0.19% यानी 68000 एकड़; आंकड़ों में न उलझाएं मंत्री, सीधे बताएं क्या मजबूरी? अरावली विवाद में कांग्रेस

Dec 23, 2025 07:09 pm ISTPramod Praveen भाषा, नई दिल्ली
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जयराम रमेश ने सवाल किया कि मोदी सरकार उन्हें फिर से परिभाषित करने पर क्यों आमादा है? किस उद्देश्य से? किसके लाभ के लिए? और भारतीय वन सर्वेक्षण जैसी पेशेवर संस्था की सिफारिशों को जानबूझकर क्यों नजरअंदाज किया जा रहा है?

0.19% यानी 68000 एकड़; आंकड़ों में न उलझाएं मंत्री, सीधे बताएं क्या मजबूरी? अरावली विवाद में कांग्रेस

Aravalli Dispute Row: कांग्रेस ने अरावली के मुद्दे को लेकर मंगलवार को मोदी सरकार पर फिर निशाना साधा और सवाल किया कि वह इस पर्वतमाला को पुनः परिभाषित करने को लेकर इतनी आमादा क्यों है? पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने यह भी कहा कि इस मामले पर पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के ‘स्पष्टीकरण’ ने और भी सवाल खड़े कर दिए हैं। भूपेन्द्र यादव ने सोमवार को कांग्रेस पर अरावली की नई परिभाषा के मुद्दे पर ‘गलत सूचना’ और ‘झूठ’ फैलाने का आरोप लगाते हुए कहा था कि पर्वत शृंखला के केवल 0.19 प्रतिशत हिस्से में ही कानूनी रूप से खनन किया जा सकता है।

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यादव ने कहा था कि नरेन्द्र मोदी सरकार अरावली की सुरक्षा और पुनर्स्थापन के लिए ‘पूरी तरह से प्रतिबद्ध’ है। इस पर पलटवार करते हुए जयराम रमेश ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ‘‘अरावली मुद्दे पर पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री द्वारा हाल में दिया गया “स्पष्टीकरण” और भी अधिक सवाल और शंकाएं खड़ी करता है। मंत्री का कहना है कि अरावली के कुल 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में से केवल 0.19 प्रतिशत क्षेत्र ही वर्तमान में खनन पट्टों के अंतर्गत है। लेकिन 0.19% क्षेत्र का मतलब भी लगभग 68,000 एकड़ भूमि बनती है, जो अपने आप में बहुत बड़ा क्षेत्र है।’’

1.44 लाख वर्ग किलोमीटर का आंकड़ा भी भ्रामक

उन्होंने दावा किया कि 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर का यह आंकड़ा भी भ्रामक है। रमेश का कहना है, ‘‘इसमें चार राज्यों के 34 जिलों का पूरा भौगोलिक क्षेत्र शामिल कर लिया गया है, जिन्हें मंत्रालय ने “अरावली जिले” माना है। यह गलत आधार है।’’ कांग्रेस नेता के मुताबिक, सही आधार तो उन जिलों के भीतर वास्तविक अरावली पर्वत शृंखला के अंतर्गत आने वाला क्षेत्र होना चाहिए। रमेश ने कहा कि यदि वास्तविक अरावली क्षेत्र को आधार बनाया जाए, तो 0.19 प्रतिशत का आंकड़ा बहुत कम आकलन साबित होगा।

अरावली की परिभाषा क्यों बदलनी पड़ी?

बाद में ANI से बात करते हुए रमेश ने कहा, "अरावली को और हरा-भरा बनाया जाना चाहिए और उसकी रक्षा की जानी चाहिए, लेकिन वे वहां माइनिंग को बढ़ावा क्यों दे रहे हैं? अरावली के पूरे इकोसिस्टम का संतुलन बदल जाएगा। मुझे एक ऐसे मंत्री से यह उम्मीद नहीं थी जिसने 2010 में पर्यावरण की रक्षा पर एक किताब लिखी थी। उन्होंने कल जिस तरह का स्पष्टीकरण दिया, उससे और भी सवाल खड़े हो गए हैं। बहुत चालाकी से उन्होंने कहा कि वे अरावली की रक्षा करना चाहते हैं, लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है... उन्होंने अरावली पहाड़ियों के 0.19% का फैसला किस आधार पर किया है? अरावली पहाड़ियों का वह 0.19% यानी 68,000 एकड़ ज़मीन... यह आंकड़ों का खेल है। पर्यावरण को आंकड़ों का खेल नहीं बनाया जाना चाहिए।" रमेश ने पूछा कि ऐसी क्या मजबूरी थी कि आपको अरावली की यह परिभाषा बदलनी पड़ी?

उन्होंने यह भी कहा, ‘‘जिन 34 जिलों में से 15 जिलों के आंकड़े सत्यापित किए जा सकते हैं, उनमें अरावली क्षेत्र कुल भूमि का लगभग 33 प्रतिशत है। इस बारे में बिल्कुल भी स्पष्टता नहीं है कि नई परिभाषा के तहत इन अरावली क्षेत्रों में से कितना हिस्सा संरक्षण से बाहर कर दिया जाएगा और खनन व अन्य विकास कार्यों के लिए खोल दिया जाएगा।’’ रमेश का कहना है, ‘‘यदि मंत्री के सुझाव के अनुसार स्थानीय स्थितियों को आधार बनाया जाता है, तो 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली कई पहाड़ियां भी संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगी।’’

Aravalli Dispute Row

उन्होंने कहा कि संशोधित परिभाषा के कारण दिल्ली-एनसीआर में अरावली की अधिकांश पहाड़ी पट्टियां रियल एस्टेट विकास के लिए खोल दी जाएंगी, जिससे पर्यावरणीय दबाव और अधिक बढ़ेगा। रमेश ने कहा, ‘‘मंत्री, जो खनन को अनुमति देने के लिए सरिस्का टाइगर रिज़र्व की सीमाओं को पुनः परिभाषित करने की पहल कर रहे हैं, इस बुनियादी तथ्य की अनदेखी कर रहे हैं कि एक परस्पर जुड़े हुए पारिस्थितिकी तंत्र के विखंडन से उसका पारिस्थितिक दायरा गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो जाता है। अन्य स्थानों पर ऐसा विखंडन पहले ही भारी तबाही मचा रहा है।’’

रमेश ने इस बात पर जोर दिया, ‘‘अरावली हमारी प्राकृतिक विरासत का हिस्सा हैं और उनका पारिस्थितिकी महत्व अत्यंत व्यापक है। उन्हें बड़े पैमाने पर पुनर्स्थापन और सार्थक संरक्षण की आवश्यकता है।’’उन्होंने सवाल किया, ‘‘फिर मोदी सरकार उन्हें फिर से परिभाषित करने पर क्यों आमादा है? किस उद्देश्य से? किसके लाभ के लिए? और भारतीय वन सर्वेक्षण जैसी पेशेवर संस्था की सिफारिशों को जानबूझकर क्यों नज़रअंदाज़ किया जा रहा है?’’

Pramod Praveen

लेखक के बारे में

Pramod Praveen

प्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।

अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।

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