
अमेरिकी F-35 या रूसी Su-57 नहीं, फ्रांस के राफेल ही क्यों खरीद रहा भारत? पाक से ज्यादा चीन निशाना
राफेल डील पर कीमत को लेकर आलोचनाएं हो सकती हैं, लेकिन सैन्य नजरिए से देखें तो यह एक 'मैच्योर डिसीजन' प्रतीत होता है। भारत ने 'सुपरपावर' (F-35) के ग्लैमर के बजाय 'सर्वाइवेबिलिटी' और 'रिलायबिलिटी' (राफेल) को चुना है।
भारतीय वायुसेना और नौसेना के लिए लड़ाकू विमानों की खरीद अब केवल 'हथियार खरीदने' तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह भारत की बदलती भू-राजनीति का सबसे बड़ा सबूत है।
जब भारत ने फ्रांस से 26 राफेल-मरीन (नौसेना के लिए) और अतिरिक्त राफेल (वायुसेना के लिए) खरीदने का मन बनाया, तो रक्षा गलियारों में एक सवाल गूंजा- जब बाजार में 5वीं पीढ़ी का अमेरिकी F-35 और रूसी Su-57 मौजूद हैं, तो हम 4.5 पीढ़ी के राफेल पर ही क्यों रुके हैं?
इसका जवाब तकनीकी कम और रणनीतिक ज्यादा है। भारत का निशाना अब इस्लामाबाद नहीं, बीजिंग है और चीन से निपटने के लिए आपको सिर्फ 'स्टील्थ' नहीं, 'भरोसा' और 'संप्रभुता' चाहिए। आइए, इसे विस्तार से समझते हैं।
पाकिस्तान नहीं, चीन है 'सेंटर स्टेज' में
दशकों तक भारत की रक्षा खरीद का पैमाना यह होता था कि- क्या यह पाकिस्तान के F-16 से बेहतर है? लेकिन राफेल डील इस मानसिकता के अंत की घोषणा है।
पाकिस्तान की वायुसेना अब चीन के J-10C और JF-17 पर निर्भर है, जिनसे निपटना भारत के लिए बहुत बड़ी चुनौती नहीं है। असली चुनौती हिमालय के उस पार है- चीन की PLAAF (पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स) और उसका J-20 स्टील्थ फाइटर।
लद्दाख और अरुणाचल की ऊंची पहाड़ियों में लड़ाई के नियम बदल जाते हैं। यहां विमान की 'कागजी स्पीड' नहीं, बल्कि 'कोल्ड स्टार्ट' क्षमता और 'पेलोड कैपेसिटी' (हथियार ले जाने की क्षमता) मायने रखती है। राफेल को विशेष रूप से भारतीय जरूरतों के तहत ढाला गया है, जो लेह की जमा देने वाली ठंड में भी चीन के J-20 पर भारी पड़ने का माद्दा रखता है।
अमेरिकी F-35: दुनिया का बेस्ट, लेकिन भारत के लिए 'रिस्की'
अमेरिका का F-35 लाइटनिंग-II निस्संदेह दुनिया का सबसे उन्नत फाइटर जेट है। लेकिन भारत ने इसे क्यों नहीं चुना?
