मौसम विभाग और ऐप से भी पहले किसान आसमान पढ़कर बता देते थे कब बरसेंगे बादल!

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सबसे खास बात यह थी कि किसान कभी भी किसी एक संकेत के भरोसे कोई फैसला नहीं लेते थे। वे आसमान की स्थिति, पंचांग के गणित और जीव-जंतुओं के बदले व्यवहार, इन सब कड़ियों को आपस में जोड़ते थे।

मौसम विभाग और ऐप से भी पहले किसान आसमान पढ़कर बता देते थे कब बरसेंगे बादल!

आज भले ही सैटेलाइट और सुपरकंप्यूटर मौसम का हाल बताते हैं, लेकिन बरसों से हमारे देश के किसान आसमान की हर हलचल को अपनी आंखों से पढ़कर जान जाते थे कि बारिश कब होगी। यह कोई अंधविश्वास या हवा-हवाई बातें नहीं थीं, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव और वैज्ञानिक समझ पर टिका एक मजबूत सिस्टम था, जो सदियों से लिखित रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता रहा। तो आइए जानते हैं कि बिना किसी आधुनिक तकनीक के, हमारे बुजुर्ग बारिश का अंदाजा कैसे लगाते थे।

नक्षत्रों की चाल और पंचांग का गणित

भारत में बारिश का अंदाजा लगाने का सबसे पुराना तरीका खगोल विज्ञान से जुड़ा रहा है। प्राचीन ग्रंथ 'वेदांग ज्योतिष' ने उस हिंदू पंचांग की नींव रखी, जिसे आज भी देश के बड़े हिस्से में लोग देखते हैं। सूरज, चांद और तारों की चाल को ट्रैक करके हमारे पूर्वज यह पहले ही जान लेते थे कि मौसम कब करवट लेगा और मानसून कब दस्तक देगा।

छठी शताब्दी के महान खगोलशास्त्री और विद्वान वराहमिहिर ने अपने ग्रंथ 'बृहत संहिता' में इस समझ को और विस्तार दिया। उन्होंने बताया कि ग्रहों की स्थिति, बादलों के रंग और हवा के रुख का बारिश से क्या सीधा कनेक्शन है। आज के रिसर्चर्स भी मानते हैं कि उनकी कई बातें आधुनिक मौसम विज्ञान से काफी मिलती-जुलती हैं।

पहले के समय में, हिंदू नववर्ष के मौके पर गांवों में 'ग्राम जोशी' या ज्योतिषी पूरे साल की बारिश और फसलों का लेखा-जोखा पढ़कर सुनाते थे। पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोए गए इसी गणित के भरोसे किसान अपनी बुआई और खेती की प्लानिंग करते थे।

आंध्र प्रदेश की अनोखी परंपरा: 'तट्टा संकेतम्'

खगोलीय गणनाओं के साथ-साथ किसानों ने अपने स्थानीय और अनोखे तरीके भी विकसित कर लिए थे। जैसे आंध्र प्रदेश का एक पारंपरिक तरीका है, जिसे 'तट्टा संकेतम्' कहा जाता है। इसमें अनाज से भरी एक टोकरी के ऊपर पानी का लोटा रख दिया जाता था और एक बच्चा उसे बड़े ध्यान से बैलेंस करता था। इसके बाद लोटा जिस दिशा में गिरता था, उसे ग्रहों की स्थिति के साथ मिलाकर देखा जाता था और अंदाजा लगाया जाता था कि इस बार मानसून कैसा रहेगा।

जब पशु-पक्षी और कीड़े बन जाते थे 'वेदर रिपोर्टर'

किसान सिर्फ आसमान ही नहीं देखते थे, बल्कि अपने आस-पास के जीव-जंतुओं के व्यवहार को भी बारीकी से भांपते थे। उनके लिए ये जानवर ही मौसम की सबसे सटीक रिपोर्ट देते थे।

बकरियां और उल्लू: अगर बकरियां बार-बार अपने कान फड़फड़ाने लगें या रात के समय उल्लू लगातार आवाजें करने लगें, तो समझ लिया जाता था कि बारिश बहुत करीब है।

कीड़े-मकोड़े और मकड़ियां: लाल बालों वाले झिंझू (कैटरपिलर) का तेजी से सुरक्षित जगहों की तरफ भागना, मधुमक्खियों का वक्त से पहले अपने छत्ते में लौट आना और मकड़ियों का आनन-फानन में अपने जाले को ठीक करना- ये सब आने वाले तूफान या बारिश के सीधे संकेत थे।

चूल्हे का धुआं: शाम को खाना बनाते समय अगर चूल्हे का धुआं ऊपर उठने के बजाय जमीन के पास ही फैला रहे, तो माना जाता था कि हवा में नमी बढ़ गई है और अब बादल बरसने ही वाले हैं।

क्या कहता है आज का विज्ञान?

आज के वैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं कि कई कीड़े-मकोड़े अपने एंटिना की मदद से इंसानों की तुलना में बहुत पहले ही हवा की नमी और तापमान के बदलाव को महसूस कर लेते हैं। यही वजह है कि किसानों के ये देसी तरीके अक्सर बिल्कुल सही साबित होते थे।

सबसे खास बात यह थी कि किसान कभी भी किसी एक संकेत के भरोसे कोई फैसला नहीं लेते थे। वे आसमान की स्थिति, पंचांग के गणित और जीव-जंतुओं के बदले व्यवहार, इन सब कड़ियों को आपस में जोड़ते थे। जब सारे संकेत एक जैसे मिलते, तभी वे खेत में बीज डालने का बड़ा फैसला करते थे। खेती में जोखिम ज्यादा था, इसलिए उनकी यह तैयारी और अनुशासन भी गजब का था।

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Shubham Sharma

लेखक के बारे में

Shubham Sharma
शुभम शर्मा साल 2017 से पत्रकारिता और मीडिया जगत में काम कर रहे हैं। टीवी में इनपुट असाइनमेंट से शुरुआत करते हुए डिजिटल मीडिया की दुनिया में कदम रखा। ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क तक का अनुभव। TV9 भारतवर्ष और मनीकंट्रोल हिंदी (Network 18) जैसे बड़े संस्थानों के बाद अब लाइव हिंदुस्तान में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर खबरों को आप तक पहुंचाने के काम कर रहे हैं। और पढ़ें