
दंड देने की शक्ति जजों की ढाल नहीं है, 'डॉग माफिया' केस में SC ने महिला को दी राहत; HC को सुनाया
सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि श्रीनंदन की टिप्पणी अवमानना की श्रेणी में आती है, लेकिन हाई कोर्ट का उनकी माफी को खारिज करना उचित नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान बेहद अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि अवमानना के लिए सजा देने की शक्ति का उद्देश्य न्यायाधीशों को आलोचना से बचाना नहीं है, बल्कि संस्थान की गरिमा को बनाए रखना है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने यह टिप्पणी बॉम्बे हाईकोर्ट के एक आदेश को रद्द करते हुए की। हाई कोर्ट ने अपने एक आदेश में नवी मुंबई की एक निवासी को डॉग माफिया से जुड़े एक सर्कुलर के लिए आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराया गया था। शीर्ष अदालत की पीठ ने कहा कि जहां अवमानना के मामलों में दंड देने का अधिकार है, वहीं क्षमा करने और दया दिखाने की शक्ति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है- विशेषकर तब जब अवमाननाकर्ता सच्चे मन से पछतावा जताए।
एक आवासीय सोसाइटी के सर्कुलर से शुरू हुआ विवाद
यह मामला जनवरी 2025 के एक सर्कुलर से जुड़ा है जिसे सीवुड्स एस्टेट्स लिमिटेड, नवी मुंबई की तत्कालीन सांस्कृतिक निदेशक वीनीता श्रीनंदन ने जारी किया था। सोसाइटी में आवारा कुत्तों को खाना खिलाने को लेकर चल रहे विवाद के बीच उन्होंने सर्कुलर में आरोप लगाया था कि कुत्तों को खाना खिलाने के पीछे न्यायिक प्रणाली में मजबूत उपस्थिति रखने वाले प्रशिक्षित पेशेवरों का हाथ है।
सर्कुलर में न्यायपालिका पर डॉग माफिया को संरक्षण देने का भी आरोप लगाया गया था। यह दस्तावेज 1,500 से अधिक निवासियों के बीच प्रसारित हुआ, जिसके बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए श्रीनंदन को आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराया। हाई कोर्ट ने कहा कि यह सर्कुलर न्यायालय की छवि को धूमिल करने और संस्था को बदनाम करने की कोशिश के तहत जारी किया गया था। अदालत ने उनकी माफी को उधार का पछतावा बताते हुए अस्वीकार कर दिया और एक सप्ताह की साधारण कैद और 2,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई।
सुप्रीम कोर्ट: माफी को केवल इसलिए अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि वह शर्तों के साथ है
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि श्रीनंदन की टिप्पणी अवमानना की श्रेणी में आती है, लेकिन हाई कोर्ट का उनकी माफी को खारिज करना उचित नहीं था। न्यायालय ने अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 12 का हवाला देते हुए कहा कि यदि माफी ईमानदारी से मांगी गई हो तो उसे सिर्फ इसलिए अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि वह सशर्त या योग्य है। पीठ ने कहा- दंड देने की शक्ति में क्षमा करने की समानांतर शक्ति भी निहित है- जब व्यक्ति सच्चे मन से गलती स्वीकार करे और पश्चाताप दिखाए। यह शक्ति जजों की व्यक्तिगत ढाल नहीं है और न ही आलोचना को चुप कराने का हथियार।
कोर्ट ने कहा- दंड ही एकमात्र साधन नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अवमानना के मामलों में अदालतों को संयम, करुणा और संतुलन के साथ काम करना चाहिए। पीठ ने स्पष्ट कहा कि जहां वास्तविक पछतावा दिखे, वहां दया न्यायिक अंतरात्मा का अनिवार्य हिस्सा होनी चाहिए। दंड के साथ उदारता भी अवमानना कानून का हिस्सा है।
न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि डीसी सक्सेना बनाम भारत के मुख्य न्यायाधीश और राजेंद्र सेल बनाम एमपी हाईकोर्ट बार एसोसिएशन जैसे पूर्ववर्ती मामलों पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने भरोसा किया लेकिन ये मामले अलग हैं क्योंकि उनमें कहीं अधिक गंभीर आरोप थे और माफी से इनकार किया गया था।
सजा समाप्त, दोषसिद्धि रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि श्रीनंदन का पछतावा वास्तविक था और माफी तुरंत मांगी गई थी। अदालत ने कहा- न्याय के हित में, दंड को समाप्त किया जाता है। अवमानना कानून सजा देने का ही नहीं, माफी देने का भी अधिकार देता है- जहां सच्चा पश्चाताप हो। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट का अप्रैल 2025 का दोषसिद्धि आदेश रद्द करते हुए सजा को भी समाप्त कर दिया।





