जब भाजपा ने मिलाया था महबूबा की PDP से हाथ, तमिलनाडु में दोहराएगा जम्मू-कश्मीर वाला किस्सा?

Amit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, चेन्नई
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क्या तमिलनाडु में जम्मू-कश्मीर (BJP-PDP) जैसा गठबंधन देखने को मिलेगा? थलपति विजय की नई पार्टी TVK को सत्ता से दूर रखने के लिए घोर विरोधी DMK और AIADMK के हाथ मिलाने की पूरी इनसाइड स्टोरी और सियासी समीकरण यहां पढ़ें।

जब भाजपा ने मिलाया था महबूबा की PDP से हाथ, तमिलनाडु में दोहराएगा जम्मू-कश्मीर वाला किस्सा?

राजनीति के बारे में एक पुरानी कहावत है- यहां न कोई स्थायी दोस्त होता है और न ही कोई स्थायी दुश्मन। सियासत में कब, कौन सी चाल चली जाए और कौन से दो धुर विरोधी सत्ता के लिए एक मंच पर आ जाएं, इसकी भविष्यवाणी करना लगभग असंभव है। साल 2015 में जब जम्मू-कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी (BJP) और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) ने मिलकर सरकार बनाई थी, तो पूरे देश ने इस 'असंभव' गठबंधन को हकीकत में बदलते देखा था। अब राजनीतिक गलियारों में यह सुगबुगाहट तेज है कि क्या दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु में भी कुछ ऐसा ही अभूतपूर्व नजारा देखने को मिल सकता है? कयास लगाए जा रहे हैं कि दशकों पुराने दुश्मन- द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (DMK) और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (AIADMK) राज्य में TVK को सत्ता से दूर रखने के लिए हाथ मिला सकते हैं।

जम्मू-कश्मीर का वह ऐतिहासिक गठबंधन: जब मिले 'नॉर्थ और साउथ पोल'

तमिलनाडु के मौजूदा समीकरणों को समझने के लिए जम्मू-कश्मीर के उस ऐतिहासिक राजनीतिक घटनाक्रम को याद करना जरूरी है। 2014 के जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। तब अपनी कट्टर हिंदुत्ववादी छवि वाली भाजपा और कश्मीर केंद्रित नरम अलगाववादी रुख रखने वाली पीडीपी ने न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत गठबंधन किया था।

तत्कालीन पीडीपी नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद ने इसे 'उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव का मिलन' करार दिया था। दोनों पार्टियों ने अपने-अपने मुख्य वोट बैंक को दरकिनार करते हुए, तीसरे विकल्प को सत्ता से दूर रखने और राज्य में राजनीतिक स्थिरता के नाम पर यह गठबंधन किया था। हालांकि 2015 का PDP-BJP गठबंधन बेमेल माना गया था। PDP ने BJP के साथ मिलकर सरकार बना तो ली, लेकिन कश्मीर में भारी बवाल हुआ, विकास के वादे अधूरे रहे और अंत में गठबंधन टूट गया।

विजय की 'टीवीके' ने बिगाड़ा खेल: त्रिशंकु विधानसभा का साया

23 अप्रैल 2026 को तमिलनाडु विधानसभा चुनाव हुए। मतगणना 4 मई को हुई और नतीजे ने पूरी द्रविड़ राजनीति को हिला दिया। अभिनेता से राजनेता बने जोसेफ विजय की नई पार्टी तमिलगा वेट्री कजगम (TVK) ने शानदार डेब्यू किया। कुल 234 सीटों वाली विधानसभा में TVK ने 108 सीटें जीतीं। सत्तारूढ़ DMK 59 सीटों पर सिमट गई, जबकि AIADMK को 47 सीटें मिलीं। कांग्रेस को 5, PMK को 4 और अन्य छोटी पार्टियों को बाकी।

बहुमत के लिए 118 सीटें चाहिए। TVK सबसे बड़ी पार्टी तो बन गई, लेकिन अकेले सरकार बनाने लायक नहीं। स्टालिन खुद अपनी कोलाथुर सीट हार गए और इस्तीफा दे दिया। यह द्रविड़ पार्टियों (DMK-AIADMK) के लंबे वर्चस्व का अंत लगा- 59 साल बाद पहली बार कोई गैर-द्रविड़ पार्टी सबसे आगे है।

TVK की अटकी सरकार: विजय अभी CM नहीं बने

विजय ने गवर्नर राजेंद्र विश्वनाथ आरलेकर से मुलाकात की और दावा ठोका। कांग्रेस ने TVK को समर्थन दे दिया (5 सीटें), जिससे आंकड़ा 113 तक पहुंच गया। लेकिन अभी भी 5 सीटें कम। गवर्नर ने साफ कहा- स्पष्ट बहुमत (118) का प्रमाण दो, फिर बुलाएंगे। विजय दूसरी मुलाकात में भी खाली हाथ लौटे। छोटी पार्टियों (VCK, CPI, CPM आदि) से बातचीत चल रही है, लेकिन अभी कोई ठोस समर्थन नहीं मिला। TVK की तरफ से धमकी भी आई- अगर DMK या AIADMK ने कोई खेल खेला तो उसके सभी 108 विधायक सामूहिक इस्तीफा दे देंगे। गवर्नर पर BJP के दबाव का आरोप लग रहा है, कांग्रेस प्रदर्शन कर रही है। शपथ ग्रहण की तारीख टल गई है। राज्य में सस्पेंस बरकरार है- क्या राष्ट्रपति लगेगा? या फ्लोर टेस्ट होगा?

