बंगाल में ही दफ्तर खोलकर ममता बनर्जी की TMC के 20 सांसद खींचे, छोटी NCPI का बड़ा गेम

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पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला। रविवार को ही पार्टी के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने पूर्वोत्तर राज्य के एक छोटे से दल NCPI में विलय कर लिया है। साथ ही NDA को समर्थन देने का ऐलान किया है।

बंगाल में ही दफ्तर खोलकर ममता बनर्जी की TMC के 20 सांसद खींचे, छोटी NCPI का बड़ा गेम

TMC टूट रही थे, ये बात पहले ही स्पष्ट हो चुकी थी। पर बड़ा झटका तब लगा जब पश्चिम बंगाल में 2 दशकों तक ताकतवर रही तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने ऐसी पार्टी में विलय कर लिया, जिसका नाम लोगों ने नहीं सुना था। इस पार्टी की पहचान थी NCPI यानी नेशनल सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया। जिस पार्टी का नाम छोटा, एक चुनाव चिह्न तक नहीं, उसने ममता बनर्जी के गढ़ बंगाल में ही बनकर और फिर पनपकर उन्हीं की बनाई टीएमसी में सेंध लगा दी।

पहले समझें हुआ क्या था

TMC के बागी सांसदों का विलय तो 14 जून को हुआ, लेकिन कहा जाता है कि इसकी कहानी की शुरुआत 10 जून से हो गई थी। दरअसल, तब NCPI के उपाध्यक्ष उतिया कुंडू ने ममता बनर्जी और सांसद अभिषेक बनर्जी की एक तस्वीर पोस्ट की थी। इसमें लिखा था, 'अहंकार ही पतन का कारण बनता है। जब हाथ में सत्ता होती है, तो कई बार लोग भूल जाते हैं कि ताकत स्थायी नहीं होती और लोगों का समर्थन ही असली शक्ति है...।'

कट टू संडे यानी 14 जून। बागी गुट के सांसद एकजुट होते हैं और लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मिलते हैं। इनकी मुलाकात ऐसे ही नहीं हुई, बल्कि एक खास मांग के साथ हुई थी संसद में उन्हें अलग बैठने की जगह दी जाए। साथ ही इन सांसदों का कहना था कि गुट NCPI में शामिल हो रहा है और आगे चलकर NDA का समर्थन करेगा।

यहां से ‘नई टीएमसी’ की कहानी शुरू होती है। हालांकि, अब तक साफ नहीं है कि गुट कब तक चुनाव आयोग से मिलकर नाम और चुनाव चिह्न की मांग रखेगा। यह भी स्पष्ट नहीं हो सका है कि क्या गुट नई पहचान के साथ राजनीति में कदम रखेगा।

अब थोड़ा फ्लैशबैक में जाते हैं। 13 मई को कुंडू ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के साथ एक तस्वीर शेयर थी। तब बंगाल में लिखा था, 'सपने देखने के दिन अब खत्म हुए और उन्हें पूरा करने का समय आ गया है। श्री शुभेंदु अधिकारी की जीत की यात्रा मंगल हो। बंगाल का कण-कण आपके संकल्प से नई ऊर्जा से भर जाए।'

बंगाल में ही बनी NCPI

पहले तो समझें कि यह एक RUPP दल है। अब आसान भाषा में जानें तो इसका फुल फॉर्म Registered Unrecognized Political Party या ऐसे दल से होता है, जो या तो नई है या अब तक चुनाव में इतने वोट और सीट हासिल नहीं कर सकी है कि इसे क्षेत्रीय या राष्ट्रीय दल का दर्ज मिल सके। कई बार ऐसा भी होता है कि जो दल कभी चुनाव नहीं लड़ा होता, उसे RUPP माना जाता है।

दिलचस्प बात है कि कभी उम्मीदवार नहीं जिता सकी इस पार्टी का मुख्यालय पश्चिम बंगाल में ही है। ECI यानी भारत निर्वाचन आयोग के आंकड़े बताते हैं कि इसका मुख्यालय हावड़ा में है। मजेदार बात यह भी है कि इस दल का मुख्यालय भले ही कागजों में बंगाल हो, लेकिन जो थोड़ा बहुत समर्थन है, वो पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में है। यहां पार्टी स्थानीय चुनावों में अपने उम्मीदवार खड़े करती है। इसके अलावा यह दल असम में भी सक्रिय है। तीनों ही राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है।

छोटा दल पर नहीं आएगी कानूनी अड़चन, समझें कैसे

NCPI दल भले ही छोटा और मान्यता प्राप्त नहीं है, लेकिन एक बात TMC के बागी सांसदों के पक्ष में जा सकती है। इसमें विलय करने से बागी गुट को कानूनी अड़चनें आने के आसार कम हैं। इसकी वजह है कि पहला तो दो तिहाई समर्थन हासिल है। वहीं, दूसरा NCPI चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड पार्टी है।

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Nisarg Dixit

लेखक के बारे में

Nisarg Dixit

निसर्ग दीक्षित न्यूजरूम में करीब एक दशक का अनुभव लिए निसर्ग दीक्षित शोर से ज़्यादा सार पर भरोसा करते हैं। पिछले 4 साल से वह लाइव हिनुस्तान में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं, जहां खबरों की योजना, लेखन, सत्यापन और प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं। इससे पहले दैनिक भास्कर और न्यूज़18 जैसे बड़े मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क तक की भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की, जिसने उनके काम करने के तरीके को व्यावहारिक और तथ्य आधारित बनाया। निसर्ग की खास रुचि खोजी रिपोर्टिंग, ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ स्टोरीज़ में है। वे जटिल मुद्दों को सरल भाषा और स्पष्ट तथ्यों के साथ प्रस्तुत करने में विश्वास रखते हैं। राजनीति और जांच पड़ताल से जुड़े विषयों पर उनकी मजबूत पकड़ है। निसर्ग लोकसभा चुनावों, कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और अहम घटनाओं को कवर कर चुके हैं। साथ ही संसदीय कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों को नियमित रूप से कवर करते हैं। गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी निसर्ग योगदान देते हैं।

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