I Love Modi... लेकिन पीठ पीछे वार! क्या बेअसर रहा मार्को रुबियो का भारत दौरा?

लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के भारत दौरे के बीच ट्रंप प्रशासन की सख्त वीजा और व्यापार नीतियों ने तनाव बढ़ा दिया है। जानिए भारतीय पेशेवरों पर इसका क्या असर होगा।

I Love Modi... लेकिन पीठ पीछे वार! क्या बेअसर रहा मार्को रुबियो का भारत दौरा?

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का चार दिवसीय भारत दौरा भले ही कूटनीतिक मुस्कान और गर्मजोशी से भरा दिखा हो, लेकिन इसके पीछे ट्रंप प्रशासन की सख्त नीतियों का साया स्पष्ट रूप से नजर आया। एच-1बी वीजा और ग्रीन कार्ड नियमों में हो रही सख्ती, व्यापारिक टैरिफ और रूस के साथ भारत के ऊर्जा समझौतों पर अमेरिकी दबाव का सीधा असर भारतीय पेशेवरों के भविष्य और देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। इसके अलावा, पाकिस्तान के प्रति अमेरिका के बदलते रुख ने भी नई दिल्ली की भू-राजनीतिक चिंताओं को बढ़ा दिया है।

इसीलिए कहा जाता है कि कूटनीति की दुनिया में जो मंच से दिखता है, असलियत अक्सर उससे बिल्कुल अलग होती है। एक तरफ मंच से "आई लव मोदी" के नारे गूंज रहे हैं, तो दूसरी तरफ बंद कमरों में 'अमेरिका फर्स्ट' के नाम पर व्यापारिक दबाव की भारी राजनीति चल रही है।

ट्रंप का 'आई लव मोदी' और अमेरिकी स्वतंत्रता का 250वां जश्न

नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास में जब अमेरिका की स्वतंत्रता की 250वीं वर्षगांठ ('फ्रीडम 250') का भव्य जश्न मनाया जा रहा था, तो माहौल पूरी तरह से भारत-अमेरिका दोस्ती के रंग में रंगा था। एआर रहमान की शानदार प्रस्तुति के बीच इस कार्यक्रम का सबसे बड़ा आकर्षण वह पल था, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप फोन (वर्चुअल) के जरिए इस कार्यक्रम से जुड़े।

उन्होंने भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर का नाम लेते हुए कहा: सर्जियो, आपको हमारे देश का प्रतिनिधि बनना होगा, लेकिन मैं बस सभी को नमस्ते कहना चाहता हूं। आई लव पीएम मोदी। मोदी बहुत महान हैं। वह मेरे दोस्त हैं। भारत हम पर शत-प्रतिशत भरोसा कर सकता है।

कैमरे के सामने यह बयान दो देशों के बीच अटूट दोस्ती और व्यक्तिगत केमेस्ट्री का प्रमाण लगता है, लेकिन कूटनीतिक और आर्थिक मामलों के जानकारों के लिए यह महज एक शानदार 'पीआर' स्टंट है, क्योंकि पर्दे के पीछे की कहानी रुबियो और भारतीय नेतृत्व की बैठकों में लिखी जा रही थी।

भारत-अमेरिका रिश्तों में जमी बर्फ: क्या हैं मुख्य कारण?

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, हालिया कूटनीतिक मुलाकातों के बावजूद, यह स्पष्ट है कि दोनों देशों के बीच संबंधों में पहले जैसी सहजता नहीं है। एक साल पहले उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के दौरे को भारतीय मीडिया में जो भारी तवज्जो मिली थी, वह रुबियो के दौरे में नदारद रही।

रुबियो को भारतीय और अमेरिकी पत्रकारों के कड़े सवालों का सामना करना पड़ा। इसमें ट्रंप की वह सोशल मीडिया पोस्ट भी शामिल थी, जिसमें उन्होंने भारत को "हेलहोल" कहे जाने का समर्थन किया था। हालांकि रुबियो ने सार्वजनिक रूप से संबंधों को 'बेहद मजबूत' बताया, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट नजर आती है।

इमिग्रेशन और वीजा नीतियों का भारतीयों पर असर

अमेरिका में काम करने का सपना देखने वाले भारतीयों के लिए ट्रंप प्रशासन की नीतियां एक बड़ा झटका साबित हो रही हैं। जब रुबियो भारत में थे, उसी वक्त वाशिंगटन में ग्रीन कार्ड प्रोग्राम में बदलाव की रूपरेखा तैयार की जा रही थी।

