पंजाब में कांग्रेस के लिए खुल रहा दरवाजा? APP-BJP पर किसानों के गुस्से से बढ़ी 2027 के लिए उम्मीद
पंजाब में एक के बाद किसान आंदोलन चल रहे हैं। धान की फसल के दौरान बिजली कटौती से किसान परेशान हैं। सरकार के खिलाफ किसानों में काफी ज्यादा गुस्सा है। इन सारी चीजों का असर साल 2027 के विधानसभा चुनाव में पड़ सकता है।

पंजाब में एक के बाद किसान आंदोलन चल रहे हैं। धान की फसल के दौरान बिजली कटौती से किसान परेशान हैं। सरकार के खिलाफ किसानों में काफी ज्यादा गुस्सा है। इन सारी चीजों का असर साल 2027 के विधानसभा चुनाव में पड़ सकता है। जहां आम आदमी पार्टी के खिलाफ किसान भड़के हुए हैं। वहीं, भाजपा के खिलाफ भी कम गुस्सा नहीं है। ऐसे में प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार के खिलाफ नाराजगी का फायदा कांग्रेस उठा सकती है।
एक हफ्ते में दूसरी पंजाब किसान आंदोलन की रिपोर्ट में, बीकेयू एकता सिधुपुर, आज़ाद किसान मोर्चा और अन्य यूनियनों के कार्यकर्ताओं ने मलवा इलाके में सड़कें बंद कर दीं। इन लोगों ने पीएसपीसीएल ऑफिस और ग्रिड्स के सामने धरना देना दिया। वजह, बिजली कटौती के चलते धान की फसल खतरे में है। प्रदर्शनकारियों ने आप सरकार को अपनी आठ घंटे की लगातार खेती बिजली की गारंटी याद दिलाई। किसानों के इस ताजा प्रदर्शन में अधूरे वादों, केंद्रीय कृषि नीतियों और ग्रामीण इलाकों में फैली अव्यवस्था को लेकर नाराजगी है। कुल 32 किसान संगठनों ने एकछत्र होकर यह विरोध प्रदर्शन शुरू किया। इसमें संयुक्त किसान मोर्चा, भारती किसान यूनियन-लखोवल, बीकेयू-राजेवल, बीकेयू दाकौंडा, कीर्ति किसान यूनियन, ऑल इंडिया किसान सभा, बीकेयू-शादीपुर और पंजाब किसान यूनियन शामिल हैं।
किसानों की मांगें क्या
पंजाब के कृषि मंत्री से लिखित आश्वासन के बाद यह धरना समाप्त हुआ। इसमें आप सरकार में कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुद्दियां ने वादा किया है कि सरकार, एक महीने के भीतर पंजाब विधानसभा का स्पेशल सेशन बुलाएगी। इसमें किसानों के कर्ज का एकमुश्त समाधान पर चर्चा होगी। एसकेएम मांग कर रहा है कि नदी जल विवादों को रिपेरियन सिद्धांत, पुनर्गठन अधिनियम 1966 की धारा 78, 79 और 80 को समाप्त करने, किसानों और कृषि मजदूरों के लिए पूर्ण ऋण माफी और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते का विरोध के आधार पर हल किया जाए। इसके अलावा, प्रमुख मांगों में गेहूं और धान को छोड़कर सभी कृषि उपज के लिए सी2 + 50 प्रतिशत के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय करना, बांध सुरक्षा अधिनियम, विद्युत संशोधन अधिनियम और बीज विधेयक को निरस्त करना और किसानों और मजदूरों को 10,000 रुपये का मासिक सामाजिक सुरक्षा भत्ता प्रदान करना शामिल है।
आप ने अभी तक क्या किया
सत्ताधारी दल, आम आदमी पार्टी ने अपने दो प्रमुख वादे पूरे किए हैं। इसमें 300 यूनिट तक मुफ्त घरेलू बिजली और बढ़ी हुई नहर सिंचाई शामिल है। लेकिन मुख्य मांगें-जैसे व्यापक कर्ज माफी और कानूनी रूप से समर्थित एमएसपी का वादा अभी पूरा नहीं हुआ है। चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर पर हालिया प्रदर्शन के पीछे यही वजह थी, जिसमें कहा गया कि वादे तोड़े गए।
केंद्र सरकार से क्यों नाराजगी
पंजाब के किसानों में सिर्फ प्रदेश की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी ही नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के प्रति भी गुस्सा है। इसमें दिल्ली बॉर्डर पर एक साल तक चले प्रदर्शन के दौरान अधूरे रहे वादों की भी टीस है। यहां तक कि पीएम-किसान, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, किसान क्रेडिट कार्ड, ई-नाम, सॉयल हेल्थ कार्ड स्कीम, जैसी तमाम योजनाओं के बावजूद किसान खुश नहीं हैं। इसकी वजहें भी हैं। 2022 तक खेती की आय दोगुनी करने का लक्ष्य अधिक एमएसपी खर्च और पीएम-किसान के बावजूद पूरी नहीं हुआ। यूनियन नेताओं का कहना है कि आश्वासन के मुताबिक, आंदोलन के दौरान उनके खिलाफ दर्ज मामले अभी तक नहीं हटाए गए हैं। मांग पत्र में यूएस ट्रेड डील को रद्द करने की भी मांग शामिल है।
कांग्रेस को कैसे फायदा
अब प्रदेश में आम आदमी पार्टी और केंद्र में भाजपा से नाराजगी, कांग्रेस को कैसे उम्मीद दे रही है, इसको भी समझ लेते हैं। सबसे बड़ी चीज तो लीगल एमएसपी, ट्रेड पॉलिसी, नदियों का पानी, ओटीएस कमेटी, केंद्रीय बिल जैसे तमाम मुद्दे हैं, जिन्हें कांग्रेस आसानी से भुना सकती है। हालांकि सबसे बड़ा नुकसान आम आदमी पार्टी को होने वाला है। गांव में यह मुद्दे काफी असर डालने वाले हैं। इसको इस तरह से भी समझा जा सकता है कि 2022 में पार्टी का 42 फीसदी वोट परसेंट, 2024 में खिसककर 26 फीसदी पर आ गया।
पंजाब में भाजपा की तो सरकार नहीं है, लेकिन उसके सिर पर तीन रद्द किए गए कृषि कानूनों का बोझ है। ध्यान देने वाली बात यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की अधूरी कानूनी गारंटी और अन्य मांगों के बावजूद, उसका वोट शेयर 2022 में 6.6 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 18.6 प्रतिशत हो गया है, जबकि उसने एक भी लोकसभा सीट नहीं जीती। हालांकि गौर करने वाली बात यह है कि यह सारा प्रतिशत ग्रामीण से ज्यादा शहरी इलाकों में बढ़ा है।


