ऑपरेशन की जरूरत थी, डॉक्टर ने लगा दिया प्लास्टर; अब देगा 35 लाख रुपये मुआवजा
दिल्ली में फ्रैक्चर वाली महिला को सर्जरी की जगह प्लास्टर लगाने के मामले में आयोग ने डॉक्टर को मेडिकल लापरवाही का दोषी माना। आयोग ने महिला को 30 लाख रुपये मुआवजा और 5 लाख रुपये मुकदमे के खर्च के तौर पर देने का आदेश दिया।

दिल्ली की एक महिला के पैर में फ्रैक्चर हुआ। उसे सर्जरी की जरूरत थी। लेकिन इसके बावजूद डॉक्टर ने प्लास्टर से इलाज कर दिया। अब उस डॉक्टर को 35 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया गया है। दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने महिला के पैर के फ्रैक्चर के इलाज में लापरवाही के मामले में डॉक्टर को जिम्मेदार ठहराया है।
आयोग की अध्यक्ष संगीता ढींगरा सहगल और सदस्य पिंकी ने महिला की याचिका पर सुनवाई की। महिला ने अपने शारीरिक और मानसिक कष्ट के लिए 70 लाख रुपये मुआवजे की मांग की थी। 2 सितंबर को दिए आदेश में आयोग ने कहा कि मरीज को महीनों तक इंतजार कराया गया और केवल अस्थायी प्लास्टर लगाकर यह भरोसा दिया गया कि फ्रैक्चर 8 से 10 महीने में अपने आप ठीक हो जाएगा, जबकि उसे तत्काल सर्जिकल इलाज की जरूरत थी।
घर में गिरने से हुआ था पैर में फ्रैक्चर
महिला के मुताबिक, 2 फरवरी 2014 को घर में गिरने के बाद उसके पैर में फ्रैक्चर हो गया था। उसका पति उसे एक नर्सिंग होम ले गया। वहां डॉक्टर ने एक्स-रे कराने के बाद फ्रैक्चर वाले हिस्से पर अस्थायी प्लास्टर लगा दिया।
अगले दिन डॉक्टर ने दोबारा एक्स-रे कराया। इसके आधार पर उन्होंने सर्जरी की जरूरत से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि फ्रैक्चर वाली जगह की हड्डियां ठीक तरह से जुड़ी हुई थीं। महिला को 9-10 दिन बाद फॉलोअप के लिए बुलाया गया।
इसके बाद 14 फरवरी 2014 को डॉक्टर ने अस्थायी प्लास्टर हटाकर स्थायी प्लास्टर लगाया और 27 फरवरी को दोबारा दिखाने को कहा। महिला के मुताबिक, वह लगातार दर्द में थी और दर्द निवारक दवाओं के साथ कैल्शियम की गोलियां ले रही थी। इसके बावजूद उसे राहत नहीं मिली।
डॉक्टर कहते रहे- सर्जरी की जरूरत नहीं
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, महिला ने आरोप लगाया कि इलाज करने वाले डॉक्टर लगातार उसे भरोसा दिलाते रहे कि सर्जरी की जरूरत नहीं है और फ्रैक्चर को पूरी तरह ठीक होने में करीब 8 से 10 महीने लगेंगे। महिला के अनुसार, 6 अप्रैल 2015 को डॉक्टर ने उसे किसी सरकारी अस्पताल में दूसरी राय लेने की सलाह दी। इसके बाद महिला और उसके पति ने 29 अप्रैल और 22 मई 2015 को लोक नायक अस्पताल का रुख किया। वहां डॉक्टरों ने बताया कि पैर के फ्रैक्चर वाले हिस्से की हड्डियां पूरी तरह खराब हो चुकी थीं। इसके बाद महिला ने इलाज में सेवा की कमी का आरोप लगाते हुए पहले डॉक्टर के खिलाफ उपभोक्ता शिकायत दाखिल की।
महिला ने क्या कहा, डॉक्टर का क्या था बचाव?
महिला की ओर से अधिवक्ता शिल्पा वर्मा और श्याम कुमार ने दलील दी कि एक सरकारी डॉक्टर ने शुरुआत में ही फ्रैक्चर वाले जोड़ की तत्काल सर्जरी की सलाह दी थी। उनका कहना था कि पहले डॉक्टर की लापरवाही के कारण महिला के जोड़ को स्थायी नुकसान हुआ। वहीं, डॉक्टर की ओर से अधिवक्ता श्रेष्ठ कुमार ने लापरवाही के आरोप से इनकार किया। उन्होंने कहा कि डॉक्टर ने इलाज के दौरान मानक चिकित्सा प्रक्रिया का पालन किया था।
बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि महिला ने अपनी शिकायत के समर्थन में किसी विशेषज्ञ की मेडिकल राय, वैज्ञानिक आधार या लापरवाही का कोई विशेष प्रमाण पेश नहीं किया। उनका कहना था कि टखने के फ्रैक्चर का इलाज सर्जरी के साथ-साथ बिना सर्जरी के भी किया जा सकता है और इसमें कुछ जोखिम स्वाभाविक होते हैं। इसलिए किसी ज्ञात मेडिकल जटिलता के सामने आने मात्र से डॉक्टर को लापरवाही के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
सफदरजंग अस्पताल की मेडिकल बोर्ड ने क्या कहा?
मामले में दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग ने सफदरजंग अस्पताल से विशेषज्ञ राय मांगी। मेडिकल बोर्ड ने कहा कि ऐसे मामले में मानक चिकित्सा प्रक्रिया ‘definitive operative fixation’ यानी सर्जिकल हस्तक्षेप थी। मेडिकल बोर्ड ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में समय बेहद महत्वपूर्ण होता है और फ्रैक्चर वाली जगह को स्थायी नुकसान से बचाने के लिए तत्काल सर्जिकल सहायता जरूरी थी।
आयोग ने यह भी पाया कि डॉक्टर फ्रैक्चर के दोबारा मूल्यांकन के लिए महिला को दी गई किसी पर्ची या जांच की जानकारी पेश नहीं कर सके, जो नियमित मानक प्रक्रिया का हिस्सा होती। इसी आधार पर आयोग ने माना कि डॉक्टर का आचरण स्वीकार्य चिकित्सा देखभाल के मानक से स्पष्ट रूप से नीचे था और यह मेडिकल लापरवाही के दायरे में आता है।
30 लाख मुआवजा, 5 लाख मुकदमे के खर्च के लिए
आयोग ने डॉक्टर को महिला को 30 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। इसके अलावा 10 साल से अधिक समय तक चली लंबी कानूनी लड़ाई के लिए 5 लाख रुपये अलग से देने को कहा गया। यानी महिला को कुल 35 लाख रुपये मिलेंगे।
आयोग ने अपने आदेश में कहा कि अगर कोई डॉक्टर सामान्य रूप से अपेक्षित मानक चिकित्सा प्रक्रिया का पालन करने में विफल रहता है, तो यह मेडिकल लापरवाही का स्पष्ट मामला बनता है। डॉक्टर से उच्चतम स्तर की विशेषज्ञता की अपेक्षा नहीं की जाती, लेकिन उससे उचित स्तर की देखभाल और मानक प्रक्रिया का पालन करने की उम्मीद जरूर की जाती है। इस मामले में आयोग के अनुसार डॉक्टर ऐसा करने में विफल रहे।


