परिसीमन के साथ लटका महिला आरक्षण, अब विपक्ष में भगदड़ से बन जाएगा NDA का अधूरा काम?

Amit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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TMC और शिवसेना में टूट के बाद राजनीतिक हलचल तेज। जानिए क्या है परिसीमन विधेयक 2026, संसद का नंबर गेम और इसका महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) से सीधा कनेक्शन। पूरा न्यूज एक्सप्लेनर।

परिसीमन के साथ लटका महिला आरक्षण, अब विपक्ष में भगदड़ से बन जाएगा NDA का अधूरा काम?

हाल ही में तृणमूल कांग्रेस (TMC) और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) में हुई टूट ने भारतीय राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। विपक्ष का आरोप है कि राजनीतिक दलों में हो रहे ये विभाजन सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) द्वारा संसद में 'सुपर मेजॉरिटी' यानी दो-तिहाई बहुमत हासिल करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हैं। इस पूरी राजनीतिक कवायद के केंद्र में 'परिसीमन विधेयक 2026' और बहुप्रतीक्षित 'महिला आरक्षण' का अहम मुद्दा है।

परिसीमन विधेयक 2026 क्या है?

भारतीय संविधान के अनुसार, राज्यों की जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा सीटों का निर्धारण किया जाता है। 1976 में (42वें संशोधन के जरिए) सीटों की संख्या को 1971 की जनगणना के आधार पर फ्रीज कर दिया गया था, ताकि जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा दिया जा सके। सरकार ने अप्रैल 2026 में परिसीमन से जुड़े अहम विधेयक पेश किए हैं, जिनके मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • लोकसभा सीटों की कुल संख्या 543 से बढ़ाकर 850 (राज्यों से 815 और केंद्र शासित प्रदेशों से 35) करने का प्रस्ताव है।
  • 2026 के बाद की जनगणना का इंतजार करने के बजाय, यह विधेयक 2011 की जनगणना के आधार पर तुरंत सीटों के पुनर्वितरण का मार्ग प्रशस्त करता है।
  • यह विधेयक सीटों के आवंटन और परिसीमन पर लगी आधी सदी पुरानी रोक को समाप्त कर एक नया परिसीमन आयोग गठित करने का अधिकार देता है।

महिला आरक्षण से परिसीमन का कनेक्शन

2023 में संसद ने 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' (106वां संविधान संशोधन) पारित कर महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित किया था। हालांकि, उस कानून में एक शर्त थी कि आरक्षण अगली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू होगा। वर्तमान स्थिति में, अगली जनगणना 2027 में प्रस्तावित है, जिसका सीधा अर्थ था कि 2029 के लोकसभा चुनावों में महिला आरक्षण किसी भी हाल में लागू नहीं हो पाता।

  • इस समयसीमा की बाधा को दूर करने के लिए सरकार ने संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 पेश किया है।
  • यह नया संशोधन परिसीमन को आगामी जनगणना की शर्त से अलग करता है। इससे 2029 के आम चुनावों से ठीक पहले नई परिसीमन प्रक्रिया पूरी करके महिला आरक्षण लागू किया जा सकेगा।
  • लोकसभा की सीटें 850 होने पर, 33% के हिसाब से महिलाओं के लिए लगभग 283 सीटें आरक्षित होंगी। सदन का आकार बढ़ने से मौजूदा पुरुष सांसदों की सामान्य सीटों की संख्या में कोई भारी कटौती नहीं होगी, जिससे राजनीतिक दलों के भीतर टिकट कटने का असंतोष और टकराव कम होगा।

राजनीतिक दलों में टूट और 'नंबर गेम'

इन ऐतिहासिक बदलावों को कानूनी रूप देने में सबसे बड़ी चुनौती संसदीय संख्याबल की है। दरअसल परिसीमन से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए संसद में साधारण बहुमत नहीं, बल्कि विशेष बहुमत यानी उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।

हाल ही में (अप्रैल 2026 में) सरकार ने महिला आरक्षण को 2029 के चुनावों से पहले लागू करने के उद्देश्य से 131वां संविधान संशोधन विधेयक, 2026 लोकसभा में पेश किया था। इसका लक्ष्य 2026 के बाद होने वाली जनगणना का इंतजार किए बिना 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करना और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाना था। लेकिन 17 अप्रैल 2026 को यह विधेयक लोकसभा में गिर गया, क्योंकि इसे पारित होने के लिए आवश्यक 'विशेष बहुमत' (उपस्थित 528 सदस्यों में से 352 वोट) नहीं मिल सका। इसके पक्ष में केवल 298 वोट पड़े।

विपक्ष- विशेषकर दक्षिणी राज्यों के नेताओं ने इस विधेयक का कड़ा विरोध किया क्योंकि उनका मानना था कि जनसंख्या पर आधारित परिसीमन से उन राज्यों का संसदीय प्रतिनिधित्व घट जाएगा जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया है। विपक्ष की मांग थी कि महिला आरक्षण को परिसीमन से पूरी तरह अलग करके मौजूदा सीटों पर ही तुरंत लागू किया जाए। इस विधेयक के गिरने के कारण इससे जुड़े परिसीमन विधेयक को भी वापस लेना पड़ा, जिससे फिलहाल 33% महिला आरक्षण को जल्द लागू करने की प्रक्रिया अधर में लटक गई है।

एनडीए के पास वर्तमान नंबर क्या हैं और कितने की जरूरत है?

हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों ने NDA के संख्याबल को तेजी से 'सुपर मेजॉरिटी' के करीब पहुंचा दिया है।

पार्टी / गुटसांसदों की संख्या
NDA का मूल आंकड़ा (2024 चुनाव के बाद)293
TMC बागी सांसद (NCPI पार्टी में विलय के बाद)+20
शिवसेना (UBT) बागी (एकनाथ शिंदे गुट में विलय की तैयारी)+6
NDA का नया संभावित आंकड़ा319

लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत (362) के लिए NDA को अभी भी लगभग 43 और सांसदों के समर्थन की आवश्यकता है। इसे पूरा करने के लिए सरकार को BJD, YSRCP या INDIA गठबंधन से छिटके दलों (जैसे DMK) के समर्थन की जरूरत पड़ेगी।

राज्यसभा का गणित

राज्यसभा में कोई भी संविधान संशोधन पारित कराना सरकार के लिए एक अलग चुनौती है।

  • कुल सीटें: 245
  • दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा: लगभग 164 सीटें
  • NDA के पास वर्तमान सीटें: लगभग 149 सीटें। वर्तमान में कुछ सीटों पर चुनाव हो रहा है जिसके बाद एनडीए की संख्या और बढ़ने वाली है।

विपक्ष में भगदड़ की असली वजह

अप्रैल 2026 में परिसीमन से जुड़ा विधेयक आवश्यक आंकड़ों की कमी के कारण लोकसभा में अटक गया था। इसके बाद से ही रणनीतिक रूप से संख्याबल जुटाने के प्रयास तेज हो गए। TMC और शिवसेना (UBT) के दो-तिहाई सांसदों का टूटना और NDA या एकनाथ शिंदे खेमे के साथ आना इसी 'फ्लोर मैनेजमेंट' का हिस्सा माना जा रहा है। सरकार इन क्षेत्रीय दलों के बागी गुटों के समर्थन से लोकसभा और राज्यसभा में 362 और 170+ का जादुई आंकड़ा छूना चाहती है।

दक्षिण बनाम उत्तर भारत का टकराव

इस परिसीमन और आरक्षण प्रक्रिया में एक बड़ा राजनीतिक विवाद क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का भी है। नई परिसीमन व्यवस्था में उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे हिंदी भाषी राज्यों की सीटें काफी बढ़ जाएंगी, क्योंकि पिछले दशकों में वहां जनसंख्या वृद्धि दर अधिक रही है। उदाहरण के लिए, यूपी की हिस्सेदारी 14.7% से बढ़कर 16% के पार जा सकती है।

तमिलनाडु और केरल जैसे दक्षिणी राज्यों का कड़ा विरोध है। उनका तर्क है कि जनसंख्या नियंत्रण में उनके सफल प्रयासों की उन्हें सजा दी जा रही है। भले ही उनकी सीटों की कुल संख्या कम न हो, लेकिन 850 सीटों वाली विस्तारित लोकसभा में उनका आनुपातिक प्रतिशत उत्तर भारत के मुकाबले काफी कम हो जाएगा।

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लेखक के बारे में

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डिजिटल पत्रकारिता की बदलती लहरों के बीच समाचारों की तह तक जाने की ललक अमित कुमार को इस क्षेत्र में खींच लाई। समकालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पैनी नजर रखने के साथ-साथ अमित को जटिल विषयों के गूढ़ विश्लेषण में गहरी रुचि है। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के रहने वाले अमित को मीडिया जगत में एक दशक का अनुभव है। वे पिछले 4 वर्षों से लाइव हिन्दुस्तान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।


अमित न केवल समाचारों के त्वरित प्रकाशन में माहिर हैं, बल्कि वे खबरों के पीछे छिपे 'क्यों' और 'कैसे' को विस्तार से समझाने वाले एक्सप्लेनर लिखने में भी विशेष रुचि रखते हैं। डिजिटल पत्रकारिता के नए आयामों, जैसे कि कीवर्ड रिसर्च, ट्रेंड एनालिसिस और एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन को वे बखूबी समझते हैं। उनकी पत्रकारिता की नींव 'फैक्ट-चेकिंग' और सत्यापन पर टिकी है। एक मल्टीमीडिया पत्रकार के तौर पर अमित का सफर देश के प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ रहा है। उन्होंने अमर उजाला, वन इंडिया, इंडिया टीवी और जी न्यूज जैसे बड़े मीडिया घरानों के साथ काम किया है।


अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।

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