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दहेज केवल हिंदुओं तक सीमित नहीं, इस्लाम में भी... SC ने दिए सख्त निर्देश; 24 साल पुराना फैसला रद्द

दहेज केवल हिंदुओं तक सीमित नहीं, इस्लाम में भी... SC ने दिए सख्त निर्देश; 24 साल पुराना फैसला रद्द

संक्षेप:

सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रथा को गंभीर अभिशाप करार देते हुए 24 साल पुराना फैसला रद्द किया। कोर्ट ने कहा कि यह प्रथा सभी धर्मों में फैली हुई है और महिलाओं के खिलाफ उत्पीड़न को बढ़ावा देती है। क्या यह निर्णय समाज में बदलाव लाएगा?

Dec 16, 2025 11:34 am ISTAmit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक कड़े फैसले में दहेज की कुप्रथा को समाज का गंभीर अभिशाप करार देते हुए कहा कि कानूनी प्रतिबंध के बावजूद यह प्रथा 'उपहार' और सामाजिक अपेक्षाओं के रूप में छिपकर फल-फूल रही है। यह प्रथा महिलाओं के साथ विवाह में उत्पीड़न, क्रूरता और मौतों से जुड़ी हुई है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की अपीलों पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2003 के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें दहेज मौत के एक मामले में आरोपी पति अजमल बेग और उसकी मां जमीला बेग को बरी कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की सजा को बहाल कर दिया।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला 20 वर्षीय नसरीन की मौत से जुड़ा है, जिनकी शादी अजमल बेग से हुई थी और शादी के एक साल से कुछ अधिक समय बाद जलकर मृत्यु हो गई। सरकारी वकीलों ने साबित किया कि ससुराल वाले बार-बार कलर टीवी, मोटरसाइकिल और 15,000 रुपये नकद की मांग कर रहे थे। ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को आईपीसी की धारा 304बी (दहेज मौत), 498ए (पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा महिला के साथ क्रूरता) और दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं के तहत दोषी ठहराया था।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की उस दलील को खारिज कर दिया कि गरीबी के कारण दहेज की मांग अविश्वसनीय है। पीठ ने कहा कि यह तर्क तर्कसंगत नहीं लगता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दहेज निषेध अधिनियम शादी से पहले या बाद में की गई मांगों के बीच भेद नहीं करता।

दोषियों की सजा बहाल करते हुए कोर्ट ने मानवीय आधार पर 94 वर्षीय जमीला बेग को जेल नहीं भेजने का फैसला किया, क्योंकि उनकी उम्र को देखते हुए कारावास का कोई उद्देश्य पूरा नहीं होता। वहीं, अजमल बेग को चार सप्ताह के अंदर आत्मसमर्पण कर ट्रायल कोर्ट की सजा भुगतने का निर्देश दिया गया।

दहेज प्रथा पर कोर्ट की गंभीर टिप्पणियां

पीठ ने कहा कि दहेज प्रथा संविधान में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों के विपरीत है, खासकर अनुच्छेद 14 जो कानून के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण की गारंटी देता है। यह प्रथा महिलाओं को वित्तीय शोषण का साधन बनाती है और संरचनात्मक भेदभाव को बढ़ावा देती है।

कोर्ट ने कहा कि मूल रूप से बेटी की वित्तीय स्वतंत्रता के लिए स्वैच्छिक उपहार देने की प्रथा समय के साथ संस्थागत रूप ले चुकी है और अब दूल्हे की 'कीमत' तय करने का माध्यम बन गई है। इससे समाज में महिलाओं का अवमूल्यन होता है।

महत्वपूर्ण रूप से, कोर्ट ने कहा कि दहेज केवल हिंदू समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी धर्मों और समुदायों में फैला हुआ है। इस्लामी कानून में मेहर (दूल्हे से दुल्हन को अनिवार्य उपहार) की व्यवस्था होने के बावजूद, उपमहाद्वीप में सामाजिक प्रथाओं के कारण नाममात्र का मेहर रखकर दहेज लिया जाता है, जिससे मेहर का सुरक्षा उद्देश्य खोखला हो जाता है। इससे भी महिलाओं में उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और दहेज मौतें जुड़ी हैं। पीठ ने कहा कि स्वतंत्रता का मतलब केवल राजनीतिक आजादी नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन भी था। दहेज जैसी रूढ़ियां संवैधानिक दृष्टि के विपरीत हैं।

दहेज उन्मूलन के लिए व्यापक निर्देश

दहेज संबंधी उत्पीड़न और मौतों की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व राज्य सरकारों, अदालतों और अधिकारियों को निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  • राज्यों और केंद्र सरकार को सामाजिक सोच के स्तर पर दहेज की समस्या से निपटने के लिए एजुकेशनल सिलेबस में समानता के संवैधानिक मूल्यों को शामिल करने पर विचार करना चाहिए।
  • दहेज निषेध अधिकारियों की उचित नियुक्ति, सशक्तिकरण और सार्वजनिक दृश्यता सुनिश्चित की जाए।
  • पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को दहेज मामलों के सामाजिक-मनोवैज्ञानिक आयामों की समझ और वास्तविक मामलों को दुरुपयोग से अलग करने के लिए नियमित प्रशिक्षण दिया जाए।
  • हाईकोर्ट्स धारा 304बी और 498ए के लंबित मामलों का जायजा लें और उनका शीघ्र निपटारा सुनिश्चित करें।
  • जिला प्रशासन और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण औपचारिक शिक्षा से बाहर की आबादी के लिए नियमित जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करें।

कोर्ट ने फैसले की प्रति सभी हाईकोर्ट्स और राज्य सरकारों को भेजने का निर्देश दिया तथा अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए मामले को आगे की निगरानी के लिए सूचीबद्ध किया। यह फैसला दहेज जैसी सामाजिक कुरीति के खिलाफ मजबूत संदेश देता है और कानून के प्रभावी कार्यान्वयन पर जोर देता है।

Amit Kumar

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