दूसरी तरफ: DMK और AIADMK के बीच गठबंधन की अटकलें

इसी बीच सबसे दिलचस्प ट्विस्ट आया। AIADMK ने कथिततौर पर DMK से संपर्क साधा है- साथ मिलकर TVK को रोकें, सरकार बनाएं। पुराने दुश्मन, जो दशकों से एक-दूसरे को गाली देते आए, अब सत्ता के लिए हाथ मिलाने को तैयार हैं? स्टालिन के लिए यह सबसे मुश्किल फैसला होगा। DMK और AIADMK पिछले 5 दशकों से एक-दूसरे के दुश्मन रहे हैं, वे अब साथ आने पर मजबूर क्यों हैं? इसके पीछे सिर्फ एक नाम का खौफ है-विजय का 'MGR 2.0' प्रभाव।

DMK के भीतर दूसरी पंक्ति के नेताओं (विशेषकर उदयनिधि स्टालिन गुट) को डर है कि अगर विजय सत्ता में आ गए, तो वे राजनीति के अगले 'MGR' बन जाएंगे। इतिहास गवाह है कि जब तक MGR जीवित रहे, उन्होंने DMK को कभी तमिलनाडु की सत्ता में वापसी नहीं करने दी थी।

अस्तित्व के संकट से जूझ रही AIADMK (47 सीटें) ने खुद DMK को संपर्क किया है। योजना यह है कि AIADMK सरकार बनाए और DMK (59 सीटें) उसे बाहर से समर्थन दे दे।

शुरुआत में स्टालिन ने AIADMK को समर्थन देने के विचार को खारिज कर दिया था। लेकिन 7 मई को DMK विधायकों की आपात बैठक हुई। इस बैठक में एक प्रस्ताव पास कर स्टालिन को यह अधिकार दे दिया गया है कि वह अस्थिरता रोकने के नाम पर कोई भी फैसला ले सकते हैं। DMK अब अपने पूर्व सहयोगियों पर भी दबाव बना रही है कि वे विजय के बजाय AIADMK के नेतृत्व वाली सरकार का समर्थन करें।

विचारधारा का टकराव

भाजपा-पीडीपी वाले गठबंधन की तरह डीएमके और एआईएडीएमके की कार्यशैली और नेतृत्व में जमीन-आसमान का अंतर है। अगर ये दोनों साथ आते हैं, तो तमिलनाडु में विपक्ष की जगह पूरी तरह खाली हो जाएगी जिसे भरने के लिए विजय की टीवीके तैयार बैठी है। हालांकि DMK और AIADMK, भले ही एक-दूसरे के कड़े प्रतिद्वंद्वी हों, लेकिन दोनों एक ही 'द्रविड़ आंदोलन' की उपज हैं।

सियासत में जब एक नया और शक्तिशाली दुश्मन सामने आता है, तो पुराने दुश्मन अक्सर रणनीतिक समझौते कर लेते हैं। TVK की लहर को रोकने के लिए यह दोनों दल एक 'महागठबंधन' या बाहर से समर्थन देने के फॉर्मूले पर विचार कर सकते हैं।

आगे क्या होगा?

फिलहाल, चेन्नई के राजनीतिक गलियारों में बैठकों का दौर जारी है। स्टालिन इस समय 'वेट एंड वॉच' की मुद्रा में हैं। जानकारों का कहना है कि अगर डीएमके एआईएडीएमके को बाहर से समर्थन देती है या गठबंधन करती है, तो यह भारतीय राजनीति का इस दशक का सबसे बड़ा 'यू-टर्न' होगा।

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डिजिटल पत्रकारिता की बदलती लहरों के बीच समाचारों की तह तक जाने की ललक अमित कुमार को इस क्षेत्र में खींच लाई। समकालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पैनी नजर रखने के साथ-साथ अमित को जटिल विषयों के गूढ़ विश्लेषण में गहरी रुचि है। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के रहने वाले अमित को मीडिया जगत में एक दशक का अनुभव है। वे पिछले 4 वर्षों से लाइव हिन्दुस्तान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।


अमित न केवल समाचारों के त्वरित प्रकाशन में माहिर हैं, बल्कि वे खबरों के पीछे छिपे 'क्यों' और 'कैसे' को विस्तार से समझाने वाले एक्सप्लेनर लिखने में भी विशेष रुचि रखते हैं। डिजिटल पत्रकारिता के नए आयामों, जैसे कि कीवर्ड रिसर्च, ट्रेंड एनालिसिस और एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन को वे बखूबी समझते हैं। उनकी पत्रकारिता की नींव 'फैक्ट-चेकिंग' और सत्यापन पर टिकी है। एक मल्टीमीडिया पत्रकार के तौर पर अमित का सफर देश के प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ रहा है। उन्होंने अमर उजाला, वन इंडिया, इंडिया टीवी और जी न्यूज जैसे बड़े मीडिया घरानों के साथ काम किया है।


अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।

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