लोगों को उम्मीदें थीं, पर न्यायपालिका फेल हो गई… सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ने क्यों कही ऐसी बात?

Jagriti Kumari लाइव हिन्दुस्तान
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जस्टिस ओका ने कई अहम मुद्दों को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कोर्ट में जजों की कमी, इंफ्रास्ट्रक्चर में कमियों पर जोर डालते हुए कहा कि अदालत को बुनियादी ढांचे उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है।

लोगों को उम्मीदें थीं, पर न्यायपालिका फेल हो गई… सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ने क्यों कही ऐसी बात?

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस ए एस ओका ने सोमवार को न्यायपालिका को लेकर बड़ा बयान दिया है। एक कार्यक्रम में इस पर चिंता जाहिर करते हुए जस्टिस ओका ने कहा कि भारतीय न्यायपालिका नागरिकों की उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतर पाई है और भरोसा बनाए रखने में फेल हो गई। उन्होंने कहा कि सिस्टम की अपनी तारीफ अक्सर इस बात को नजरअंदाज कर देती है कि आम लोग अदालतों में क्या अनुभव करते हैं।

जस्टिस ओका पीपल यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी (PUCL) के 45वें जेपी मेमोरियल लेक्चर में बोल रहे थे। इस दौरान उन्होंने कहा कि भारत का संविधान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की गारंटी देता है, लेकिन यह वादा तब तक पूरा नहीं होगा जब तक अदालतें गुणवत्तापूर्ण और समय से न्याय नहीं दे पाएंगीं।

आम लोगों को न्यायपालिका से बहुत उम्मीदें थीं- जस्टिस ओका

जस्टिस ओका ने अपने संबोधन में कहा, “आम लोगों को न्यायपालिका से बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन किसी तरह यह सिस्टम उन उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाया।” उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई यह कहता है कि आम आदमी को न्यायपालिका पर बहुत भरोसा है, तो यह बात सिस्टम के बाहर के लोगों को कहनी चाहिए, ना कि वकीलों या जजों को।

जजों की कमी सबसे बड़ी चुनौती

जस्टिस ओका ने देश में जजों और आबादी के अनुपात और कमजोर न्यायिक इंफ्रास्ट्रक्चर को बड़ी समस्या बताया। उन्होंने कहा कि 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि पांच साल में प्रति दस लाख लोगों पर 50 जज होने चाहिए, लेकिन आज भी यह आंकड़ा करीब 22-23 ही है। जबकि विकसित देशों में यह अनुपात 80-90 तक है। उन्होंने बताया कि एक समिति के अध्यक्ष के तौर पर किए गए आकलन में सिर्फ महाराष्ट्र में ही करीब 8,500 ट्रायल कोर्ट जजों की जरूरत है। उन्होंने कहा है कि कोर्ट को अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी है।

मुकदमों का बोझ ज्यादा

पूर्व SC जज ने मुकदमों के बढ़ते बोझ पर भी चिंता जताई। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि मुंबई की एक मजिस्ट्रेट कोर्ट में रोज 100 से 150 मामलों की सुनवाई होती है। इनमें 30 से 40 प्रतिशत मामले चेक बाउंस से जुड़े होते हैं, जबकि बाकी आपराधिक, वैवाहिक और घरेलू हिंसा के मामले होते हैं। ऐसे में यह एक बड़ी समस्या है।

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जागृति को छोटी उम्र से ही खबरों की दुनिया ने इतना रोमांचित किया कि पत्रकारिता को ही करियर बना लिया। 2 साल पहले लाइव हिन्दुस्तान के साथ करियर की शुरुआत हुई। उससे पहले डिग्री-डिप्लोमा सब जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन में। भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली से पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा और संत जेवियर्स कॉलेज रांची से स्नातक के बाद से खबरें लिखने का सिलसिला जारी। खबरों को इस तरह से बताना जैसे कोई बेहद दिलचस्प किस्सा, जागृति की खासियत है। अंतर्राष्ट्रीय संबंध और अर्थव्यवस्था की खबरों में गहरी रुचि। लाइव हिन्दुस्तान में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान शानदार कवरेज के लिए इंस्टा अवॉर्ड जीता और अब बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर रोजाना कुछ नया सीखने की ललक के साथ आगे बढ़ रही हैं। इसके अलावा सिनेमा को समझने की जिज्ञासा है।

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