इससे पहले अमेरिका ने एच-1बी वीजा प्रोग्राम पर भी कई प्रतिबंध लगाए हैं। इन वीजा कार्यक्रमों के सबसे बड़े लाभार्थी भारतीय आईटी पेशेवर ही रहे हैं। इन सख्त नियमों से अमेरिका में बसने और काम करने की प्रक्रिया भारतीयों के लिए और भी जटिल हो जाएगी।

रूस के साथ ऊर्जा व्यापार पर अमेरिकी दबाव

भारत और रूस के गहरे रक्षा और आर्थिक संबंध अमेरिका की आंखों में खटकते रहे हैं। ट्रंप प्रशासन ने सस्ते रूसी तेल की खरीद पर कड़ी आपत्ति जताते हुए आरोप लगाया है कि इससे व्लादिमीर पुतिन को यूक्रेन युद्ध के लिए फंड मिल रहा है।

दूसरी ओर, भारत ने हमेशा अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दी है। हाल ही में ईरान युद्ध के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे भारतीय रुपया भी रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया है। ऐसे में भारत के लिए सस्ते तेल की आपूर्ति एक आर्थिक मजबूरी है।

मुद्दाअमेरिकी रुख (ट्रंप प्रशासन)भारत का पक्ष
इमिग्रेशन/वीजाग्रीन कार्ड और H-1B नियमों में भारी सख्ती लागू करना।भारतीय पेशेवरों और टैलेंट के हितों की रक्षा की उम्मीद।
रूस-यूक्रेन युद्धरूसी तेल खरीद पर आलोचना और कड़े प्रतिबंधों की चेतावनी।ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि, विशेषकर ईरान संकट के बाद बढ़ी जरूरत।
पाकिस्तान से रिश्तेमध्यस्थता की कोशिशें और पाकिस्तान के साथ करीबी बढ़ाना।ट्रंप के दावों का खंडन, आतंकवाद पर कड़े रुख की वकालत।

ट्रंप का पाकिस्तान प्रेम और भारत की चिंताएं

भारत के लिए शायद सबसे ज्यादा नुकसानदायक कदम अमेरिका का पाकिस्तान के प्रति नरम रुख रहा है। पिछले साल भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव के बाद ट्रंप प्रशासन ने दोनों देशों के बीच युद्धविराम कराने का दावा किया था, जिसे भारत ने सिरे से खारिज कर दिया।

भारत की आपत्तियों के बावजूद, अमेरिकी राष्ट्रपति ने पाकिस्तान के साथ करीबी संबंध विकसित किए हैं। ईरान वार्ता में मध्यस्थता के लिए इस्लामाबाद पर निर्भरता बढ़ाकर अमेरिका ने कूटनीतिक रूप से पाकिस्तान का कद बढ़ाने की कोशिश की है। इसी विवाद से बचने के लिए पीएम मोदी ने हाल के दिनों में ट्रंप के साथ सार्वजनिक बैठकों से दूरी बनाए रखी है।

"पीठ पीछे वार" : $500 बिलियन का व्यापारिक जाल

ट्रंप मंच से भले ही प्रधानमंत्री मोदी की जमकर तारीफ कर रहे हों, लेकिन उनकी व्यापारिक नीतियां भारत के लिए "पीठ पीछे वार" जैसी साबित हो रही हैं। अमेरिका ने अपने 10% के एकतरफा ग्लोबल टैरिफ को लगभग सभी व्यापारिक भागीदारों पर लागू कर रखा है (जिसका नुकसान भारत को भी हो रहा है)। इसके बावजूद, अमेरिका भारत पर दबाव बना रहा है कि वह अगले पांच वर्षों में अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर (लगभग 41 लाख करोड़ रुपये) के विमान, ऊर्जा, तकनीक और कृषि उत्पाद खरीदे।

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह डील भारत के लिए बहुत महंगी और 'अजीब' है। जब अमेरिका भारत को टैरिफ में कोई विशेष छूट नहीं दे रहा है, तो भारत का यह भारी-भरकम 'कमिटमेंट' सिर्फ और सिर्फ अमेरिकी अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचाने और ट्रंप के वोट बैंक को खुश करने के लिए है।

क्या बेअसर रहा मार्को रुबियो का भारत दौरा?

उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के पिछले साल के भारत दौरे (जिसकी भारतीय टीवी पर जबर्दस्त कवरेज हुई थी) की तुलना में रुबियो का यह दौरा काफी फीका रहा। रुबियो से भारतीय और अमेरिकी पत्रकारों ने दोनों देशों के रिश्तों में आई गिरावट और पिछले महीने ट्रंप द्वारा सोशल मीडिया पर भारत को "नर्क" कहे जाने को लेकर तीखे सवाल पूछे।

सार्वजनिक मंचों पर रुबियो ने इस बात से इनकार किया कि उनका दौरा "खराब हो चुके रिश्तों को सुधारने" के लिए है। उन्होंने जोर देकर कहा कि दोनों देशों के संबंध अभी भी "बहुत मजबूत" हैं। नई दिल्ली के अधिकारियों और विश्लेषकों का नजरिया इससे बिल्कुल अलग है। उनका मानना है कि यह दौरा पिछले एक साल से चले आ रहे भारी तनाव को कम करने की एक कोशिश मात्र है और दोबारा भरोसा जीतने के लिए अमेरिका को ठोस कदम उठाने होंगे।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि रुबियो के बयानों और ट्रंप प्रशासन की असली नीतियों में जमीन-आसमान का अंतर है।

कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के दक्षिण एशिया कार्यक्रम के निदेशक मिलन वैष्णव इस स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहते हैं: "रुबियो के कई बयान खोखले लगे... एक तरफ वह रणनीतिक महत्व की बात कर रहे थे, जो पिछले 25 वर्षों से हर अमेरिकी विदेश मंत्री करता आया है। लेकिन दूसरी तरफ, उनकी इन बातों और मौजूदा प्रशासन की वास्तविक नीतियों के बीच भारी विरोधाभास है।"

सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के वरिष्ठ सलाहकार रिक रोसो ने भी इस साल को द्विपक्षीय संबंधों के लिए चुनौतीपूर्ण बताया है। उन्होंने कहा, "भारत-अमेरिका रिश्तों के लिए यह साल बेहद क्रूर (ब्रूटल) रहा है। इस दौरे से गेम बदलने वाला कोई भी ठोस नतीजा नहीं निकला।"

तमाम असहजताओं के बावजूद, दोनों देशों के बीच ऊर्जा और व्यापार के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई है। आने वाले हफ्तों में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर भारत का दौरा करने वाले हैं, जहां एक अंतरिम व्यापार समझौते पर मुहर लग सकती है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अमेरिका की यह कूटनीतिक 'गर्मजोशी' जमीन पर ठोस नीतियों में कैसे तब्दील होती है और भारत अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता किए बिना इन चुनौतियों से कैसे निपटता है।

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Amit Kumar

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डिजिटल पत्रकारिता की बदलती लहरों के बीच समाचारों की तह तक जाने की ललक अमित कुमार को इस क्षेत्र में खींच लाई। समकालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पैनी नजर रखने के साथ-साथ अमित को जटिल विषयों के गूढ़ विश्लेषण में गहरी रुचि है। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के रहने वाले अमित को मीडिया जगत में एक दशक का अनुभव है। वे पिछले 4 वर्षों से लाइव हिन्दुस्तान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।


अमित न केवल समाचारों के त्वरित प्रकाशन में माहिर हैं, बल्कि वे खबरों के पीछे छिपे 'क्यों' और 'कैसे' को विस्तार से समझाने वाले एक्सप्लेनर लिखने में भी विशेष रुचि रखते हैं। डिजिटल पत्रकारिता के नए आयामों, जैसे कि कीवर्ड रिसर्च, ट्रेंड एनालिसिस और एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन को वे बखूबी समझते हैं। उनकी पत्रकारिता की नींव 'फैक्ट-चेकिंग' और सत्यापन पर टिकी है। एक मल्टीमीडिया पत्रकार के तौर पर अमित का सफर देश के प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ रहा है। उन्होंने अमर उजाला, वन इंडिया, इंडिया टीवी और जी न्यूज जैसे बड़े मीडिया घरानों के साथ काम किया है।


अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।

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