शिवसेना में फिर दरार: बाल ठाकरे से उद्धव तक टूटी 6 बार, सबसे घातक एकनाथ शिंदे का वार
Shiv Sena News: उद्धव ठाकरे की शिवसेना यूबीटी में टूट को लेकर स्थिति साफ नहीं हो सकी है। एक ओर कहा जा रहा है कि गुरुवार को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला गुट को मान्यता दे सकते हैं। वहीं, उद्धव गुट का कहना है कि सभी सांसदों से उनका संपर्क बना हुआ है और कोई टूट नहीं हो रही है।

Shiv Sena News: शिवसेना से शिवसेना UBT बन चुकी उद्धव ठाकरे की पार्टी अब फिर टूटने की कगार पर है। इस बार एक साथ 6 सांसद नाता तोड़ डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे के साथ जा सकते हैं। इसके साथ ही साल 2022 में हुई पार्टी में सबसे बड़ी फूट की यादें ताजा कर दी हैं। हालांकि, इतिहास बताता है कि यह दल 4 बार टूट का सामना कर चुका है। आइए 70 के दशक से लेकर 2026 तक की कहानी जानते हैं।
सबसे पहली टूट
70 के दशक में कहा जाता है कि शिवसेना के दिवंगत संस्थापक बाल ठाकरे और मुंबई के एक नेता बंदू शिंगरे के बीच तनाव हुआ था, जिसके बाद शिंगरे ने एक दल खड़ा किया था। हालांकि, प्रति शिव सेना नाम से बनी यह पार्टी खास असर नहीं छोड़ पाई थी।
जब छगन भुजबल गए
दिसंबर 1991 की बात है। तब पार्टी की कमान बाल ठाकरे के हाथ में ही थी और वरिष्ठ नेता छगन भुजबल ने फूट का मन बना लिया था। तब वह महाराष्ट्र विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष थे। खबरें थीं कि भुजबल ने 18 विधायकों के समर्थन का दावा किया था और तब शिवसेना के कुल 52 विधायक थे।
इस बगावत को खास इसलिए भी माना जाता है, क्योंकि पहली बार किसी बहुत बड़े कद के नेता ने पार्टी में विरोध के सुर उठाए थे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, तब महज 6 विधायकों ने कथित तौर पर विधानसभा स्पीकर को समर्थन पत्र सौंपा था और दूसरे गुट को शिवसेना बी माना गया था। बाद में इस गुट ने कांग्रेस के साथ हाथ मिला लिया था।
नारायण राणे का दांव
14 साल के बाद शिवसेना ने एक बार फिर नारायण राणे के रूप में टूट का सामना करने की तैयारी की। वह साल 1999 में कुछ महीनों के लिए मुख्यमंत्री भी रहे थे। कहा जाता है कि दिवंगत बाल ठाकरे की तरफ से बेटे उद्धव को उत्तराधिकारी के तौर पर दिखाने की कोशिश ने राणे खफा हो गए थे। जुलाई 2005 में उन्होंने शिवसेना छोड़ कांग्रेस का दामन थामा था।
तब उन्होंने दावा किया था कि उन्हें 42 विधायकों का समर्थन है और विधानसभा में शिवसेना के पास 63 विधायक थे। हालांकि, ये आंकड़े कभी साबित नहीं हो सके और कुछ ही नेताओं ने खुलकर उनका साथ दिया। वहीं, कहा यह भी जाता है कि पार्टी से निष्कासित किए जाने के बाद राणे की मीटिंग में 9 विधायक पहुंचे थे। हालांकि, उनके जाने से शिवसेना को कोंकण के कुछ हिस्सों में बड़ी चोट लगी थी। बाद में वह भाजपा में शामिल हो गए थे।
चचेरे भाई राज ठाकरे की विदाई
अगले ही साल यानी 2006 में शिवसेना के उत्तराधिकारी माने जा रहे राज ठाकरे ने अलग राह पकड़ ली थी। तब तक यह गद्दी उद्धव को मिल चुकी थी। हालांकि, राज के जाने से विधायक नहीं टूटे, लेकिन संगठन पर इसका असर पड़ा। उन्होंने अलग होकर महाराष्ट्र नव निर्माण सेना बनाई थी और 2009 के विधानसभा चुनाव में 13 सीटें भी जीती थीं। हालांकि, हाल में पार्टी कोई भी बड़ा चुनावी प्रदर्शन नहीं कर सकी है।
टूट ऐसी कि नाम और चिह्न तक छिन गया
साल 2022 में एकनाथ शिंदे की अगुवाई में शिवसेना के 55 में 40 विधायक अलग होने के लिए तैयार हो गए। नतीजा हुआ कि राज्य में तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली महाविकास अघाड़ी सरकार गिर गई थी। इतना ही नहीं पार्टी दो हिस्सों में बंट गई और असली नाम और चिह्न शिंदे गुट के खाते में गया। जबकि, उद्धव को शिवेसना यूबीटी नाम और मशाल चिह्न के साथ संतोष करना पड़ा।
फिर से टूट
2026 में अब शिवसेना यूबीटी में फिर टूट हो सकती है। कहा जा रहा है कि पार्टी के 6 सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को समर्थन पत्र दे दिया है, जिसका गुरुवार को आधिकारिक ऐलान हो सकता है। अगर ऐसा होता है, तो पार्टी के पास महज 3 सांसद रह जाएंगे। इससे पहले अटकलें थीं कि पार्टी के कुछ विधायक भी दल बदल सकते हैं।
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लेखक के बारे में
Nisarg Dixitनिसर्ग दीक्षित न्यूजरूम में करीब एक दशक का अनुभव लिए निसर्ग दीक्षित शोर से ज़्यादा सार पर भरोसा करते हैं। पिछले 4 साल से वह लाइव हिनुस्तान में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं, जहां खबरों की योजना, लेखन, सत्यापन और प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं। इससे पहले दैनिक भास्कर और न्यूज़18 जैसे बड़े मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क तक की भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की, जिसने उनके काम करने के तरीके को व्यावहारिक और तथ्य आधारित बनाया। निसर्ग की खास रुचि खोजी रिपोर्टिंग, ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ स्टोरीज़ में है। वे जटिल मुद्दों को सरल भाषा और स्पष्ट तथ्यों के साथ प्रस्तुत करने में विश्वास रखते हैं। राजनीति और जांच पड़ताल से जुड़े विषयों पर उनकी मजबूत पकड़ है। निसर्ग लोकसभा चुनावों, कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और अहम घटनाओं को कवर कर चुके हैं। साथ ही संसदीय कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों को नियमित रूप से कवर करते हैं। गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी निसर्ग योगदान देते हैं।
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