40 हजार रुपये किलो वाला ये मशरूम अब खेत में उगा सकेंगे किसान, कश्मीर के वैज्ञानिकों ने कैसे किया कमाल

Jagriti Kumari लाइव हिन्दुस्तान
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मोरल्स या मोरचेला, जिसे स्थानीय भाषा में कंगाच कहा जाता है, आमतौर पर ऊंचाई वाले जंगलों में बारिश के मौसम में उगता है। बाजार में इसकी कीमत 15 हजार से लेकर 40 हजार रुपये प्रति किलो तक होती है।

40 हजार रुपये किलो वाला ये मशरूम अब खेत में उगा सकेंगे किसान, कश्मीर के वैज्ञानिकों ने कैसे किया कमाल

कश्मीर के वैज्ञानिकों ने हाल ही में एक बड़ी कामयाबी हासिल की है, जिससे किसान 40 हजार रुपये प्रति किलो तक बिकने वाले मशरूम को अपने खेत में उगा पाएंगे। दरअसल वैज्ञानिकों ने एक बेहद महंगे और दुर्लभ मशरूम की खेती का तरीका खोज लिया है। श्रीनगर स्थित शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एसकास्ट) ने पहली बार नियंत्रित माहौल में इस मशरूम को उगाने में सफलता पाई है।

मोरल्स या मोरचेला, जिसे स्थानीय भाषा में कंगाच कहा जाता है, आमतौर पर ऊंचाई वाले जंगलों में खास बारिश के मौसम में ही उगता है। इसकी कीमत बाजार में 15 हजार से लेकर 40 हजार रुपये प्रति किलो तक होती है। यह एक खास तरह का मशरूम है, जो अपने स्वाद, पोषण और औषधीय गुणों के लिए जाना जाता है। इसे जंगलों से इकट्ठा करना काफी मुश्किल काम होता है, क्योंकि लोगों को खराब मौसम में घने जंगलों में तलाश करनी पड़ती है। वहीं कई बार इतनी मेहनत के बाद भी खाली हाथ लौटना पड़ता है।

किसानों के लिए खुले मौके

यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रोफेसर नजीर अहमद गनई ने एक बयान में कहा है कि यह एक गेम चेंजिंग उपलब्धि है। उन्होंने कहा, “यह नवाचार एक बड़ा बदलाव है। अब जंगलों पर निर्भरता खत्म होकर नियंत्रित और बड़े स्तर पर उत्पादन का रास्ता खुल गई है। इससे किसानों, युवाओं और उद्यमियों के लिए नए मौके बनेंगे और पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेगी।”

कैसे किया कमाल?

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस एसकास्ट के तीन विशेषज्ञों, प्रोफेसर तारिक अहमद सोफी, उनके छात्र कमरान मुनीर और प्रोफेसर विकास गुप्ता, ने इस मशरूम की खेती का तरीका अलग-अलग तरीके से विकसित किया है। डॉ. सोफी ने बताया, “हम पिछले पांच साल से इस पर काम कर रहे हैं। हमने 1000 से ज्यादा जगहों से जंगली मोरचेला इकट्ठा किया, वहां की मिट्टी, मौसम, पौधों और आसपास के वातावरण का अध्ययन किया। हमने 10 किस्मों को चुना और उनके लिए वैसा ही माहौल तैयार किया। इनमें से 3 में हमें सफलता मिली है और बाकी में भी उम्मीद है।”

क्या है योजना?

जहां सोफी और उनकी टीम ने इसे पॉलीहाउस में उगाया, वहीं प्रोफेसर विकास गुप्ता ने इसे खुले माहौल में भी उगाने में सफलता हासिल की है। सोफी ने बताया कि इसके लिए पेटेंट के लिए आवेदन भी किया जा चुका है। उन्होंने बताया कि बारामूला, अनंतनाग और श्रीनगर समेत घाटी के अलग-अलग इलाकों में इसकी खेती की गई है और आगे अलग-अलग ऊंचाई और मौसम वाले क्षेत्रों में भी इसे उगाने की योजना है।

मोरचेला की खेती वैज्ञानिकों के लिए हमेशा चुनौती रही है, क्योंकि यह काफी जटिल प्रकिया होती है और इसे खास तरह का पर्यावरण चाहिए होता है। डॉ सोफी ने कहा, “मोरचेला को उगने के लिए मिट्टी और मौसम दोनों में खास नमी और तापमान चाहिए होता है। अलग-अलग किस्मों को अलग-अलग पौधों के साथ तालमेल भी जरूरी होता है। हमने हर किस्म के लिए जरूरी हालात को बारीकी से समझा और वैसा ही माहौल तैयार किया।”

आमदनी बढ़ेगी

गौरतलब है कि इस मशरूम की अंतरराष्ट्रीय बाजार में काफी मांग है, इसलिए नियंत्रित तरीके से इसकी खेती जम्मू-कश्मीर की कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा बदलाव ला सकती है। डॉ सोफी ने बताया, “यह जम्मू-कश्मीर के लिए खास तौर पर कृषि बदलाव और जैव-अर्थव्यवस्था के विकास में अहम भूमिका निभा सकता है। इसकी अंतरराष्ट्रीय मांग ज्यादा है और यह तकनीक किसानों को एक महंगी फसल की ओर ले जाएगी, जिससे उनकी आमदनी बढ़ेगी।”

Jagriti Kumari

लेखक के बारे में

Jagriti Kumari

जागृति को छोटी उम्र से ही खबरों की दुनिया ने इतना रोमांचित किया कि पत्रकारिता को ही करियर बना लिया। 2 साल पहले लाइव हिन्दुस्तान के साथ करियर की शुरुआत हुई। उससे पहले डिग्री-डिप्लोमा सब जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन में। भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली से पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा और संत जेवियर्स कॉलेज रांची से स्नातक के बाद से खबरें लिखने का सिलसिला जारी। खबरों को इस तरह से बताना जैसे कोई बेहद दिलचस्प किस्सा, जागृति की खासियत है। अंतर्राष्ट्रीय संबंध और अर्थव्यवस्था की खबरों में गहरी रुचि। लाइव हिन्दुस्तान में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान शानदार कवरेज के लिए इंस्टा अवॉर्ड जीता और अब बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर रोजाना कुछ नया सीखने की ललक के साथ आगे बढ़ रही हैं। इसके अलावा सिनेमा को समझने की जिज्ञासा है।

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