किसी को अरावली छूने भी ना देंगे, किस पर बिदके CJI सूर्यकांत; जंगल सफारी प्रोजेक्ट कर दिया रिजेक्ट
CJI की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि हम एक्सपर्ट नहीं हैं। एक्सपर्ट्स अरावली की परिभाषा तय करेंगे। जब तक अरावली रेंज की परिभाषा फाइनल नहीं हो जाती, हम किसी को भी अरावली को छूने नहीं देंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (12 फरवरी) को दो टूक कहा कि वह किसी को भी अरावली छूने की इजाजत नहीं देगा। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने हरियाणा सरकार को जंगल सफारी पर डिटेल्ड प्लान जमा करने की इजाज़त देने से भी मना कर दिया, जब तक कि एक्सपर्ट्स "अरावली रेंज" की परिभाषा साफ नहीं कर देते। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि जंगल सफारी के मुद्दे पर तब विचार किया जाएगा, जब वह अरावली रेंज पर मुख्य मामले पर विचार करेगी।
सुनवाई के दौरान हरियाणा के वकील ने कहा कि उन्होंने सफारी प्रोजेक्ट की डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) को 10,000 एकड़ से बदलकर 3,300 एकड़ से ज़्यादा कर दिया है। उन्होंने कहा कि वे बस इतना चाहते हैं कि उन्हें सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) को उनकी जांच के लिए DPR देने की इजाज़त दी जाए। इस पर CJI ने कहा, “हम एक्सपर्ट नहीं हैं। एक्सपर्ट्स अरावली की परिभाषा तय करेंगे। जब तक अरावली रेंज की परिभाषा फ़ाइनल नहीं हो जाती, हम किसी को भी अरावली को छूने नहीं देंगे।”
अरावली सिर्फ हरियाणा या राजस्थान की नहीं
CJI कांत ने कहा कि अरावली सिर्फ हरियाणा या राजस्थान की नहीं है, बल्कि यह एक रेंज है जो कई राज्यों से होकर गुज़रती है। हरियाणा सरकार के वकील से उन्होंने कहा, "हम सफारी के इस मुद्दे को मेन मामले के साथ देखेंगे।" इस पर वकील ने कहा कि मेन मामला बिल्कुल अलग है और सफारी का मुद्दा अलग है। इतना सुनते ही बेंच ने कहा, ''कभी-कभी, सीईसी अनुमति देने में बहुत चुनिंदा रवैया अपनाता है। अगर हम इसकी अनुमति देते हैं, तो वे बहुत ही आकर्षक तस्वीर पेश करेंगे कि ये पेड़, वन्यजीव और जंगल हैं।''
विशेषज्ञ समिति की राय आने के बाद करेंगे विचार
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि विशेषज्ञ समिति की राय आने के बाद वह सफारी परियोजना पर विचार करेंगे। शीर्ष अदालत ने पिछले साल अक्टूबर में प्रस्तावित 'अरावली जंगल सफारी परियोजना' पर रोक लगा दी थी, जिसे हरियाणा सरकार द्वारा दुनिया का सबसे बड़ा जू-सफारी बताया जा रहा था।'' 'जू सफारी' परियोजना का उद्देश्य गुरुग्राम और नूहं जिलों में स्थित पर्यावरण की दृष्टि से नाजुक अरावली पर्वत शृंखला के 10,000 एकड़ क्षेत्र में बाघ, तेंदुआ,शेर के लिए क्षेत्र स्थापित करना और सैकड़ों प्रजातियों के पक्षियों, सरीसृपों और तितलियों को आश्रय देना है।
पिछले साल SC ने अरावली की नई परिभाषा पर लगा दी थी रोक
उच्चतम न्यायालय भारतीय वन सेवा (आईएफएस) के सेवानिवृत्त पांच अधिकारियों और गैर सरकारी संगठन 'पीपल फॉर अरावली' द्वारा संयुक्त रूप से दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि यह परियोजना पहले से ही क्षतिग्रस्त अरावली पर्वत शृंखला के लिए विनाशकारी साबित होगी। शीर्ष अदालत ने 29 दिसंबर को अरावली की नई परिभाषा पर हुए विवाद के बाद अपने 20 नवंबर के अपने निर्देशों को स्थगित कर दिया, जिसमें इन पहाड़ियों और पर्वत शृंखलाओं की एक समान परिभाषा को स्वीकार किया गया था। न्यायालय ने कहा कि ''महत्वपूर्ण अस्पष्टताओं'' को दूर करने की आवश्यकता है, जिसमें यह भी शामिल है कि क्या 100 मीटर की ऊंचाई और पहाड़ियों के बीच 500 मीटर की दूरी का मानदंड इस पर्वत शृंखला के एक महत्वपूर्ण हिस्से को पर्यावरण संरक्षण से वंचित कर देगा।
लेखक के बारे में
Pramod Praveenप्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।
अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।



