
पूर्व जजों, वकीलों और शिक्षाविदों के निशाने पर CJI सूर्यकांत; लिखी खुली चिट्ठी, किस बात पर ऐतराज?
चिट्ठी लिखने वालों में दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एपी शाह, मद्रास हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस के चंद्रू, पटना हाई कोर्ट की रिटायर्ड जज जस्टिस अंजना प्रकाश, राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी दिल्ली के पूर्व निदेशक प्रो. मोहन गोपाल भी शामिल हैं।
करीब दो दर्जन से ज्यादा पूर्व जजों, वकीलों और शिक्षाविदों ने देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत को एक खुला खत लिखकर रोहिंग्याओं के खिलाफ की गई उनकी टिप्पणियों पर आपत्ति जताई है। चिट्ठी में कहा गया है कि CJI द्वारा रोहिंग्याओं की तुलना घुसपैठियों से करना गलत है। इसके पीछे तर्क दिया गया है कि रोहिंग्या जुल्म और अत्याचार से भागे हुए लोग हैं। चिट्ठी लिखने वालों ने CJI से अपील की है कि वे सभी के लिए सम्मान और न्याय पर आधारित संवैधानिक नैतिकता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पक्का करें, चाहे कोई भी व्यक्ति हो और कहीं का भी हो।
पूर्व जजों और वकीलों के साथ कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स टीम भी CJI को चिट्ठी लिखने वालों में शामिल है। इस खुली चिट्ठी में इन लोगों ने हाल ही में हुई सुनवाई में CJI की बेंच द्वारा रोहिंग्या शरणार्थियों के बारे में की गई टिप्पणी पर चिंता जताई है। बता दें कि इसी हफ्ते यानी 2 दिसंबर को, रोहिंग्याओं के संबंध में दायर एक याचिका पर तीखी टिप्पणी करते हुए CJI सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने पूछा था कि क्या भारत में रह रहे ‘घुसपैठियों' के स्वागत के लिए ‘रेड कार्पेट’ बिछाना चाहिए जबकि देश के अपने नागरिक गरीबी से जूझ रहे हैं।
शरणार्थी घोषित करने का आदेश कहां है?
मंगलवार को सुनवाई के दौरान CJI ने पूछा था, “भारत सरकार का उन्हें (रोहिंग्याओं को) शरणार्थी घोषित करने का आदेश कहां है? शरणार्थी एक अच्छी तरह से तय कानूनी शब्द है और उन्हें घोषित करने के लिए सरकार की तरफ से एक तय अथॉरिटी है। अगर किसी रिफ्यूजी का कोई कानूनी स्टेटस नहीं है, और कोई घुसपैठिया है, और वह गैर-कानूनी तरीके से घुसता है, तो क्या हमारी यह ज़िम्मेदारी है कि हम उसे यहां रखें?”
CJI ने कहा था, "पहले आप प्रवेश करते हैं, आप अवैध रूप से सीमा पार करते हैं। आपने सुरंग खोदी या बाड़ पार की और अवैध रूप से भारत में दाखिल हुए। फिर आप कहते हैं, अब जब मैं प्रवेश कर गया हूं, तो आपके कानून मुझ पर लागू होने चाहिए और मैं भोजन का हकदार हूं, मैं आश्रय का हकदार हूं, मेरे बच्चे शिक्षा के हकदार हैं। क्या हम कानून को इस तरह से खींचना चाहते हैं।"
बेंच की बातें संविधान के मुख्य मूल्यों के खिलाफ हैं
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, CJI की इन्हीं बातों पर इस चिट्ठी में आपत्ति जताई गई है और कहा गया है कि रोहिंग्या शरणार्थियों को भारत में घुसने के लिए “अवैध घुसपैठिए जो सुरंग खोद रहे हैं” जैसा मानना गलत है। चिट्ठी में कहा गया है, “बेंच की बातें संविधान के मुख्य मूल्यों के खिलाफ हैं। इनका असर रोहिंग्या शरणार्थियों के साथ अमानवीय व्यवहार करने जैसा रहा है, जिनकी इंसानियत और मानवाधिकार संविधान, हमारे कानूनों और अंतरराष्ट्रीय कानूनों से सुरक्षित हैं।”
थर्ड डिग्री तरीकों से नहीं गुजरना चाहिए
चिट्ठी में बेंच के कथित बयानों पर खास तौर पर आपत्ति जताई गई है, जिसमें रोहिंग्या के रिफ्यूजी के तौर पर कानूनी दर्जे पर सवाल उठाए गए हैं, और उनकी तुलना भारत में गैर-कानूनी तरीके से घुसने वाले घुसपैठियों से की गई है। चिट्ठी में उन लोगों का भी ज़िक्र किया गया है जो गैर-कानूनी तरीके से घुसने के लिए सुरंग खोदते हैं और यह सवाल किया गया है कि क्या ऐसे लोग खाना, रहने की जगह और पढ़ाई के हकदार हैं, रिफ्यूजी को संविधान से मिले बुनियादी हकों से इनकार करने के लिए घरेलू गरीबी का भी हवाला दिया गया है और यह सुझाव दिया गया है कि भारत में उनके साथ होने वाले बर्ताव में उन्हें थर्ड डिग्री तरीकों से नहीं गुज़रना चाहिए।
चिट्ठी लिखने वालों में कौन-कौन?
CJI को चिट्ठी लिखने वालों में दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एपी शाह, मद्रास हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस के चंद्रू, पटना हाई कोर्ट की रिटायर्ड जज जस्टिस अंजना प्रकाश, राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी दिल्ली के पूर्व निदेशक प्रो. मोहन गोपाल, सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन, प्रशांत भूषण, कामिनी जायसवाल समेत करीब 30 लोग हैं।





