बस में गैंगरेप, 14 साल बाद दिल्ली में फिर दोहराया गया 'निर्भया कांड'! उस रात क्या हुआ था?

Amit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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दिल्ली में फिर निर्भया कांड जैसी वारदात! 11 मई की रात स्लीपर बस में ड्राइवर और कंडक्टर ने महिला से गैंगरेप किया। दोनों आरोपी गिरफ्तार। पढ़ें पूरी खौफनाक कहानी।

बस में गैंगरेप, 14 साल बाद दिल्ली में फिर दोहराया गया 'निर्भया कांड'! उस रात क्या हुआ था?

कैलेंडर के पन्ने बदलते हुए हम भले ही 2026 में आ गए हैं, लेकिन दिल्ली की सड़कों का वो डरावना सच आज भी जैसे ठहरा हुआ है। 11 मई 2026 की रात एक स्लीपर बस में ड्राइवर और कंडक्टर द्वारा एक महिला के साथ की गई दरिंदगी की खबर ने राजधानी के एक ऐसे जख्म को फिर से कुरेद दिया है, जिसे भुलाए नहीं भूला जा सकता। 14 मई को जैसे ही इन दोनों आरोपियों की गिरफ्तारी की खबर सामने आई, बरबस ही जहन में 14 साल पहले की वो खौफनाक रात कौंध गई- 16 दिसंबर 2012 की वो सर्द रात, जिसने न सिर्फ दिल्ली बल्कि पूरे देश की रूह को कंपा दिया था। यह कहानी है उसी 'निर्भया' की, जिसकी चीखें आज भी इस ताजा घटना के साथ दिल्ली के सन्नाटे में गूंज उठी हैं, और हमें पीछे मुड़कर देखने पर मजबूर कर रही हैं कि उस रात असल में क्या हुआ था।

एक आम शाम और फिल्म का वो शो

वह रविवार का दिन था। 23 वर्षीय फिजियोथेरेपी की छात्रा (जिसका नाम बाद में मीडिया और समाज ने सम्मानपूर्वक 'निर्भया' रखा) अपने एक दोस्त अवींद्र प्रताप पांडे के साथ साकेत स्थित 'सिलेक्ट सिटीवॉक' मॉल गई थी। दोनों ने वहां हॉलीवुड फिल्म 'लाइफ ऑफ पाई' देखी। फिल्म देखने के बाद, वे वापस अपने घर (द्वारका की तरफ) जाने के लिए निकले। रात के करीब 9 बज रहे थे। दोनों मुनिरका बस स्टैंड पर पहुंचे और वहां से पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इंतजार करने लगे। काफी देर तक कोई ऑटो या बस नहीं मिली।

सफेद बस और मौत का सफर

करीब 9:30 बजे एक सफेद रंग की चार्टर्ड बस (यादव ट्रैवल्स की बस) उनके पास आकर रुकी। बस पर 'दिल्ली-नोएडा' लिखा था। बस के अंदर ड्राइवर राम सिंह और उसके पांच अन्य साथी (मुकेश सिंह, विनय शर्मा, पवन गुप्ता, अक्षय ठाकुर और एक नाबालिग) मौजूद थे। उन्होंने आवाज लगाई कि बस द्वारका जा रही है।

अंजान शहर और रात के वक्त जल्द घर पहुंचने की उम्मीद में, निर्भया और उनका दोस्त बस में चढ़ गए। उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह बस एक खौफनाक जाल थी। बस के आगे बढ़ते ही दरवाजे बंद कर दिए गए और खिड़कियों पर पर्दे गिरा दिए गए।

दरिंदगी की वो खौफनाक इंतहा

बस के अंदर उन छह लोगों ने निर्भया पर फब्तियां कसना शुरू कर दिया। जब दोस्त ने इसका विरोध किया, तो उन लोगों ने लोहे की रॉड से उस पर जानलेवा हमला कर दिया और उसे पीट-पीटकर अधमरा कर दिया।

इसके बाद जो हुआ, वह इंसानियत के नाम पर एक बदनुमा दाग है। उन छह दरिंदों ने निर्भया के साथ चलती बस में सामूहिक दुष्कर्म किया। उन्होंने क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए लोहे की रॉड का इस्तेमाल कर उसे ऐसी भयानक अंदरूनी चोटें पहुंचाईं, जिन्हें सुनकर डॉक्टरों की भी रूह कांप गई थी। करीब एक घंटे तक चले इस वीभत्स तांडव के बाद, उन्होंने दोनों को महिपालपुर के पास चलती बस से सड़क पर फेंक दिया और उन्हें कुचलने की कोशिश भी की, लेकिन दोस्त ने किसी तरह निर्भया को किनारे खींच लिया।

