके बाद छात्रों का आंदोलन खत्म हुआ। छात्र आंदोलन को लेकर सरकार की प्रतिक्रिया पर अब संयुक्त राष्ट्र ने भी तारीफ की है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क ने कहा कि युवा नेताओं के साथ बातचीत करना, बल के अत्यधिक इस्तेमाल की तुलना में कहीं ज्यादा असरदार तरीका है।
बीते 7 सितंबर को जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 63वें सत्र को संबोधित करते हुए तुर्क ने भारत का उदाहरण देते हुए बताया कि सरकारों को सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों और युवाओं के नेतृत्व वाले आंदोलनों पर कैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए। तुर्क ने कहा, "भारत में हाल के छात्र आंदोलन ने दिखाया है कि सबसे अच्छी प्रतिक्रिया युवा नेताओं के साथ बातचीत है न कि बल का अत्यधिक इस्तेमाल। शांतिपूर्ण विरोध, अभिव्यक्ति की आजादी और मौलिक अधिकार सरकारों और उनके नागरिकों के बीच भरोसा बनाने के लिए जरूरी है।''
पाकिस्तान और चीन को लेकर जताई चिंता
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख ने इस दौरान कई देशों के दमनकारी तरीकों को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में अधिकारियों ने विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए अत्यधिक घातक बल का प्रयोग किया। इस दौरान मनमाने ढंग से आंदोलनकारियों को हिरासत में लिया। तुर्क ने चीन को लेकर भी गंभीर चिंताएं जताईं। उन्होंने कहा कि वह वहां मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर बहुत परेशान हैं।
उन्होंने चीनी अधिकारियों से राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी कानूनों की समीक्षा करने, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा मजबूत करने और मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों की जांच करने का आग्रह किया है। उन्होंने चीन में तिब्बती लोगों के अधिकारों, खासकर उनकी धार्मिक आजादी पर बढ़ती पाबंदियों की ओर भी ध्यान दिलाया और ऐसी नीतियों को तुरंत बदलने की मांग की है।
ईरान की दमनकारी नीति का विरोध
तुर्क ने कई अन्य देशों में दमन की आलोचना की। उन्होंने ईरानी अधिकारियों पर दमन बढ़ाने का आरोप लगाया और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े आरोपों में फांसी की सजाओं में तेजी से हुई बढ़ोतरी का जिक्र किया। उन्होंने निकारागुआ में विपक्षी दलों पर पाबंदियों, रूस में राजनीतिक विरोध को दबाने और अजरबैजान, जॉर्जिया, ट्यूनीशिया और युगांडा जैसे देशों में मीडिया की आजादी पर बढ़ती पाबंदियों की ओर भी इशारा किया।
तुर्क की बातों ने भारत को उन देशों से बिल्कुल अलग खड़ा किया जहां विरोध और असहमति का सामना बल और दमन से किया जाता है। उन्होंने युवा प्रदर्शनकारियों के साथ जुड़ाव और बातचीत को उन सरकारों के लिए एक रचनात्मक मॉडल बताया जो जनता की नाराजगी का सामना कर रही हैं।


