तय समय में इंसाफ नहीं कर पा रहीं फास्ट-ट्रैक अदालतें? 1 साल में फैसले का था नियम
देश की फास्ट-ट्रैक अदालतों में न्याय की रफ्तार सुस्त पड़ गई है। रेप और पॉक्सो के 2.5 लाख केस पेंडिंग हैं। 2025 में दर्ज 1.4 लाख मामलों में से केवल 66.5 हजार ही निपटाए जा सके। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन के बीच नीट पेपर लीक के दोषियों को सजा देने के लिए केंद्र सरकार ने फास्ट-ट्रैक अदालतें बनाने की घोषणा की है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर फास्ट-ट्रैक अदालतें कितना फास्ट यानी तेजी से काम करती हैं और उनका पिछला रिकॉर्ड कैसा है।
देश भर में रेप और पॉक्सो एक्ट से जुड़े मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए बनाए गए फास्ट-ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSCs) खुद सुस्ती का शिकार हो रहे हैं। इन विशेष अदालतों का मुख्य उद्देश्य अपराध का संज्ञान लेने के एक साल के भीतर ट्रायल पूरा करना था, लेकिन ताजा आंकड़ों के मुताबिक मामलों के निपटारे की रफ्तार उम्मीद से काफी धीमी है।
उम्मीद से बहुत कम है मामलों के निपटारे की रफ्तार
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में रेप और पॉक्सो के 1.4 लाख से ज्यादा मामले दर्ज किए गए, लेकिन इनमें से केवल 66,500 मामलों का ही निपटारा हो सका। 31 दिसंबर 2025 तक इन फास्ट-ट्रैक अदालतों में पेंडिंग मामलों की कुल संख्या बढ़कर 2.5 लाख तक पहुंच गई।
2019 में जब से इन विशेष अदालतों का गठन हुआ है, तब से पिछले सात सालों में पेंडिंग केस का आंकड़ा लगातार 2 लाख के आसपास बना हुआ है, जबकि योजना के तहत ट्रायल को एक तय समयसीमा में पूरा करना अनिवार्य है।
योजना की मियाद 30 सितंबर तक बढ़ी
कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने गुरुवार को संसद में एक लिखित जवाब में बताया कि इस योजना को दो बार बढ़ाया जा चुका है। 790 फास्ट-ट्रैक विशेष अदालतों की स्थापना के लिए पिछला विस्तार 31 मार्च 2026 तक लागू था, जिसे अब बढ़ाकर इस साल 30 सितंबर तक कर दिया गया है। उच्च न्यायालयों से मिली जानकारी के मुताबिक, अप्रैल महीने तक 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 775 फास्ट-ट्रैक कोर्ट काम कर रहे थे। इन कार्यरत अदालतों में 398 विशेष ई-पॉक्सो अदालतें भी शामिल हैं।
केंद्र और राज्य 60:40 के अनुपात में उठाते हैं खर्च
इन अदालतों का खर्च केंद्र और राज्य सरकारें 60:40 के अनुपात में उठाती हैं। इस फंड से हर फास्ट-ट्रैक कोर्ट के लिए एक न्यायिक अधिकारी (जज) और सात सपोर्ट स्टाफ की सैलरी के साथ-साथ कोर्ट के रोजमर्रा के खर्चों को भी कवर किया जाता है।
कानून मंत्री के मुताबिक, योजना के शुरू होने से लेकर अब तक केंद्र सरकार अदालतों के सुचारू संचालन के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 1,260 करोड़ रुपये का अनुदान जारी कर चुकी है।
जजों की भर्ती राज्यों और हाईकोर्ट की जिम्मेदारी
कानून मंत्री ने बताया कि उन्होंने सभी मुख्यमंत्रियों और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को पत्र लिखकर पॉक्सो एक्ट और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत तय समयसीमा का सख्ती से पालन करने और समय पर उचित कदम उठाने की बात कही है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि फास्ट-ट्रैक कोर्ट समेत जिला और अधीनस्थ अदालतों में जजों की भर्ती करना और खाली पदों को भरना पूरी तरह से राज्यों और संबंधित उच्च न्यायालयों (HCs) की जिम्मेदारी है।


