पत्नी के साथ जबरन संबंध भी कहलाएगा रेप? सुप्रीम कोर्ट में जल्द सुनवाई; क्यों विरोध में सरकार
इससे पहले कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि पति को अपनी पत्नी से दुष्कर्म के आरोपों से छूट देना संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार के खिलाफ है। क्या है मैरिटल रेप?

मैरिटल रेप को लेकर देश भर में लंबे समय से बहस जारी है। इस बीच अब सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा है कि मैरिटल रेप या वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध घोषित करने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई से पहले वह केंद्र सरकार का रुख जानना चाहेगा। इससे पहले केंद्र सरकार ने पत्नी के साथ जबरन बनाए गए संबंधों को रेप मानने पर आपत्ति जताई थी। अब इस मामले में SC सरकार से विस्तृत जवाब मांग रही है। लेकिन इससे पहले यह समझना जरूरी है कि मैरिटल रेप आखिर है क्या और क्यों सरकार इसे अपराध नहीं मानना चाहती।
मैरिटल रेप का अर्थ है पत्नी के इच्छा के विपरीत जाकर भी पति का उसके साथ जबरन संबंध बनाना, या इसके लिए मजबूर करना। इसमें अप्राकृतिक यौन शोषण भी शामिल है। मैरिटल रेप को अब तक भारत में अपराध का दर्जा नहीं दिया गया है। पहले भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में दिए गए अपवाद के तहत अगर पत्नी नाबालिग नहीं है तो किसी पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाना या यौन कृत्य करना दुष्कर्म नहीं माना जाता था। अब IPC की जगह लाई गई भारतीय न्याय संहिता में भी धारा 63 (दुष्कर्म) के अपवाद-2 में कहा गया है कि ‘किसी पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाना या यौन कृत्य करना दुष्कर्म नहीं है, अगर पत्नी 18 वर्ष से कम उम्र की नहीं है।’
दिल्ली हाईकोर्ट ने दिया बंटा हुआ फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 16 जनवरी 2023 को ऐसी याचिकाओं पर केंद्र से जवाब मांगा था, जिनमें IPC के इस तरह के प्रावधान को चुनौती दी गई थी। बाद में अदालत ने इस मुद्दे पर भारतीय न्याय संहिता के समान प्रावधान को चुनौती देने वाली एक याचिका पर भी केंद्र को नोटिस जारी किया था। इन याचिकाओं में से एक का संबंध इस मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट के 11 मई 2022 के एक फैसले से है। इस मामले में हाईकोर्ट के दो जजों की पीठ ने बंटा हुआ फैसला सुनाया था।
इंदिरा जयसिंह की अपील पर क्या बोला SC?
अब सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने भारत के मुख्य न्यायाधीश CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ के सामने वैवाहिक दुष्कर्म के मामले में एक पति के खिलाफ याचिका का जिक्र किया और अनुरोध किया कि याचिकाओं के इस समूह को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए। इस पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। पीड़ित पत्नी की ओर से पेश जयसिंह ने कहा कि इन मामलों को बुधवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है, लेकिन केंद्र ने अभी तक इस मामले में कोई ठोस जवाब दाखिल नहीं किया है।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, ''केंद्र ने अभी तक जवाब दाखिल नहीं किया है, केवल प्रारंभिक आपत्ति दर्ज की है। मैं नवंबर में सुनवाई की निश्चित तारीख चाहती हूं।'' इस पर पीठ ने कहा, ''मामला बुधवार के लिए सूचीबद्ध है। केंद्र सरकार की ओर से भी कोई पेश होगा। हम देखेंगे कि वे क्या कहते हैं और उसके बाद उसी के अनुसार सुनवाई की उपयुक्त तारीख तय करेंगे।'' एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने कहा कि मामले की सुनवाई की कोई भी तारीख तय की जा सकती है, ताकि सभी पक्ष अपनी दलीलें और संबंधित दस्तावेज दाखिल करने की प्रक्रिया पूरी कर सकें।
क्यों केंद्र विरोध में?
इससे पहले कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि पति को अपनी पत्नी से दुष्कर्म और अप्राकृतिक यौन संबंध के आरोपों से छूट देना संविधान के अनुच्छेद 14 यानी कानून के तहत समानता के अधिकार के खिलाफ है। हालांकि केंद्र सरकार इसे अपराध मानने से कतरा रहा है। केंद्र का कहना है कि इस तरह की व्यवस्था लागू करने से गलत इरादे से दायर मुकदमों की बाढ़ आ जाएगी। सरकार ने कहा है कि महिलाओं की सुरक्षा का लिए पहले ही घरेलू हिंसा जैसे कानून है।


