ये अनिवार्य नहीं, क्यों करें सुनवाई? वंदे मातरम विवाद पर CJI ने सईद नूरी को लगाई फटकार

लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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CJI ने कहा कि ये दिशानिर्देश केवल एक 'प्रोटोकॉल' हैं और इनका लन करना अनिवार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि हम इन मामलों की तभी सुनवाई करेंगे, जब इनका पालन न करने पर कोई दंडात्मक कार्रवाई होती हो या फिर (गाना) अनिवार्य कर दिया गया हो।

ये अनिवार्य नहीं, क्यों करें सुनवाई? वंदे मातरम विवाद पर CJI ने सईद नूरी को लगाई फटकार

देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने बुधवार (25 मार्च) को केंद्र सरकार के उन हालिया दिशानिर्देशों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिनमें सरकारी और सार्वजनिक कार्यक्रमों में राष्ट्र गीत 'वंदे मातरम' बजाने की बात कही गई थी। इसके साथ ही जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने इस याचिका को 'समय से पहले' (अपरिपक्व) करार दिया। बेंच ने यह भी कहा कि इन दिशानिर्देशों का पालन न करने पर किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान नहीं है।

CJI सूर्यकांत ने आगे कहा कि ये दिशानिर्देश केवल एक 'प्रोटोकॉल' (नियम-प्रक्रिया) हैं और इनका पालन करना अनिवार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि ये एक गाइलाइंस हैं। इसमें कोई दंड का प्रावधान नहीं है। यानी किसी को भी‘वंदे मातरम्’ गाने या बजाने के लिए मजबूर नहीं किया जा रहा है। इसके आगे बेंच ने कहा, “हम इन सभी मामलों पर तभी सुनवाई करेंगे, जब इनका पालन न करने पर कोई दंडात्मक कार्रवाई होती हो या फिर (गाना) अनिवार्य कर दिया गया हो। यह अधिसूचना केवल एक सलाह (एडवाइजरी) है। इसमें किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान नहीं है।”

सईद नूरी ने दायर की थी याचिका

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक मोहम्मद सईद नूरी नाम के एक व्यक्ति ने यह याचिका दायर की थी, जिस पर CJI की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ सुनवाई कर रही थी। सईद नूरी एक शैक्षणिक संस्थान चलाते हैं। उनकी तरफ से वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े मामले की पैरवी कर रहे थे। हेगड़े ने सुनवाई के दौरान दलील दी कि भले ही नियम सलाहकारी हों, लेकिन सामाजिक दबाव के कारण लोग मजबूर हो सकते हैं। उन्होंने कहा, “देशभक्ति को जबरदस्ती लागू नहीं किया जा सकता।”

मानसिक और सामाजिक दबाव झेलना पड़ सकता है

इस पर हेगड़े ने कहा कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अंतरात्मा के अधिकार का मामला है। उन्होंने यह भी कहा, "अगर कोई व्यक्ति गाने से मना करता है, तो उसे मानसिक और सामाजिक दबाव झेलना पड़ सकता है। इतना ही नहीं सलाह (एडवाइजरी) की आड़ में लोगों को साथ गाने के लिए मजबूर किया जा सकता है।" हालांकि, जस्टिस बागची ने पूछा कि क्या इन दिशानिर्देशों का पालन न करने पर वास्तव में किसी तरह की दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है? जज ने पूछा, “क्या 28 जनवरी की अधिसूचना के तहत किसी तरह की दंडात्मक कार्रवाई हो सकती है? क्या अगर कोई व्यक्ति राष्ट्र गीत नहीं गाता है, तो उसे सभा या कार्यक्रम से बाहर निकाल दिया जाता है?”

हमें वह नोटिस दिखाइए, जो आपको भेजा गया हो

CJI सूर्यकांत ने भी याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या उन्हें राष्ट्र गीत बजाने के लिए किसी तरह से मजबूर किया जा रहा है? CJI ने कहा, "हमें वह नोटिस दिखाइए, जो आपको भेजा गया हो और जिसमें आपको राष्ट्र गीत बजाने के लिए मजबूर किया गया हो। आप एक स्कूल चलाते हैं; हमें यह भी नहीं पता कि आपका स्कूल मान्यता प्राप्त है या नहीं।" इसी बीच, जस्टिस बागची ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि इन दिशानिर्देशों में 'may' (सकते हैं) शब्द का इस्तेमाल किया गया है, जिसका अर्थ है कि यह सलाह अनिवार्य प्रकृति की नहीं है। जज ने कहा, "केंद्र सरकार के दिशानिर्देशों के खंड 5 में 'may' शब्द का इस्तेमाल किया गया है। यह स्वतंत्रता गाने वाले और न गाने वाले, दोनों के लिए समान रूप से उपलब्ध है। यही कारण है कि ये दिशानिर्देश 'बिजो इमैनुएल' मामले में दिए गए फैसले का उल्लंघन नहीं करते हैं।"

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Pramod Praveen

लेखक के बारे में

Pramod Praveen

प्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।

अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।

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