आपने जो किया, वो गलत है; जाइए, मां के चरणों में गिरकर माफी मांगिए... फरियादी पर ही भड़के मीलॉर्ड!
मामले में माता-पिता का आरोप था कि बेटे और बहू ने जाली दस्तावेजों के आधार पर उनकी संपत्ति पर मालिकाना हक का दावा किया। इसे देखते हुए, माता-पिता ने अखबार में एक सार्वजनिक सूचना प्रकाशित करवाई और बेटे-बहू से अपने सारे रिश्ते तोड़ लिए।

सुप्रीम कोर्ट में आज (बुधवार, 9 सितंबर को) जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की बेंच के सामने एक अलग ही नजारा देखने को मिला, जहां पीठ ने संपत्ति विवाद के एक मामले में याचिकाकर्ता को अपनी मां के पैर में गिरकर अपने गुनाहों के लिए माफी मांगने की सलाह दी। मां-बेटे के बीच प्रॉपर्टी से जुड़े विवाद की सुनवाई करते हुए जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने बेटे को हिंदू धर्म में मां के महत्व की याद दिलाई। उन्होंने ज़ुबानी तौर पर उस बेटे से कहा कि वह अपनी मां से माफी मांगे और उनसे क्षमा याचना करे।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में संपत्ति के अकेले मालिक याचिकाकर्ता की मां और पिता हैं। प्यार-मोहब्बत में उन्होंने बेटे और बहू को बिना किसी किराए के लाइसेंसधारी के तौर पर अपने मकान की पहली मंजिल पर रहने की इजाजत दी थी लेकिन आरोप है कि बेटे ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर माता-पिता को परेशान करना शुरू कर दिया और विवाद वाली प्रॉपर्टी को अपने नाम करवाने के लिए उन पर दबाव डाला।
SC ने खारिज कर दी बेटे की याचिका
जब माता-पिता यानी संपत्ति के मालिक ने अदालत का रुख किया तो ट्रायल कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया और बेटे को संपत्ति से बेदकळ करने का आदेश दिया। इसके खिलाफ बेटे ने अब सुप्रीम कोर्ट में अपील की है। उसी मामले की सुनवाई जस्टिस शर्मा और जस्टिस NK सिंह की बेंच कर रही थी। सुनवाई के बाद मामले को खारिज करते हुए जस्टिस शर्मा ने ज़ुबानी तौर पर कहा, "आपको जाकर अपनी मां के पैरों में गिरकर माफी मांगनी चाहिए। उनसे अपने सभी गुनाहों के लिए माफी मांगिए।"
'पैरों में गिरकर उनसे माफी मांगिए'
इसके बाद जस्टिस शर्मा ने कोर्ट में मौजूद वकीलों से कहा: “...क्या बेटे ने जो किया वह काम गलत नहीं है? हम बेटे से कह रहे हैं कि वह मां के पास वापस जाए, उनके पैर छुए, उनकी भावनाओं को समझे, और पैरों में गिरकर उनसे माफी मांगे और उनका आशीर्वाद ले।”
क्या है पूरा मामला? बेटे पर क्या आरोप?
इस मामले में माता-पिता का आरोप था कि बेटे और बहू ने जाली दस्तावेजों के आधार पर उनकी संपत्ति पर मालिकाना हक का दावा किया। इसे देखते हुए, माता-पिता ने अखबार में एक सार्वजनिक सूचना प्रकाशित करवाई और बेटे-बहू से अपने सारे रिश्ते तोड़ लिए। उन्होंने बेटे के खिलाफ FIR भी दर्ज कराई और बेटे-बहू को नोटिस भेजकर अपने घर में रहने देने वाला लाइसेंस भी रद्द कर दिया, साथ ही उन्हें प्रॉपर्टी खाली करने का निर्देश भी दिया। इसके बाद माता-पिता ने कब्ज़े, स्थायी रोक और नुकसान की भरपाई के लिए मुकदमा दायर किया।
माता-पिता ही प्रॉपर्टी के अकेले मालिक
मामले की सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट ने माना कि माता-पिता ही प्रॉपर्टी के अकेले मालिक हैं और बेटा-बहू केवल लाइसेंसधारी थे, जिनका लाइसेंस सही तरीके से रद्द किया जा चुका है। इसलिए, वे प्रॉपर्टी की पहली मंजिल का कब्जा छोड़ने के लिए बाध्य हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने बाद में 17 अप्रैल को इस आदेश को बरकरार रखा। इसके खिलाफ बेटे ने सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटिशन (SLP) दायर की थी, जिसे कोर्ट ने आज खारिज कर दिया।


