
योगी आदित्यनाथ पर बनी फिल्म 'अजेय' को लेकर क्यों विवाद? HC बोला- पहले हम देखेंगे
आगामी सुनवाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त को निर्धारित की है। इस बीच, फिल्म के निर्माता और दर्शक कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार कर रहे हैं। इस फिल्म में अभिनेता अनंत जोशी मुख्य भूमिका में हैं।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जीवन पर आधारित फिल्म 'अजेय: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ ए योगी' को देखने का फैसला किया है। यह निर्णय फिल्म निर्माताओं द्वारा दायर एक याचिका के जवाब में लिया गया है। याचिका में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) द्वारा फिल्म को प्रमाणपत्र देने से इनकार करने के फैसले को चुनौती दी गई है। कोर्ट ने कहा कि वह फिल्म देखने के बाद सीबीएफसी की आपत्तियों के आधार पर सोमवार को अपना आदेश सुनाएगा।
फिल्म 'अजेय: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ ए योगी' पुस्तक 'द मॉन्क हू बिकेम चीफ मिनिस्टर' से प्रेरित है, जो कथित तौर पर योगी आदित्यनाथ के जीवन पर आधारित है। फिल्म के निर्माता, सम्राट सिनेमैटिक्स प्राइवेट लिमिटेड, ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि सीबीएफसी ने फिल्म, इसके ट्रेलर, टीजर और दो प्रचार गीतों के लिए प्रमाणपत्र देने से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि सीबीएफसी ने फिल्म को बिना देखे ही 21 जुलाई को एक ईमेल के जरिए प्रमाणन आवेदन खारिज कर दिया था।
कोर्ट ने मांगी फिल्म की कॉपी
न्यायमूर्ति रेवती मोहिते डेरे और न्यायमूर्ति नीला गोखले की पीठ ने गुरुवार को फिल्म निर्माताओं को फिल्म की एक कॉपी पेश करने का निर्देश दिया, जिसमें सीबीएफसी द्वारा बताए गए दृश्यों या हिस्सों को स्पष्ट रूप से चिह्नित किया गया हो। जिस पुस्तक पर फिल्म आधारित है, उसकी एक कॉपी पहले ही न्यायालय को सौंप दी गई है।
7 अगस्त के अपने पहले के आदेश में, न्यायालय ने सीबीएफसी को निर्देश दिया था कि वह फिल्म देखें और 11 अगस्त तक फिल्म निर्माताओं के साथ अपनी आपत्तियां साझा करें ताकि वे आवश्यक बदलाव करने पर विचार कर सकें। सीबीएफसी की जांच समिति ने 11 अगस्त को 29 आपत्तियां सूचीबद्ध कीं। हालांकि, जब फिल्म निर्माता 12 अगस्त तक कोई जवाब नहीं दे पाए या कोई बदलाव प्रस्तावित नहीं किया, तो सीबीएफसी की पुनरीक्षण समिति ने फिल्म देखी।
प्रमाणपत्र देने से ही इनकार
पुनरीक्षण समिति ने पहले की 8 आपत्तियों को खारिज कर दिया, लेकिन अंततः 17 अगस्त को प्रमाणपत्र देने से ही इनकार कर दिया। सोमवार (18 अगस्त) को, फिल्म निर्माताओं ने पुनरीक्षण समिति के आदेश को चुनौती देने के लिए अपनी याचिका में संशोधन करने की अनुमति मांगी। इसके बाद अदालत ने मामले की सुनवाई आज के लिए निर्धारित कर दी, ताकि पहले यह तय किया जा सके कि संशोधित याचिका स्वीकार्य है या नहीं, क्योंकि सिनेमैटोग्राफ अधिनियम के तहत अपील की व्यवस्था मौजूद है।
सीबीएफसी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभय खांडेपारकर ने आज अदालत को बताया कि बोर्ड ने पूरी प्रक्रिया के दौरान प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किया है और फिल्म निर्माताओं के पास सिनेमैटोग्राफ अधिनियम के तहत उच्च न्यायालय में अपील करने का विकल्प अभी भी मौजूद है। हालांकि, फिल्म निर्माताओं ने तर्क दिया कि यह याचिका इस न्यायालय में स्वीकार्य है। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रवि कदम ने दलील दी कि सीबीएफसी संशोधन समिति की अस्वीकृति न केवल फिल्म निर्माताओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है, बल्कि सीबीएफसी ने फिल्म को रिलीज करने की अनुमति देने से पहले उन्हें एक निजी व्यक्ति (योगी आदित्यनाथ) से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) प्राप्त करने का निर्देश देकर अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया है। कदम ने तर्क दिया, "वे किसी निजी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के संरक्षक नहीं हैं।"
कोर्ट की टिप्पणियां और निर्देश
न्यायमूर्ति रेवती मोहिते डेरे और नीला गोखले की पीठ ने गुरुवार को सुनवाई के दौरान सीबीएफसी को फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि बोर्ड ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया और फिल्म को प्रमाणपत्र देने से इनकार करने के लिए कोई ठोस आधार नहीं बताया। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि जब फिल्म एक ऐसी पुस्तक पर आधारित है जो पिछले आठ वर्षों से सार्वजनिक डोमेन में है, तो इसे प्रमाणपत्र देने से इनकार क्यों किया गया। कोर्ट ने टिप्पणी की, "अगर किताब पर कोई आपत्ति नहीं थी, तो इससे प्रेरित फिल्म सार्वजनिक व्यवस्था को कैसे भंग कर सकती है?"
कोर्ट ने फिल्म निर्माताओं को निर्देश दिया कि वे फिल्म की एक प्रति जमा करें, जिसमें सीबीएफसी द्वारा आपत्ति किए गए दृश्यों या हिस्सों को स्पष्ट रूप से चिह्नित किया जाए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि सिनेमैटोग्राफ एक्ट, 1952 की धारा 5-सी के तहत अपील का एक वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है, लेकिन यह कोर्ट के रिट क्षेत्राधिकार को पूरी तरह से रोक नहीं सकता।
सीबीएफसी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभय खांडेकर ने कोर्ट को बताया कि बोर्ड ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किया और फिल्म को देखने के बाद ही प्रमाणपत्र देने से इनकार किया गया। उन्होंने दावा किया कि फिल्म में योगी आदित्यनाथ के नाम, समयरेखा और भाषणों का उपयोग किया गया है, जिसके कारण इसे एक बायोपिक माना जा सकता है, भले ही निर्माता इसे काल्पनिक कहानी बता रहे हों। सीबीएफसी ने यह भी मांग की थी कि फिल्म को मंजूरी के लिए योगी आदित्यनाथ के कार्यालय से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (एनओसी) लिया जाए।
हालांकि, कोर्ट ने सीबीएफसी की इस मांग पर सवाल उठाया और कहा कि किसी संवैधानिक प्राधिकारी से एनओसी मांगना नियमों के अनुसार नहीं है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि अगर कोई आपत्तिजनक सामग्री है, तो बोर्ड को उसे स्पष्ट रूप से बताना चाहिए ताकि निर्माता आवश्यक बदलाव कर सकें या डिस्क्लेमर जोड़ा जा सके।
आगामी सुनवाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त को निर्धारित की है। इस बीच, फिल्म के निर्माता और दर्शक कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार कर रहे हैं। यह फिल्म, जिसमें अभिनेता अनंत जोशी मुख्य भूमिका में हैं, मूल रूप से 1 अगस्त को रिलीज होने वाली थी, लेकिन सेंसर बोर्ड के इनकार के कारण इसकी रिलीज टल गई है।

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