भारतीय अधिकारी की मौत पर PoK में भी हो गईं आखें नम, सरहद पार से ही की आखिरी विदाई

Ankit Ojha लाइव हिन्दुस्तान
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कश्मीर के केरन गांव में एक नायब तहसीलदार की मौत हो गई। उनका शव जब दफनाने के लिए ले जाया गया तो उनके रिश्तेदार सरहद के उस पार खड़े होकर ही उन्हें अंतिम विदाई दे रहे थे। उनके ज्यादातर रिश्तेदार पीओके में रहते हैं।

भारतीय अधिकारी की मौत पर PoK में भी हो गईं आखें नम, सरहद पार से ही की आखिरी विदाई

धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला पूरा कश्मीर कभी भारत का ही हिस्सा हुआ करता था। आज खूबसूरत वादियों का कुछ हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है जिसे पीओके कहा जाता है। कई बार ऐसी घटनाएं सामने आती हैं जब लगता है कि ये सरहदें खत्म हो जानी चाहिए। उत्तर कश्मीर के केरन में रहने वाले एक तहसीलदार की मौत हुई तो उनकी अंतिम यात्रा में सीमा पार के लोग भी शामिल होना चाहते थे। हालांकि मजबूरी में वे नदी के उस पार से ही खड़े अंतिम संस्कार के गवाह बन रहे थे।

उत्तर कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में एलओसी के पास ही केरन गांव है। गांव के पास ही किशनगंगा नदी बहती है जिसे पाकिस्तान में नीलम नदी के नाम से जाना जाता है। यही पाकिस्तान और भारत का बॉर्डर माना जाता है। केरन के रहने वाले लियाकत अली खान गांदरबल में नायब तहसीलदार थे। दिल का दौरा पड़ने के बाद उनकी शनिवार को मौत हो गई।

जब उनका शव केरन पहुंचा तो उनकी मौत की खबर सोशल मीडिया पर फैल गई। लियाकत अली के कई रिश्तेदार पीओके में रहते हैं। उनको किशनगंगा नदी के किनार दफनाने के लिए ले जाया गया। लियाकत अली के रिश्तेदार किशनगंगा नदी के किनारे आकर खड़े हो गए। उन सबकी आंखें नम थीं लेकिन कोई अंतिम दर्शन करने भी शव के पास नहीं आ सकता था। क्योंकि बीच में सिर्फ नदी नहीं बल्कि भारत और पाकिस्तान की सीमा है।

गांव के लोगों ने बताया कि पहले लियाकत अली खान भी पीओके चले गए थे लेकिन बाद में वह वापस आ गए। कश्मीर में ही रहकर उन्होंने पढ़ाई की और फिर यहीं शादी हो गई। उनके चार बच्चे हैं। उनके ज्यादातर रिश्तेदार पीओके में ही रहते हैं। उनकी मां, चाचा और भाई कश्मीर में रहते हैं। लियाकत का शव नदी के किनारे कुछ समय के लिए रख दिया गया ताकि दूर से ही सही उनके अपने आखिरी बार उन्हें देख सकें।

एक ग्रामीण ने कहा कि इस घटना ने एक बार सबको झकझोर कर रख दिया है। अलग होना और दूर होना आसान नहीं होता। बंटवारा बहुत कष्टदायी होता है। इधर शव रखा गया था और नदी के उस पर उनके अपने रो रहे थे। वे केवल दूर से ही उन्हें आखिरी विदाई दे सकते थे। गांव के ही एक शख्स ने कहा कि सरहदों ने लोगों को इस कदर मजबूर कर दिया है कि एक साथ पले-बढ़े अपने रिश्तेदार भी एक मुट्ठी मिट्टी कब्र में नहीं डाल सकते।

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लेखक के बारे में

Ankit Ojha

विद्यालयी जीवन से ही कलात्मक अभिव्यक्ति, विचारशील स्वभाव और मिलनसार व्यक्तित्व और सामान्य के अंदर डुबकी लगाकर कुछ खास खोज लाने का कौशल पत्रकारिता के लिए अनुकूल साबित हुआ। अंकित ओझा एक दशक से डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के रहने वाले अंकित ओझा समाचारों की दुनिया में तथ्यों के महत्व के साथ ही संवेदनशीलता के पक्ष को साधने में निपुण हैं। पिछले चार साल से हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप के 'लाइव हिन्दुस्तान' के लिए चीफ कॉन्टेंट प्रड्यूसर पद पर कार्य कर रहे हैं। इससे पहले 'टाइम्स ऑफ इंडिया' और 'इंडियन एक्सप्रेस' ग्रुप के साथ भी कार्य कर चुके हैं।


राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, राज्य और सामाजिक सरोकारों की खबरों के संपादन में लंबा अनुभव होने के साथ ही अपने-आसपास की घटनाओं में समाचार तत्व निकालने की अच्छी समझ है। घटनाओं और समाचारों से संबंधित फैसले लेने और त्वरित समाचार प्रकाशित करने में विशेष योग्यता है। इसके अलावा तकनीक और पाठकों की बदलती आदतों के मुताबिक सामग्री को रूप देने के लिए निरंतर सीखने में विश्वास करते हैं। अंकित ओझा की रुचि राजनीति के साथ ही दर्शन, कविता और संगीत में भी है। लेखन और स्वरों के माध्यम से लंबे समय तक आकाशवाणी से भी जुड़े रहे। इसके अलावा ऑडियन्स से जुड़ने की कला की वजह से मंचीय प्रस्तुतियां भी सराही जाती हैं।


अकादमिक योग्यताः अंकित ओझा ने प्रारंभिक शिक्षा नवोदय विद्यालय से पूरी करने के बाद जामिया मिल्ल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता में ही ग्रैजुएशन किया है। इसके बाद भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में एमए किया है। जामिया में अध्ययन के दौरान ही इटैलियन और उर्दू भाषा में भी कोर्स किए हैं। इसके अलावा पंजाबी भाषा की भी अच्छी समझ रखते हैं। विश्वविद्यालय में NCC का 'C सर्टिफिकेट' भी प्राप्त किया है। IIMC और ऑक्सफर्ड से स्वास्थ्य पत्रकारिता का सर्टिफिकेट भी प्राप्त किया है।

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