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'सिंह सिस्टर्स' (प्रशांती, दिव्या और आकांक्षा), बास्केटबॉल प्लेयर्स

'सिंह सिस्टर्स' यानी उत्तरप्रदेश के वाराणसी में जन्मीं एक ही परिवार की चार बहनें बास्केटबॉल में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं? इन बहनों ने उन हालातों में बास्केटबॉल में अपना करियर बनाने की ठानी जब माता-पिता के अलावा दूसरे लोगों ने उनके खेलने का विरोध किया था। इन बहनों का नाम है प्रियंका सिंह, दिव्या सिंह, प्रशांति सिंह, आकांक्षा सिंह और प्रतिमा सिंह। लखनऊ में 1 सितंबर को आयोजित होने वाले हिन्दुस्तान शिखर समागम-2018 में आकांक्षा, दिव्या और प्रशांति हमारी मेहमान होंगी। इनमें से एक प्रशांति सिंह और आकांक्षा सिंह तो भारतीय बॉस्केटबॉल टीम की कप्तान भी रह चुकी हैं। इतना ही नहीं लगातार 15 वर्षों से बास्केटबॉल में अंतरर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन करने वाली प्रशांति सिंह को साल 2017 में अर्जुन अवार्ड के लिए चुना गया। आकांक्षा को कई बार एक्टिंग और मॉडलिंग के ऑफर्स मिल चुके हैं। वह साल 2015 में स्पोर्ट्स पर बनी फिल्म 'पाखी' में एक्टिंग भी कर चुकी हैं। 

भाई बहनों में तीसरे नंबर की प्रशांति सिंह पिछले 25 वर्षों से बास्केटबॉल खेल रही हैं, जबकि 15 सालों से वो लगातर अंतरर्राष्ट्रीय स्तर पर बास्केटबॉल खेल रही हैं। वहीं अकांक्षा सिंह भारत की महिला बॉस्केटबॉल टीम की कप्तान रह चुकी हैं। वह 2004 से ही भारत की महिला बास्केटबॉल टीम की सदस्य हैं। अन्य बहनों में दिव्या सिंह और प्रतिमा सिंह भी भारत की राष्ट्रीय महिला बास्केटबॉल टीम का प्रतिनिधित्व करती हैं। सबसे बड़ी बहन प्रियंका सिंह 'राष्ट्रिय बास्केटबॉल इंस्टिट्यूट' की कोच हैं। आकांक्षा साल 2010 में भारत की पहली व्यावसायिक बास्केटबॉल लीग 'एमबीपीएल' की सर्वाधिक मूल्यवान खिलाड़ी रही ​थीं। वह साल 2014 में दक्षिण कोरिया के इंचियोन में आयोजित 17वें एशियाई खेलों में भारत की बास्केटबॉल टीम का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। पांच बहनों में सबसे छोटी प्रतिमा की शादी भारतीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबाज ईशांत शर्मा से हुई है।

आकांक्षा सिंह और उनकी बहनें प्रियंका सिंह, दिव्या सिंह, प्रशांति सिंह और प्रतिमा सिंह जिस परिवार से आतीं हैं, वहां पहले लड़कियों का खेलना अच्छा नहीं माना जाता था। यही वजह रही कि जब इन लड़कियों ने बास्केटबॉल खेलना शुरू किया तो लोग इनका समर्थन करने की जगह उनको सलाह देने लगे कि पुरुषों के खेल लड़कियों को नहीं खेलने चाहिए। इनके पिता पेशे से बैंकर थे और नहीं चाहते थे कि उनकी बेटियां बास्केटबॉल खेलें। वह अपनी पांचों बेटियों को सिविल सर्विसेज की तैयारी कराना चाहते थे। दूसरी ओर इनकी मां उर्मिला सिंह पेशे से टीचर थीं। उन्होंने समाज की बातों पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया और हमेशा अपनी बेटियों को इस खेल के लिए प्रोत्साहित किया। यही वजह है कि वही लोग जो कभी इन लड़कियों के खेलने पर ऊंगली उठाते थे आज उनकी तारीफ करते नहीं थकते। 

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माफ़ कीजिए आप जो खबर ढूंढ रहे हैं , वह उपलब्ध नहीं है

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जब पप्पू की रोटी के ऊपर से गुजरा चूहा

पप्पू डिनर करने बैठा, तभी उसकी रोटी के ऊपर से चूहा गुजर गया..

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