चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को स्वतंत्र रूप से काम करना चाहिए, सुप्रीम कोर्ट की जज का बड़ा बयान

Apr 04, 2026 05:09 pm ISTMadan Tiwari लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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जज ने कहा कि चुनाव आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक और वित्त आयोग का डिजाइन एक जैसा है। ये संस्थाएं बाहरी प्रभावों से मुक्त, विशेषीकृत हैं और इन्हें ऐसे क्षेत्रों की देखरेख का काम सौंपा गया है, जहां निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए सामान्य राजनीतिक प्रक्रियाएं शायद पर्याप्त न हों।

चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को स्वतंत्र रूप से काम करना चाहिए, सुप्रीम कोर्ट की जज का बड़ा बयान

सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने शनिवार को बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को स्वतंत्र रूप से काम करना चाहिए और उन पर राजनैतिक प्रतिक्रियाओं का कोई असर नहीं पड़ना चाहिए। जस्टिस नागरत्ना ने कहा, ''चुनाव केवल समय-समय पर होने वाली घटनाएं नहीं हैं। वे एक ऐसा तंत्र हैं जिसके माध्यम से राजनीतिक सत्ता का गठन होता है। हमारे संवैधानिक लोकतंत्र ने यह भली-भांति सिद्ध किया है कि समय पर चुनाव होने के कारण सरकार में परिवर्तन सुचारू रूप से होते हैं। इस प्रक्रिया पर नियंत्रण का अर्थ, वास्तव में, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की शर्तों पर ही नियंत्रण है।"

जस्टिस बीवी नागरत्ना पटना के चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में अधिकारों से परे संविधानवाद: संरचना क्यों मायने रखती है, के विषय पर डॉ राजेंद्र प्रसाद स्मारक व्याख्यान दे रही थीं। बार एंड बेंच के अनुसार, उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) और वित्त आयोग का डिजाइन एक जैसा है। ये संस्थाएं बाहरी प्रभावों से मुक्त, विशेषीकृत हैं और इन्हें ऐसे क्षेत्रों की देखरेख का काम सौंपा गया है, जहां निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए सामान्य राजनीतिक प्रक्रियाएं शायद पर्याप्त न हों। उन्होंने कहा, "यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि ये संस्थाएं स्वतंत्र रूप से कार्य करें और राजनीतिक प्रक्रियाओं से प्रभावित न हों।" भारत के लोकतंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका पर कमेंट करते हुए, जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि चुनाव केवल समय-समय पर होने वाली घटनाएं नहीं हैं, बल्कि एक ऐसा तंत्र हैं जिसके माध्यम से राजनीतिक सत्ता का गठन होता है।

जज ने आगे कहा, "हमारे संवैधानिक लोकतंत्र ने यह भली-भांति साबित कर दिया है कि समय पर चुनाव होने के कारण सरकार में बदलाव का काम कितनी आसानी से होता है। इस प्रक्रिया पर नियंत्रण का मतलब, असल में, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की शर्तों पर ही नियंत्रण रखना है।'' उन्होंने आगे कहा, "टीएन शेशन बनाम भारत संघ मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था के रूप में मान्यता दी, जिसे चुनावों की निष्पक्षता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। एक बार फिर, चिंता का विषय ढांचागत था। यदि चुनाव कराने वाले लोग उन लोगों पर निर्भर हों जो चुनाव लड़ते हैं, तो इस प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित नहीं की जा सकती।"

'इतिहास से सबक मिलता है...'

उन्होंने यह भी कहा कि इतिहास से सबक मिलता है कि संवैधानिक ढांचे का पतन तब होता है जब उसकी संरचना को कमजोर कर दिया जाता है, और अधिकारों का हनन तो बस उसके बाद होता है। संरचना का यह विघटन तब होता है जब संस्थाएं एक-दूसरे पर निगरानी रखना बंद कर देती हैं। ऐसे समय में, चुनाव होते रह सकते हैं, अदालतें काम करती रह सकती हैं, संसद द्वारा कानून बनाए जा सकते हैं और फिर भी, सत्ता पर प्रभावी रूप से कोई अंकुश नहीं रहता, क्योंकि ढांचागत अनुशासन अब मौजूद नहीं रहता।''

Madan Tiwari

लेखक के बारे में

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लखनऊ के रहने वाले मदन तिवारी वरिष्ठ पत्रकार हैं और मीडिया में एक दशक से ज्यादा का अनुभव है।
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वर्तमान में मदन हिन्दुस्तान अखबार की न्यूज वेबसाइट लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स डिजिटल) में डिप्टी न्यूज एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। जागरण इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड मास कम्युनिकेशन से पत्रकारिता की पढ़ाई की। कक्षा 12वीं के बाद से ही दैनिक जागरण, अमर उजाला, जनसत्ता समेत तमाम अखबारों में संपादकीय पृष्ठ पर लिखना शुरू किया। महज दो सालों में विभिन्न राष्ट्रीय और क्षेत्रियों अखबारों में दो सौ से अधिक आलेख प्रकाशित हुए। ग्रेजुएशन करते समय ही मीडिया में नौकरी की शुरुआत की। लाइव हिन्दुस्तान में अभी दूसरी पारी है और दोनों पारियों को मिलाकर यहां आठ साल से ज्यादा हो चुके हैं। कुल एक दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। मदन आजतक जैसे अन्य संस्थानों में भी काम कर चुके हैं।

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