मैं पद पर होता तो यहां नहीं जाता...'अधिवक्ता परिषद' को लेकर ऐसा क्यों बोले SC के पूर्व जस्टिस ओका

Amit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
share

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस अभय एस. ओका ने न्यायिक तटस्थता, भगोड़े आरोपियों और भारतीय न्याय प्रणाली की खामियों पर बेबाक राय रखी है। जानिए 'अधिवक्ता परिषद', कसाब ट्रायल और जजों की कमी पर उनका विस्तृत बयान।

मैं पद पर होता तो यहां नहीं जाता...'अधिवक्ता परिषद' को लेकर ऐसा क्यों बोले SC के पूर्व जस्टिस ओका

हाल ही में 'अधिवक्ता परिषद' की सुप्रीम कोर्ट यूनिट ने एक कार्यक्रम आयोजित किया। इसमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश अभय एस. ओका ने भारतीय न्याय प्रणाली, जजों की तटस्थता और ढांचागत सुधारों पर खुलकर अपनी राय रखी। इस कार्यक्रम की थीम 'रोब्स कैननॉट बी रेंटेड' थी। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पूर्व जस्टिस ओका ने वर्तमान न्याय व्यवस्था की कुछ प्रमुख चिंताओं को उजागर किया और रिटायर्ड जजों की भूमिका पर भी अहम टिप्पणियां कीं। इस दौरान उनके एक बयान की खूब चर्चा हो रही है। न्यायाधीश जस्टिस अभय एस. ओका ने कहा कि अगर वे मौजूदा जज होते तो अधिवक्ता परिषद के किसी भी कार्यक्रम में बोलने का निमंत्रण स्वीकार नहीं करते। उन्होंने इसे राजनीतिक झुकाव वाली संस्था बताया।

न्यायिक तटस्थता और 'अधिवक्ता परिषद' पर टिप्पणी

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस ओका ने स्पष्ट किया कि न्याय वितरण प्रणाली में जनता का विश्वास बनाए रखने और संस्थागत तटस्थता को सुरक्षित रखने के लिए जजों को कई तरह की सीमाओं में रहना पड़ता है। उन्होंने एक दिलचस्प उदाहरण देते हुए कहा कि यदि वह अभी पद पर आसीन होते, तो उन्होंने 'अधिवक्ता परिषद' के इस निमंत्रण को विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया होता। उन्होंने कहा, 'यदि एक मौजूदा न्यायाधीश के तौर पर, मुझे अधिवक्ता परिषद द्वारा अपने मंच पर बोलने के लिए आमंत्रित किया जाता, तो मैं विनम्रतापूर्वक मना कर देता; क्योंकि मेरा मानना है कि अधिवक्ता परिषद का झुकाव राजनीति की ओर है।'

यह बयान क्यों महत्वपूर्ण है?

यह बयान अधिवक्ता परिषद के अपने ही कार्यक्रम में दिया गया है, जो इस समय विवादों के घेरे में है। दरअसल दिल्ली के कथित आबकारी नीति घोटाले से जुड़े मामले की सुनवाई दिल्ली हाईकोर्ट में चल रही है। इस मामले में सीबीआई ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को आरोपी बनाया है। मामले की सुनवाई दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा कर रही हैं। हाल ही में केजरीवाल खुद कोर्ट में वकील बनकर पेश हुए और रिक्यूजल एप्लीकेशन दायर की। उन्होंने जस्टिस शर्मा से खुद को केस से हटाने की मांग की। केजरीवाल का कहना है कि जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के कम से कम 4 कार्यक्रमों में भाग लिया है। केजरीवाल ने कहा कि यह संगठन आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) से जुड़ा हुआ है, जिसकी विचारधारा का आम आदमी पार्टी (AAP) पूरी तरह विरोध करती है। उन्होंने कहा, 'हम उसकी विचारधारा के पूरी तरह खिलाफ हैं और खुलकर विरोध करते हैं। यह केस राजनीतिक है। अगर आपकी विचारधारा अलग है तो क्या मुझे न्याय मिलेगा?' हालांकि CBI ने जस्टिस शर्मा का बचाव करते हुए कहा कि यह वकीलों का एक संगठन है और कई जजों ने कानूनी विषयों पर आधारित इसके कार्यक्रमों में शिरकत की है।