जिंदगी की जंग और पूरा देश सड़कों पर

रात के अंधेरे में सड़क किनारे दोनों खून से लथपथ पड़े थे। बाद में पुलिस पेट्रोलिंग वैन ने उन्हें देखा और सफदरजंग अस्पताल पहुंचाया। जैसे ही यह खबर मीडिया में आई, पूरे देश में आक्रोश की लहर दौड़ गई। दिल्ली का इंडिया गेट और रायसीना हिल युवाओं के प्रदर्शन का केंद्र बन गया। कड़कड़ाती ठंड में लाखों लोग हाथ में मोमबत्तियां और तख्तियां लेकर इंसाफ मांगने सड़कों पर उतर आए। पुलिस को भीड़ को काबू करने के लिए लाठीचार्ज और वॉटर कैनन का इस्तेमाल करना पड़ा।

उधर, सफदरजंग अस्पताल में निर्भया जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थी। उसकी हालत बेहद नाजुक थी। बेहतर इलाज के लिए 26 दिसंबर को उसे सिंगापुर के 'माउंट एलिजाबेथ अस्पताल' एयरलिफ्ट किया गया। लेकिन उसकी चोटें इतनी गहरी थीं कि तमाम कोशिशों के बावजूद, 29 दिसंबर 2012 को निर्भया ने दम तोड़ दिया।

क्या बदला? (कानून और समाज पर असर)

इस घटना ने भारतीय न्याय प्रणाली और महिला सुरक्षा कानूनों की कमियों को उजागर कर दिया। जनता के भारी दबाव के बीच कई ऐतिहासिक बदलाव हुए।

जस्टिस जे.एस. वर्मा समिति: सरकार ने महिला सुरक्षा कानूनों की समीक्षा के लिए पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे.एस. वर्मा की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। इस समिति ने 29 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंप दी।

आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013: इसे 'निर्भया एक्ट' भी कहा जाता है। इसके तहत दुष्कर्म की परिभाषा को व्यापक बनाया गया।

गैंगरेप और बलात्कार के बाद हत्या या पीड़िता के 'वेजिटेटिव स्टेट' (कोमा) में जाने के मामलों में फांसी की सजा का प्रावधान किया गया।

एसिड अटैक, पीछा करना, और ताक-झांक करना जैसे अपराधों को पहली बार स्पष्ट रूप से परिभाषित कर कड़े कानून बनाए गए।

जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 2015: निर्भया कांड में शामिल एक आरोपी की उम्र 18 साल से कुछ महीने कम थी, जिसके कारण उसे बाल सुधार गृह में भेजा गया और वह 3 साल बाद छूट गया। इस पर भारी विवाद हुआ। परिणामस्वरूप, 2015 में कानून बदला गया, जिसके तहत यदि 16 से 18 वर्ष का किशोर किसी जघन्य अपराध में शामिल है, तो उस पर बालिग की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है।

निर्भया फंड: केंद्र सरकार ने महिला सुरक्षा और उनके सशक्तिकरण से जुड़ी योजनाओं को लागू करने के लिए 'निर्भया फंड' की स्थापना की।

अंजाम

पुलिस ने घटना के कुछ ही दिनों के भीतर सभी छह आरोपियों को पकड़ लिया था। मुख्य आरोपी राम सिंह ने 2013 में तिहाड़ जेल के अंदर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। नाबालिग आरोपी 3 साल की सजा पूरी कर रिहा हो गया। बाकी बचे चार दोषियों (मुकेश, विनय, पवन और अक्षय) को लंबी कानूनी प्रक्रिया और कई अपीलों के बाद, अंततः 20 मार्च 2020 की सुबह 5:30 बजे तिहाड़ जेल में फांसी पर लटका दिया गया।

निर्भया कांड केवल एक आपराधिक घटना नहीं थी; यह भारत के सामाजिक इतिहास का वह काला पन्ना है, जिसने देश की चेतना को झकझोर कर रख दिया। आज भी, जब ऐसी कोई घटना सामने आती है, तो 16 दिसंबर की वो रात एक डरावने साये की तरह याद आ जाती है।

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डिजिटल पत्रकारिता की बदलती लहरों के बीच समाचारों की तह तक जाने की ललक अमित कुमार को इस क्षेत्र में खींच लाई। समकालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पैनी नजर रखने के साथ-साथ अमित को जटिल विषयों के गूढ़ विश्लेषण में गहरी रुचि है। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के रहने वाले अमित को मीडिया जगत में एक दशक का अनुभव है। वे पिछले 4 वर्षों से लाइव हिन्दुस्तान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।


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अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।

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