ब्रिक्स को लेकर भारत से दूरी बनाना हमारी गलती; जयशंकर के सामने जर्मन विदेश मंत्री का कबूल नामा
जर्मन विदेश मंत्री वेडफुल ने कहा कि कुछ समय पहले तक यूरोप इन देशों को ब्रिक्स समूह के सदस्य के तौर पर देखता था। इसकी वजह से भारत जैसे देशों के साथ भी दूरी आ गई थी। यूरोप अपने इस नजरिए पर अब काम कर रहा है और भारत और ब्राजील जैसे देशों के साथ रिश्ते मजबूत कर रहा है।

जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वेडफुल ने भारत को लेकर यूरोप की रणनीति में की गई गलती को स्वीकार किया है। उन्होंने माना कि यूरोप ने उस वक्त गलती की थी, जब उसने उभरती वैश्विक शक्तियों को केवल ब्रिक्स देशों के ढांचे में होने की वजह से दूरी बनाई थी। उन्होंने कहा कि यह तरीका गलत था, इस नीति की वजह से भारत जैसे देशों के साथ अनावश्यक रूप से दूरी बन गई थी।
म्यूनिक सुरक्षा सम्मलेन में विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ मिलकर एक इंटरव्यू दे रहे वेडफुल ने यूरोप की बदलती रणनीति का भी जिक्र किया। वेडफुल ने कहा कि यूरोप अब इन देशों के साथ अपने रिश्तों का पुनर्मूल्यांकन कर रहा है। भारत और ब्राजील जैसे साझेदार देशों के साथ साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और समान हितों पर अधिक ध्यान दे रहा है। यूरोप अब मानता है कि भारत जैसे देशों के साथ उनके रिश्ते अब केवल इसलिए प्रभावित नहीं होने चाहिए, क्योंकि भारत रूस और चीन के किसी समूह का सदस्य है।
चीन और रूस के साथ तनाव
वेडफुल ने यहां पर रूस और चीन के साथ यूरोप के तनाव पर भी बात की। उन्होंने कहा कि मॉस्को के साथ यूरोप का तनाव बहुत बुनियादी है। इसके अलावा चीन के साथ भी मतभेद हैं। उन्होंने कहा, "भारत और ब्राजील जैसे देशोंके साथ हमारे कई साझा हित और मूल्य हैं। क्यों न हम इन साझा हितों और मूल्यों पर ध्यान केंद्रित करें। चीन और रूस के साथ हमारे मतभेद हैं, वह अलग बात है।"
भारत, चीन से अलग साझेदार
वेडफुल ने कहा कि चीन की तुलना में भारत की स्थिति एक विशिष्ट साझेदार के रूप में है। दोनों देशों के आपसी संबंधों में भरोसे को उजागर करते हुए उन्होंने कहा, “हम जानते हैं कि भारत कहां खड़ा है, वह भरोसेमंद है, हम उन पर भरोसा कर सकते हैं, और शायद वह भी हम पर भरोसा कर सकते हैं।” बकौल वेडफुल वैश्विक राजनीति में भारत चीन से ज्यादा मजबूत और भरोसेमंद साथी है।
इसके इतर जर्मन विदेश मंत्री ने भारत और जर्मनी के साझा मूल्यों पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा, "हम दोनों ही लोकतंत्र हैं, हमारे यहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। हमारे यहां कानून का शासन है और हमारे लिए यह बहुत मायने रखता है।"
आपको बता दें, अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रंप का शासन आने के बाद से यूरोप अपनी वैश्विक रणनीति में बदलाव करता नजर आया है। पहले अमेरिका का पिछलग्गू बनकर यूरोप के देश अपनी विदेश नीति को अमेरिका को केंद्र में रखकर बनाते थे। लेकिन ट्रंप के आने और फिर यूरोपीय देशों के साथ उनके सलूक को देखते हुए यूरोपीय देश अब दूसरे विकल्पों की तरफ देखने लगे हैं। एक मजबूत और लोकतांत्रिक साझेदार के रूप में भारत उनकी सभी जरूरतों को पूरा करता है, इसकी वजह से यूरोपीय देश लगातार भारत के करीब आने की कोशिश में लगे हुए हैं।
हाल ही में भारत और यूरोपीय संघ के बीच में हुआ व्यापारिक समझौता इस बात का उदाहरण है। यह समझौता कई वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ था। लेकिन अब यह समझौता हो चुका है और यूरोपीय देशों में यह जीत के रूप में देखा जा रहा है, जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस समझौते से भारत को ज्यादा फायदा होगा।
लेखक के बारे में
Upendra Thapakउपेंद्र ने डिजिटल पत्रकारिता की शुरुआत लाइव हिन्दुस्तान से की है। पिछले एक साल से वे होम टीम में कंटेंट प्रोड्यूसर के तौर पर कार्यरत हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव 2024, ऑपरेशन सिंदूर और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की कवरेज की है। पत्रकारिता की पढ़ाई भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली (बैच 2023-24) से पूरी करने वाले उपेंद्र को इतिहास, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, राजनीति, खेल, विज्ञान और समसामयिक घटनाओं से जुड़े विषयों में गहरी रुचि है। स्नातक स्तर पर बायोटेक्नोलॉजी की पढ़ाई करने के कारण उन्हें मेडिकल और वैज्ञानिक विषयों की भाषा की भी अच्छी समझ है। वे मूल रूप से मध्यप्रदेश के भिंड जिले के निवासी हैं।
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