सिया ने जहां केतन अग्रवाल को उतारा मौत के घाट, दिलचस्प है उस लोहागढ़ किले का इतिहास; पूरी कहानी
Ketan Agarwal Murder Case: महाराष्ट्र का लोहागढ़ किला इन दिनों रियल एस्टेट कारोबारी केतन अग्रवाल के मर्डर की वजह से सुर्खियों में बना हुआ है। इस किले का इतिहास करीब 2000 साल पुराना माना जाता है। यहां सातवाहन, चालुक्य, राष्ट्रकूट, मराठा और मुगलों का आधिपत्य रहा है।

Lohagad Fort Murder Case: पुणे के रियल एस्टेट कारोबारी केतन विशाल अग्रवाल के मर्डर ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। 26 साल के केतन अपने परिवार की पसंद से शादी करने और खुशनुमा जिंदगी के सपने देख रहे थे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि जिस सिया गोयल को वह अपना जीवनसाथी बनाने का सपना देख रहे हैं वह उनकी जीवन लीला ही समाप्त कर देगी। फिलहाल पुलिस इस मामले की जांच कर रही है और चेतन चौधरी और सिया गोयल दोनों ही पुलिस हिरासत में हैं। जब यह केस चर्चा में आया, तब से एक ऐतिहासिक किला भी लोगों की जबान पर आ गया है। वह है लोहागढ़ किला। कभी सातवाहनों, चालुक्यों की शान रहे इस किले का इतिहास छत्रपति शिवाजी महाराज से भी मिलता है। प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर यह किला स्थानीय और देश के पर्यटकों के लिए एक आकर्षण का केंद्र है।
केतन अग्रवाल मर्डर केस के बाद यह किला अब चर्चा में हैं, तो आइए जानते हैं क्या है इस ऐतिसाहिक किले की कहानी...
लोहागढ़ का इतिहास 2000 साल से भी ज्यादा पुराना
महाराष्ट्र के लोनावाला क्षेत्र में सह्याद्री पर्वतमाला फैली हुई है। यह पूरी पर्वतमाला महाराष्ट्र की प्राकृतिक सुंदरता को और भी ज्यादा खूबसूरत बनाता है। इसी सह्याद्री पर्वतमाला की वादियों में लोनावला के पास बना हुआ है खूबसूरत लोहागढ़ किला। इतिहासकारों की मानें तो यह किला किस वंश ने शुरुआती तौर पर बनवाया इसकी सटीक जानकारी नहीं है। हालांकि, सबसे पहले इस किले पर सातवाहन वंश का अधिकार होने का सबूत मिलता है। अपने अनोखे स्वरूप और प्राकृतिक सुरक्षा से भरपूर इस किले को सातवाहनों के बाद चालुक्य, राष्ट्रकूट, यादव, मुगल और मराठाओं का भी आधिपत्य रहा।
क्यों पड़ा लोहागढ़ नाम?
इस किले का नाम लोहागढ़ इसलिए नहीं पड़ा कि इसकी दीवारें लोहे से बनी हुई हैं। बल्कि इसलिए पड़ा क्योंकि इस किले को जीत पाना बेहद ही मुश्किल काम है। आस पास बड़ी खाई और बीच में संकरा रास्ता इस किले को और भी ज्यादा मजबूत बनाता है। ऐसा कहते हैं कि शिवाजी महाराज ने कई वर्षों तक अपने खजाने को इसी किले में रखा था।
शिवाजी महाराज और लोहागढ़ किला
मुगलिया साम्राज्य के समय में मराठाओं को लोहा मनवाने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज और इस किले की कई कहानियां लोगों की जबान पर हैं। मुगलों की नाक में दम करने वाले शिवाजी महाराज ने सबसे पहले 1648 में इस किले को जीत लिया था। इसके बाद करीब 17 साल इसे अपने पास रखने के बाद उन्होंने 1665 में पुरंधर संधि के दौरान इसे मुगलों को सौंप दिया। बाद में 1670 के इस युद्ध के दौरान शिवाजी महाराज ने इस किले पर फिर से भगवा ध्वज फहरा दिया। यह दिखाता है कि उस समय पर इस किले का महत्व कितना ज्यादा था।
लोहागढ़ किले की खासियत
ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस किले की प्राकृतिक सुंदरता अपने आप में महत्वपूर्ण हैं। इस किले का सबसे अनोखी खासियत इसका 'विंचू काटा' है, जिसका अर्थ होता है 'बिच्छु का काटा'। यह लोहागढ़ किले का वह हिस्सा है, जो मुख्य किले से अलग निकला हुआ है। पर्यटकों के लिए यह बेहद आकर्षण का केंद्र है। सदियों से भारतीय इतिहास की धरोहर बने इस किले के विशाल दरवाजे और इसकी बड़ी दीवारें आज भी मजबूत बनी हुई हैं, जो भारत की मजबूत ऐतिहासिक कारीगरी की कहानी कहती हैं।
वर्तमान की बात करें, तो महाराष्ट्र में मॉनसून के दौरान यह किला हजारों, लाखों पर्यटकों को आकर्षित करता है। इस किले को आसपास में ट्रेकिंग डेस्टिनेशन के रूप में जाना जाता है। 50 किलोमीटर दूर स्थिति पुणे के लोग आम तौर पर यहाँ ट्रेकिंग करने के लिए आते हैं। इसके अलावा देश भर से लोग यहाँ पर मौसम का लुफ्त लेने और अपने परिवार के साथ समय बिताने के लिए आते हैं।


