हमले के लिए भारत के बेस का इस्तेमाल कर सकता है अमेरिका? क्या है LEMOA समझौता

Mar 06, 2026 07:34 am ISTNisarg Dixit लाइव हिन्दुस्तान
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भारत और अमेरिका ने Logistics Exchange Memorandum of Agreement पर 29 अगस्त 2016 में हस्ताक्षर किए थे। यह समझौता अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में हुआ था। इस समझौते के तहत दोनों देश एक दूसरे की सैन्य सुविधाओं जैसे नौसैनिक बेस, एयरफील्ड, मिलिट्री बेस का इस्तेमाल कर सकेंगे।

हमले के लिए भारत के बेस का इस्तेमाल कर सकता है अमेरिका? क्या है LEMOA समझौता

IRIS Dena के डूबने के बाद ईरान और अमेरिका युद्ध में भारत को लेकर चर्चा शुरू हो गईं हैं। दावे किए जा रहे थे कि अमेरिका भारतीय बेस पर निर्भर है। हालांकि, इन दावों को खारिज कर दिया गया था। खास बात है कि भारत और अमेरिका के बीच साल 2016 में एक समझौता हुआ था, जिसमें दोनों पक्ष कुछ सैन्य व्यवस्थाओं का इस्तेमाल कर सकते थे। अब सवाल है कि क्या इस समझौते के तहत अमेरिका भारतीय बेस का इस्तेमाल हमले के लिए कर सकता है।

इस समझौते के तहत दोनों देश एक दूसरे की सैन्य सुविधाओं जैसे नौसैनिक बेस, एयरफील्ड, मिलिट्री बेस का इस्तेमाल कर सकेंगे। इसमें रिफ्यूलिंग, मेंटेनेंस तथा अन्य जरूरी साजो समान की आपूर्ति शामिल है। लेकिन समझौते के एक प्रावधान के तहत हर मामले में पूर्व अनुमति लेनी होगी। यह सरकार पर निर्भर है कि वह किस मामले में अनुमति देती है और किस मामले में नहीं।

क्या है LEMOA समझौता

भारत और अमेरिका ने Logistics Exchange Memorandum of Agreement पर 29 अगस्त 2016 में हस्ताक्षर किए थे। यह समझौता अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में हुआ था। यह समझौता भारत और अमेरिका के सशस्त्र बलों के बीच लॉजिस्टिक सपोर्ट, सप्लाई और सेवाओं को लेकर नियम और शर्तें तय करता है। कहा जा रहा है कि यह LSA यानी लॉजिस्टिक सपोर्ट एग्रीमेंट का भारतीय वर्जन है, जो अमेरिका ने कई देशों के साथ किए हैं।

समझौते में क्या है

यह समझौता मुख्य रूप से चार क्षेत्रों को कवर करेगा। इनमें पोर्ट कॉल्स (बंदरगाहों पर जहाजों का रुकना), संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण और मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR)। इसके अलावा किसी भी अन्य जरूरत के लिए दोनों पक्षों को हर मामले में आपसी सहमति बनानी होगी। एक देश से दूसरे देश को मिलने वाली इन सेवाओं के बदले या तो नकद भुगतान करना होगा या फिर उसके बदले वैसी ही लॉजिस्टिक सेवाएं वापस देनी होंगी।

लॉजिस्टिक्स में क्या

इसमें भोजन, पानी, रहने की जगह, परिवहन, पेट्रोलियम, तेल, लुब्रिकेंट्स, कपड़े, संचार सेवाएं, चिकित्सा सेवाएं, स्टोरेज, प्रशिक्षण सेवाएं, स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत और रखरखाव, कैलिब्रेशन सेवाएं और पोर्ट सेवाएं शामिल हैं।

खास बात है कि यह समझौता किसी भी देश पर कोई संयुक्त गतिविधि करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। साथ ही इसमें किसी भी प्रकार का सैन्य बेस बनाने या बेसिंग की व्यवस्था करने का कोई प्रावधान नहीं है। यह पूरी तरह से लॉजिस्टिक एग्रीमेंट है।

पोत डूबने की घटना भारत के लिए अहम क्यों

यह घटना भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि हमला जिस जगह हुआ, वह क्षेत्र भारत के रणनीतिक समुद्री पड़ोस में आता है। हिंद महासागर में श्रीलंका के दक्षिण का इलाका वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के प्रमुख समुद्री मार्गों में शामिल है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह का सैन्य टकराव समुद्री सुरक्षा और शिपिंग स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।

भारत में आयोजित मिलन अभ्यास में शाामिल होने के लिए आया डेना युद्धपोत 18 से 25 फरवरी तक भारत में रहा था। इस अभ्यास में दुनिया के कई देशों की नौसेनाओं ने हिस्सा लिया था और 80 से ज्यादा युद्धपोत समुद्र में एक साथ दिखाई दिए थे। कार्यक्रम का उद्देश्य समुद्री सहयोग और नौसैनिक कूटनीति को प्रदर्शित करना था। नौसैनिक परेड की समीक्षा द्रौपदी मुर्मु ने की थी।

क्या है भारत की नीति

हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, रक्षा विशेषज्ञ कैप्टन डीके शर्मा ने कहा कि पोत भारत के निमंत्रण पर आया जरूर था लेकिन जब यह घटना हुई तो वह भारत की जल सीमा से बाहर जा चुका था। इसलिए सीधे तौर पर इस घटना के लिए भारत की जिम्मेदारी नहीं बनती है। लेकिन यह देखना होगा कि ईरान इसे कैसे देखता है? विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने कहा कि भारत अपनी इस नीति पर कायम है कि वह हमले के लिए अपने किसी भी सैन्य बेस का इस्तेमाल किसी दूसरे देश को नहीं करने देगा।

Nisarg Dixit

लेखक के बारे में

Nisarg Dixit

निसर्ग दीक्षित न्यूजरूम में करीब एक दशक का अनुभव लिए निसर्ग दीक्षित शोर से ज़्यादा सार पर भरोसा करते हैं। पिछले 4 साल से वह लाइव हिनुस्तान में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं, जहां खबरों की योजना, लेखन, सत्यापन और प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं। इससे पहले दैनिक भास्कर और न्यूज़18 जैसे बड़े मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क तक की भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की, जिसने उनके काम करने के तरीके को व्यावहारिक और तथ्य आधारित बनाया। निसर्ग की खास रुचि खोजी रिपोर्टिंग, ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ स्टोरीज़ में है। वे जटिल मुद्दों को सरल भाषा और स्पष्ट तथ्यों के साथ प्रस्तुत करने में विश्वास रखते हैं। राजनीति और जांच पड़ताल से जुड़े विषयों पर उनकी मजबूत पकड़ है। निसर्ग लोकसभा चुनावों, कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और अहम घटनाओं को कवर कर चुके हैं। साथ ही संसदीय कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों को नियमित रूप से कवर करते हैं। गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी निसर्ग योगदान देते हैं।

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