डेटा संप्रभुता: F-35 सिर्फ एक जहाज नहीं, उड़ता हुआ कंप्यूटर है। इसका डेटा लिंक अमेरिका के केंद्रीय सर्वर से जुड़ा रहता है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अपनी 'न्यूक्लियर कमांड' और संवेदनशील सामरिक डेटा को अमेरिकी निगरानी में नहीं रख सकता। भारत नहीं चाहेगा कि युद्ध के वक्त उसका 'किल स्विच' किसी और के हाथ में हो।
भरोसे का संकट: अतीत में अमेरिका ने F-16 के स्पेयर पार्ट्स रोककर पाकिस्तान को खूब परेशान किया। इसने भारत के हाथ बांधने की भी कोशिश की थी। इसके विपरीत, फ्रांस का रिकॉर्ड बेदाग है। वह भारत के किसी भी युद्ध (चाहे कारगिल हो या बालाकोट के बाद के हालात) में हथियार सप्लाई नहीं रोकता।
रूसी Su-57: पुराना दोस्त, लेकिन अब कमजोर
रूस भारत का सबसे बड़ा रक्षा साझेदार रहा है, लेकिन Su-57 (Felon) दो वजहों से रेस से बाहर हुआ:
यूक्रेन युद्ध: रूस खुद युद्ध में फंसा है। उसकी अपनी सप्लाई चेन टूटी हुई है। भारत ऐसे समय में किसी ऐसे जहाज पर दांव नहीं लगा सकता जिसके स्पेयर पार्ट्स मिलने की गारंटी न हो।
स्टील्थ पर सवाल: कई एविएशन एक्सपर्ट्स का मानना है कि Su-57 की रडार से बचने की क्षमता अमेरिकी या चीनी जेट्स के मुकाबले कमजोर है।
राफेल की 'ब्रह्मास्त्र' क्षमता: मीटियोर और स्कैल्प
राफेल को चुनने की सबसे बड़ी वजह उसका 'हथियार पैकेज' है, जो चीन की नींद उड़ाने के लिए काफी है:
मीटियोर (Meteor) का खौफ: यह दुनिया की सबसे घातक 'बियोंड विजुअल रेंज' (BVR) मिसाइल है। इसकी 'नो एस्केप जोन' 60 किमी से ज्यादा है। इसका मतलब है कि एक भारतीय पायलट सीमा पार किए बिना, 100 किमी दूर उड़ रहे चीनी जेट को मार गिरा सकता है। चीन की PL-15 मिसाइल अभी इस विश्वसनीयता तक नहीं पहुंची है।
स्कैल्प: यह 500 किमी तक मार करने वाली क्रूज मिसाइल है। हिमालय की पहाड़ियों की आड़ लेकर उड़ता हुआ राफेल, तिब्बत में मौजूद चीनी रडार और एयरबेस को तबाह कर सकता है।
महत्वपूर्ण पहलू: फ्रांस ने राफेल को परमाणु हथियार ले जाने के लिए भी मॉडिफाई करने की छूट दी है। अमेरिका अपने F-35 या F-18 के साथ ऐसी 'आजादी' कभी नहीं देता। यह भारत की 'सामरिक स्वायत्तता' के लिए अनिवार्य था।
लॉजिस्टिक्स का अर्थशास्त्र: 'एक तीर से दो शिकार'
भारत ने वायुसेना के बाद अब नौसेना के लिए भी राफेल-M को चुना है। अमेरिकी F/A-18 सुपर हॉर्नेट रेस में था, लेकिन राफेल की जीत के पीछे 'कॉमनलिटी' का तर्क था।
खर्च में कटौती: जब वायुसेना और नौसेना दोनों एक ही तरह का जहाज उड़ाएंगे, तो पायलटों की ट्रेनिंग, स्पेयर पार्ट्स, इंजन मेंटेनेंस और मिसाइलों का खर्च 40-50% तक कम हो जाएगा।
इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार: भारत के पास अंबाला और हाशिमारा में पहले से राफेल की मरम्मत और देखरेख का इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है। नया जहाज लेने का मतलब होता- अरबों डॉलर का नया सेटअप।
आलोचनाओं के बीच निर्णय
राफेल डील पर कीमत को लेकर आलोचनाएं हो सकती हैं, लेकिन सैन्य नजरिए से देखें तो यह एक 'मैच्योर डिसीजन' प्रतीत होता है। भारत ने 'सुपरपावर' (F-35) के ग्लैमर के बजाय 'सर्वाइवेबिलिटी' और 'रिलायबिलिटी' (राफेल) को चुना है। चीन के साथ तनाव के बीच, भारत को एक ऐसा घोड़ा चाहिए था जो न सिर्फ तेज दौड़े, बल्कि जिसकी लगाम पूरी तरह भारत के हाथ में हो। फ्रांस का राफेल यही सुरक्षा देता है।