सेवानिवृत्त जजों की भूमिका और भगोड़े आरोपियों का मामला

जस्टिस ओका ने कार्यक्रम में संवैधानिक अदालतों के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को भी संयम बरतने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि रिटायर होने के बाद भी जजों को ऐसे काम या असाइनमेंट लेने से बचना चाहिए जिससे न्यायिक पद की गरिमा को ठेस पहुंचे। भगोड़े कारोबारी नीरव मोदी के प्रत्यर्पण से जुड़े हालिया विवाद का संदर्भ देते हुए, उन्होंने कहा कि सेवानिवृत्त जजों को भगोड़े आरोपियों के अनुरोध पर अपनी 'कानूनी राय' देने से बचना चाहिए।

हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई विदेशी अदालत स्वतंत्र रूप से किसी मामले में विशेषज्ञ की सहायता मांगती है, तो एक सेवानिवृत्त जज द्वारा वह सहायता प्रदान करने में कुछ भी गलत नहीं है। विदेशों में भारतीय न्याय प्रणाली की आलोचना पर जल्दबाजी में प्रतिक्रिया देने के बजाय, उन्होंने इसे निष्पक्ष रूप से जांचने और आत्मनिरीक्षण कर सुधार करने की आवश्यकता पर बल दिया।

न्याय प्रणाली की वर्तमान खामियां

जस्टिस ओका ने देश की न्याय व्यवस्था की कुछ गंभीर चिंताओं का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि योग्य मामलों में भी जमानत न मिलना और ट्रायल से पहले लंबी कैद बड़ी समस्या है। उन्होंने कहा कि अक्सर आरोपियों को इतने लंबे समय तक जेल में रखा जाता है कि वह बिना दोष साबित हुए ही सजा में तब्दील हो जाता है। उन्होंने कहा कि क्षमता से अधिक भरी जेलें और कस्टोडियल डेथ (हिरासत में मौतें) बड़ी चिंताएं हैं। उन्होंने याद दिलाया कि जेल में बंद कैदियों की स्वतंत्रता भी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सुरक्षित है।

आपराधिक मुकदमों की निष्पक्षता (कसाब का उदाहरण)

खामियों के बावजूद, जस्टिस ओका ने भारतीय न्याय प्रणाली की ताकत की सराहना की। उन्होंने कहा कि आपराधिक मुकदमों की निष्पक्षता भारत की एक बड़ी ताकत है। उन्होंने अजमल कसाब के ट्रायल का उदाहरण देते हुए कहा कि इतने गंभीर और जघन्य अपराध के मामले में भी भारतीय न्याय व्यवस्था ने पूरी प्रक्रियात्मक सुरक्षा और निष्पक्षता सुनिश्चित की।

मुकदमों में देरी, जजों की कमी और नियुक्तियां

अदालतों में मुकदमों के लंबे खिंचने के पीछे उन्होंने न्यायपालिका में जजों की भारी कमी को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने 2002 के सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश का हवाला दिया जिसमें प्रति 10 लाख लोगों पर 50 जजों की सिफारिश की गई थी। वर्तमान में न्यायपालिका इसकी लगभग आधी क्षमता पर ही काम कर रही है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिशों और सरकार की मंजूरी के बीच लगने वाले लंबे समय पर उन्होंने चिंता जताई। उन्होंने कहा कि इस देरी के कारण कई सफल और काबिल वकील जज बनने के प्रस्ताव को स्वीकार करने से कतराते हैं।

Amit Kumar

लेखक के बारे में

Amit Kumar

डिजिटल पत्रकारिता की बदलती लहरों के बीच समाचारों की तह तक जाने की ललक अमित कुमार को इस क्षेत्र में खींच लाई। समकालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पैनी नजर रखने के साथ-साथ अमित को जटिल विषयों के गूढ़ विश्लेषण में गहरी रुचि है। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के रहने वाले अमित को मीडिया जगत में एक दशक का अनुभव है। वे पिछले 4 वर्षों से लाइव हिन्दुस्तान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।


अमित न केवल समाचारों के त्वरित प्रकाशन में माहिर हैं, बल्कि वे खबरों के पीछे छिपे 'क्यों' और 'कैसे' को विस्तार से समझाने वाले एक्सप्लेनर लिखने में भी विशेष रुचि रखते हैं। डिजिटल पत्रकारिता के नए आयामों, जैसे कि कीवर्ड रिसर्च, ट्रेंड एनालिसिस और एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन को वे बखूबी समझते हैं। उनकी पत्रकारिता की नींव 'फैक्ट-चेकिंग' और सत्यापन पर टिकी है। एक मल्टीमीडिया पत्रकार के तौर पर अमित का सफर देश के प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ रहा है। उन्होंने अमर उजाला, वन इंडिया, इंडिया टीवी और जी न्यूज जैसे बड़े मीडिया घरानों के साथ काम किया है।


अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।

और पढ़ें