27 साल बाद फिर एक होंगे कांग्रेस और शरद पवार, महाराष्ट्र में होने वाला है सियासी खेल
भारत की राजनीति के दो बड़े दल जल्द ही एक हो सकते हैं। कहा जा रहा है कि शरद पवार और कांग्रेस के बीच चर्चाओं का दौर चल रहा है, जो पार्टियों के विलय से जुड़ा हुआ है। हालांकि, इसपर अब तक अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।

महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ी उथल पुथल हो सकती है। खबर है कि वरिष्ठ नेता शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एसपी) और कांग्रेस एक होने की तैयारी चल रही है। हालांकि, इसे लेकर दोनों दलों ने औपचारिक तौर पर कुछ नहीं कहा है। अटकलें हैं कि इसे लेकर बातचीत का दौर जारी है और आम सहमति बनाने की कोशिश की जा रही है।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, सूत्रों ने कहा है कि एनसीपी एसपी और कांग्रेस विलय को लेकर चर्चाएं कर रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया है कि फिलहाल सिर्फ महाराष्ट्र इकाई तक ही बात की जा रही है। राज्य स्तर पर बातचीत तय होने के बाद दिल्ली में आलाकमान की तरफ से अंतिम निर्देश जारी किए जा सकते हैं। दोनों ही पार्टियां इसपर खुलकर कुछ नहीं बोल रहीं हैं।
27 साल बाद हो सकते हैं एक
साल 1999 में पवार ने कांग्रेस से अपनी राहें अलग कर ली थीं। तब उन्होंने अविभाजित राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की स्थापना की थी। अब अगर दोनों साथ आते हैं, तो 27 साल बाद दोनों दल एक पार्टी के तहत काम शुरू कर सकते हैं। साल 2023 में एनसीपी में टूट हुई थी और अजित पवार गुट को मुख्य दल के रूप में पहचान मिली थी।
इसके बाद सीनियर पवार की अगुवाई वाले गुट का नाम एनसीपी एसपी हुआ और चुनाव तुतारी किया गया। जबकि, एनसीपी की चुनाव चिह्न घड़ी है।
ऑपरेशन तुतारी?
वार्ता के अनुसार, लेकिन पार्टी के वरिष्ठ सूत्रों ने स्वीकार किया है कि पार्टी की दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति को लेकर आंतरिक मतभेद उभर आए हैं। सियासी गलियारों में इसे 'ऑपरेशन तुतारी' कहा जा रहा है।
नेताओं का एक समूह कांग्रेस के साथ विलय के पक्ष में दिख रहा है। उनका तर्क है कि कांग्रेस पार्टी और राकांपा की वैचारिक जोड़ी रही है। इस विचार के समर्थकों का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी का अधिक प्रभावी ढंग से मुकाबला करने के लिए समान वैचारिक जड़ों वाले विपक्षी दलों का साथ आना जरूरी है। कहा जा रहा है कि ऐसे में कांग्रेस के साथ एक औपचारिक गठबंधन अधिक संगठनात्मक ताकत और राजनीतिक गहराई दे सकता है।
वहीं दूसरी ओर, दूसरा समूह पार्टी की स्वतंत्र पहचान बनाए रखने के पक्ष में है। इस खेमे के नेताओं का तर्क है कि विलय का रास्ता चुनने के बजाय पार्टी को अपनी आजादी को बनाए रखना चाहिए। साथ ही अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाने के लिए सत्तारूढ़ गठबंधन के साथ व्यावहारिक संबंध बनाए रखने चाहिए।


