50 सालों में पहली बार, भारत में ढह गया लेफ्ट का आखिरी किला! केरल में हार की ओर LDF

लाइव हिन्दुस्तान, केरल
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केरल विधानसभा चुनावों नतीजे घोषित किए जा रहे हैं। इस दौरान पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाला एलडीएफ गठबंधन बुरी तरह हार रहा है। लेफ्ट की हार के साथ ही पिछले 50 सालों के इतिहास में पहली बार होगा, जब भारत में लेफ्ट का एक भी मुख्यमंत्री नहीं होगा।

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भारत की राजनीति में पिछले 5 दशकों में बहुत कुछ हुआ। लेकिन आज के केरल के चुनावी नतीजे जिस ओर जा रहे हैं, वो ये संकेत दे रहे हैं कि पिछले 5 दशकों में पहली बार होगा जब भारत में लेफ्ट की सरकार नहीं होगी। कांग्रेस के बंपर प्रदर्शन के कारण पिनाराई विजयन का एलडीएफ हार रहा है। साल 2011 में पश्चिम बंगाल, 2018 में त्रिपुरा और साल 2026 में केरल से लेफ्ट की विदाई के साथ ही पिछले 5 दशकों में ऐसा पहली बार होगा, जब पूरे देश के किसी भी राज्य में लेफ्ट का मुख्यमंत्री नहीं होगा।

साल 1977 में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में लेफ्ट सत्ता में आई। इसके बाद से लगातार 34 सालों तक पश्चिम बंगाल में सत्ता में बनी रही। इस दौरान 1993 से लेकर 2018 तक लेफ्ट ने त्रिपुरा में भी शासन किया। केरल में लेफ्ट की हर पांच सालों के अंतर पर सरकार आती रही और साल 2021 में हुए विधानसभा चुनावों में दो लगातार बी लेफ्ट ने ही जीत दर्ज की।

ममता और बीजेपी ने ढहाए थे सबसे मजबूत किले

साल 1977 में पश्चिम बंगाल में जीत के बाद लगातार लेफ्ट की सरकार आती रही। इस दौरान करीब 34 सालों तक पश्चिम बंगाल में लेफ्ट की सरकार रही। साल 2011 में हुए चुनावों में टीएमसी ने बंपर जीत दर्ज करते हुए भारत में लेफ्ट के सबसे मजबूत किले को ढहा दिया। इसके बाद साल 2016 और 2021 के चुनावों में भी ममता बनर्जी की टीएमसी ने जीत दर्ज की। अब साल 2026 के चुनावों में बीजेपी 15 सालों के ममता राज को खत्म कर पहली बार अपनी सरकार बनाने जा रही है। लेफ्टा का पहला मजबूत किला ममता बनर्जी ने ढहाया वहीं, त्रिपुरा में 25 सालों से शासन करती आ रही लेफ्ट को बीजेपी ने साल 2018 में हराया। अब केरल इकलौता राज्य था, जहां लेफ्ट की सरकार बाकी थी। यहां भी कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन यूडीएफ बंपर जीत की ओर है।

अब आखिरी किला भी ढह गया

पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में सरकार जाने के बाद केरल इकलौता राज्य था, जहां लेफ्ट की सरकार थी और पिनाराई विजयन मुख्यमंत्री हैं। अब केरल विधानसभा चुनाव के नतीजों से साफ हो गया है कि भारत में लेफ्ट की सरकार अब कहीं नहीं रह जाएगी। पिनाराई विजयन की हार के साथ ही भारत में लेफ्ट का एक भी मुख्यमंत्री नहीं बचेगा। ऐसे में कहा जा सकता है कि भारत से लेफ्ट का आखिरी किला भी ढह गया।

साल 2004 में जब केंद्र में यूपीए की सरकार थी, तब लेफ्ट अपनी बुलंदी पर पहुंच गया था। इसके बाद साल 2009 में जब लोकसभा चुनाव हुए, उसके बाद से लेफ्ट के प्रदर्शन में लगातार गिरावट देखने को मिली है। साल 2004 के लोकसभा चुनावों में 4 लेफ्ट पार्टियों ने मिलकर कुल 59 सीटें जीती थीं और यूपीए सरकार में एक मजबूत सहयोगी के तौर पर शामिल थीं। साल 2004 से लेकर 2009 तक केंद्र में लेफ्ट की बड़ी भूमिका भी रही। इस दौरान भारत -अमेरिका के बीच परमाणु समझौते और मनमोहन सिंह की अलग-अलग नीतियों के कारण लेफ्ट ने साल 2008 में यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। इसके अगले ही साल हुए लोकसभा चुनावों में लेफ्ट की सीटें 59 से घटकर 24 पर पहुंच गईं और साल 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में 10 और 2019 में 5 रह गई।

Mohammad Azam

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