बेचारे भगवान वोट नहीं दे सकते तो उन्हें ऐसे ही नहीं छोड़ सकते, अधिकारियों पर बरसा हाईकोर्ट
जब लोगों को निकालने की प्रक्रिया की, तो स्थानीय सांसद, राजनेताओं और अन्य प्रदर्शनकारियों की तरफ से विरोध प्रदर्शन किए गए थे। ऐसे में प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकी। जब कोर्ट ने अतिक्रमणकारियों की जानकारी निकाली, तो पता चला कि इनमें 27 सरकारी अधिकारी, 49 उद्योगपति और 38 प्रभावशाली लोग थे।

मंदिर की जमीन से अतिक्रमण हटाने से जुड़े एक मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने अधिकारियों को जमकर फटकार लगाई है। अदालत ने कहा है कि एक देवता के पास वोट डालने का अधिकारी नहीं है, तो ऐसे में उन्हें ऐसे ही नहीं छोड़ सकते। दरअसल, अदालत इस बात पर नाराजगी जता रहा था कि उनके करीब 7 साल पुराने के आदेश के बाद भी अतिक्रमण हटाने के लिए कड़े कदम नहीं उठाए गए।
मामला करूर जिले के बालसुब्रमण्यम स्वामी मंदिर से जुड़ा हुआ है। अदालत साल 2024 में ए राधाकृष्ण की तरफ से दाखिल अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रही थी। जस्टिस पी वेलमुरुगन और जस्टिस बी पुगलेंधी की डिवीजन बेंच इसपर सुनवाई कर रही थी। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, जजों ने करूर डीएसपी की तरफ से दाखिल रिपोर्ट पर गौर किया, जिसमें कहा गया था कि अधिकारियों ने साल 2025 में कई मौकों पर लोगों को निकालने की प्रक्रिया की शुरुआत की थी।
रिपोर्ट में कहा गया कि जब लोगों को निकालने की प्रक्रिया की, तो स्थानीय सांसद, राजनेताओं और अन्य प्रदर्शनकारियों की तरफ से विरोध प्रदर्शन किए गए थे। ऐसे में प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकी। जब कोर्ट ने अतिक्रमणकारियों की जानकारी निकाली, तो पता चला कि इनमें 27 सरकारी अधिकारी, 49 उद्योगपति और 38 प्रभावशाली लोग थे।
जमकर भड़का कोर्ट
बेंच ने कहा, 'मंदिर की जमीनें राज्य की कोई व्यावसायिक संपत्ति नहीं हैं। ये भक्तों की पीढ़ियों की तरफ से धार्मिक पूजा और धर्मार्थ कार्यों को जारी रखने के निश्चित उद्देश्य से दान की गई पवित्र संपत्तियां हैं। यदि ये संपत्तियां साल दर साल कम होती जा रही हैं, तो यह केवल कागजी गड़बड़ी नहीं है, बल्कि यह पूरी व्यवस्था के खत्म होने का संकेत है।'
कोर्ट ने कहा, 'बेचारे भगवान के पास वोट देने का अधिकार नहीं है, जबकि ताकतवर कब्जाधारियों के पास कीमती वोट हैं। कानून में भगवान को एक 'विधिक व्यक्ति' माना गया है, और सिर्फ इसलिए कि वे चुनाव में हिस्सा नहीं लेते, उन्हें उनके अधिकारों से वंचित नहीं छोड़ा जा सकता। भगवान भले ही वोट न दें, लेकिन संविधान बोलता है। अदालत यहां पैरेन्स पेट्रे के रूप में अपनी शक्ति का इस्तेमाल कर रही है। लेकिन, जब अदालती आदेशों को संगठित विरोध के जरिए रोका जाता है, तब कानून के शासन की ही परीक्षा होती है।'
6 महीने में काम पूरा करने के आदेश
अदालत ने मंदिर की जमीनों से जुड़े मुकदमों को देख रहे सिविल कोर्ट्स को जल्द से जल्द और संभवत: 6 महीनों में काम पूरा करने के निर्देश दिए हैं। जजों ने टिप्पणी की कि राज्य मशीनरी (प्रशासन और पुलिस) से यह अपेक्षा की जाती है कि वह दृढ़ता और संवैधानिक निष्ठा के साथ काम करे। इसके साथ ही अदालत ने अवमानना याचिका को बंद कर दिया।
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Nisarg Dixitनिसर्ग दीक्षित न्यूजरूम में करीब एक दशक का अनुभव लिए निसर्ग दीक्षित शोर से ज़्यादा सार पर भरोसा करते हैं। पिछले 4 साल से वह लाइव हिनुस्तान में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं, जहां खबरों की योजना, लेखन, सत्यापन और प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं। इससे पहले दैनिक भास्कर और न्यूज़18 जैसे बड़े मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क तक की भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की, जिसने उनके काम करने के तरीके को व्यावहारिक और तथ्य आधारित बनाया। निसर्ग की खास रुचि खोजी रिपोर्टिंग, ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ स्टोरीज़ में है। वे जटिल मुद्दों को सरल भाषा और स्पष्ट तथ्यों के साथ प्रस्तुत करने में विश्वास रखते हैं। राजनीति और जांच पड़ताल से जुड़े विषयों पर उनकी मजबूत पकड़ है। निसर्ग लोकसभा चुनावों, कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और अहम घटनाओं को कवर कर चुके हैं। साथ ही संसदीय कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों को नियमित रूप से कवर करते हैं। गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी निसर्ग योगदान देते हैं।
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