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सब तो तहस-नहस कर दिए, सुखना को अब और कितना सुखाओगे? बीच सुनवाई क्यों बिदके CJI सूर्यकांत

सब तो तहस-नहस कर दिए, सुखना को अब और कितना सुखाओगे? बीच सुनवाई क्यों बिदके CJI सूर्यकांत

संक्षेप:

बारिश के पानी पर निर्भर सुखना झील कभी चंडीगढ़ का प्रमुख पर्यटन केंद्र हुआ करती थी, लेकिन बीते वर्षों में लगातार गिरते जलस्तर ने इसकी सुंदरता और अस्तित्व दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

Jan 21, 2026 02:58 pm ISTPramod Praveen लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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देश के मुख्य न्यायधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ आज (बुधवार, 21 जनवरी को) अरावली पहाड़ियों से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी। इस दौरान पीठ ने अवैध निर्माण का मुद्दा उठाते हुए चंडीगढ़ की मशहूर सुखना झील के सूखने पर चिंता जताई। हरियाणा सरकार को पिछली गलतियों को न दोहराने की चेतावनी देते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि अधिकारियों और बिल्डर माफिया की मिलीभगत के कारण सुखना झील "पूरी तरह से खराब" हो चुकी है। पीठ में CJI सूर्यकांत के अलावा जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली भी शामिल हैं।

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बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, सुनवाई के दौरान CJI ने कहा, "राज्य के अधिकारियों और राजनेताओं की मिलीभगत से बिल्डर माफिया काम कर रहा है... आप सुखना झील को कितना सुखाओगे? आपने झील को तो पूरी तरह से खराब कर दिया है।" दरअसल, बारिश के पानी पर निर्भर सुखना झील कभी चंडीगढ़ का प्रमुख पर्यटन केंद्र हुआ करती थी, लेकिन बीते वर्षों में लगातार गिरते जलस्तर ने इसकी सुंदरता और अस्तित्व दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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अरावली पहाड़ियों से जुड़ा मामला

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान आई। नई परिभाषा को लेकर देशभर में विरोध के बाद, अदालत ने पिछले वर्ष अपने आदेश पर रोक लगाते हुए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था, ताकि इस मुद्दे की विस्तृत जांच की जा सके। इससे पहले केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित परिभाषा को अदालत ने स्वीकार कर लिया था, जिसमें कहा गया था कि 100 मीटर ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ‘अरावली पहाड़ियां’ माना जाएगा और 500 मीटर के भीतर स्थित दो या अधिक ऐसी पहाड़ियां, उनके बीच की जमीन सहित पहाड़ियों को ‘अरावली रेंज’ माना जाएगा। बता दें कि अरावली पर्वतमाला हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और गुजरात तक फैली हुई है।

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‘वन’ और ‘अरावली’ की परिभाषा अलग

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने अदालत की सहायता कर रहे एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर से कहा कि वे सभी पक्षों और हितधारकों के सुझावों को शामिल करते हुए चार सप्ताह के भीतर विस्तृत नोट दाखिल करें। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आगामी आदेश में ‘वन’ और ‘अरावली’ की परिभाषाओं को अलग-अलग रखा जाएगा। अदालत ने कहा, “वन की परिभाषा को अलग से और व्यापक दृष्टि से देखा जाएगा, जबकि अरावली का मुद्दा अपेक्षाकृत संकीर्ण रहेगा।”

अवैध खनन पर सख्ती

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को निर्देश दिया कि राज्य में चल रहे अवैध खनन को तुरंत प्रभाव से रोका जाए। पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की यह सख्त टिप्पणी एक बार फिर यह संकेत देती है कि प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और अवैध गतिविधियों पर अदालत किसी भी तरह की ढील देने के मूड में नहीं है।

Pramod Praveen

लेखक के बारे में

Pramod Praveen
भूगोल में पीएचडी और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर उपाधि धारक। ईटीवी से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार पत्रकारिता करियर की शुरुआत। कई हिंदी न्यूज़ चैनलों (इंडिया न्यूज, फोकस टीवी, साधना न्यूज) की लॉन्चिंग टीम का सदस्य और बतौर प्रोड्यूसर, सीनियर प्रोड्यूसर के रूप में काम करने के बाद डिजिटल पत्रकारिता में एक दशक से लंबे समय का कार्यानुभव। जनसत्ता, एनडीटीवी के बाद संप्रति हिन्दुस्तान लाइव में कार्यरत। समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक जगत के अंदर की खबरों पर चिंतन-मंथन और लेखन समेत कुल डेढ़ दशक की पत्रकारिता में बहुआयामी भूमिका। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और संपादन। और पढ़ें
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