
ये घिनौना और हैरतंगेज... चलती ट्रेन में महिला की सीट पर जज ने कर दिया पेशाब; भड़का SC
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि इस तरह का व्यवहार किसी न्यायिक अधिकारी के लिए बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है। SC ने यह भी सवाल उठाया कि हाई कोर्ट ने ऐसे गंभीर मामले में अनुशासनात्मक कार्रवाई में दखल क्यों दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने आज (सोमवार, 12 जनवरी को) मध्य प्रदेश के उस सिविल जज के आचरण और कृत्य पर गंभीर नाराजगी जताई, जिन पर आरोप है कि चलती ट्रेन में उन्होंने शराब पी और हंगामा किया। इतना ही नहीं आरोपी जज ने महिला यात्री की सीट पर जाकर पेशाब भी किया। इन आरोपों पर शीर्ष अदालत ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि सिविल जज का कथित व्यवहार न सिर्फ घिनौना है बल्कि चौंकाने वाला है।
यह मामला वर्ष 2018 का है, जब आरोपी सिविल जज इंदौर से जबलपुर ट्रेन से यात्रा कर रहे थे। आरोप है कि उन्होंने बिना अपने वरिष्ठ अधिकारियों को बताए छुट्टी ली और यात्रा के दौरान शराब पी। इसके बाद उन्होंने ट्रेन में हंगामा किया, यात्रियों और रेलवे कर्मचारियों से बदसलूकी की और टीटीई को उसके काम से रोका। सबसे गंभीर आरोप यह है कि उस जज ने एक महिला यात्री की सीट पर जाकर पेशाब किया और अश्लील हरकत की। आरोपों में यह भी कहा गया है कि उन्होंने अपनी पहचान पत्र (जज का आईडी कार्ड) का गलत इस्तेमाल कर यात्रियों को धमकाया।
हाई कोर्ट पर भी भड़का SC
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि इस तरह का व्यवहार किसी न्यायिक अधिकारी के लिए बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि हाई कोर्ट ने ऐसे गंभीर मामले में अनुशासनात्मक कार्रवाई में दखल क्यों दिया। इस मामले में पहले रेलवे अधिनियम के तहत आपराधिक केस दर्ज किया गया था, लेकिन बाद में मुख्य गवाहों के मुकर जाने (होस्टाइल हो जाने) के कारण जज को बरी कर दिया गया।
2019 में राज्यपाल के आदेश पर जज की सेवा समाप्त
इसके साथ ही हाई कोर्ट की प्रशासनिक शाखा ने अलग से विभागीय जांच कराई। जांच अधिकारी ने सभी आरोप सही पाए और जज को सेवा से हटाने की सिफारिश की। प्रशासनिक समिति और फुल कोर्ट ने भी इसे मंज़ूरी दी, जिसके बाद सितंबर 2019 में राज्यपाल के आदेश से जज की सेवा समाप्त कर दी गई। हालाँकि, मई 2025 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की एक खंडपीठ ने आपराधिक मामले में बरी होने के आधार पर जज की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया और केवल मामूली सज़ा देने की बात कही।
बार एंड बेंच के मुताबिक, अब हाई कोर्ट की प्रशासनिक शाखा ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उनका कहना है कि गवाहों के मुकरने से हुई बरी को निर्दोष साबित होना नहीं माना जा सकता और हाई कोर्ट ने अपनी सीमाओं से बाहर जाकर फैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस मामले में राज्य सरकार से जवाब मांगा है और मामले की सुनवाई जारी है।





