तब तो हर घर पर होगा केस; आपको काम भी न मिलेगा, CJI ने किसे समझाया? याचिका सुनने से इनकार

Jan 29, 2026 03:43 pm ISTPramod Praveen लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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CJI ने आगाह करते हुए कहा कि हर घर मुकदमेबाजी में फंस जाएगा... एक बार न्यूनतम मजदूरी तय हो जाने के बाद, लोग काम पर रखने से मना कर देंगे। मुझे बताएं कि कितने उद्योग ट्रेड यूनियनों का इस्तेमाल कर सफलतापूर्वक लोगों को काम पर रख पाए हैं।

तब तो हर घर पर होगा केस; आपको काम भी न मिलेगा, CJI ने किसे समझाया? याचिका सुनने से इनकार

देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने गुरुवार को उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें यह घोषणा करने की मांग की गई थी कि घरेलू कामगारों या घरेलू सहायकों को न्यूनतम मजदूरी पाने का मौलिक अधिकार है पेन थोजिलालारगल संगम और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य के मामले की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन लागू करने जैसे नीतिगत फैसले राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और इस पर न्यायपालिका का हस्तक्षेप सीमित है।

CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने आशंका जताई कि यदि घरेलू कामगारों के लिए अनिवार्य न्यूनतम वेतन तय किया गया, तो इसके उलटे परिणाम हो सकते हैं। CJI ने कहा, “अगर ऐसा हुआ तो हर घर मुकदमे में फंस जाएगा।” इसके आगे मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “न्यूनतम वेतन तय होते ही हर घर मुकदमेबाजी में फंस जाएगा। लोग घरेलू कामगार रखना ही बंद कर देंगे। ट्रेड यूनियनें हर घर को अदालत तक घसीटेंगी।” इसके साथ ही CJI ने उदाहरण देते हुए कहा कि कई उद्योगों में ट्रेड यूनियनों के हस्तक्षेप के बाद रोजगार के अवसर घटे हैं और घरेलू कामगारों के मामले में भी ऐसा ही हो सकता है।

मौलिक अधिकार की दलील पर कोर्ट ने जताई चिंता

हालांकि, सुनवाई के दौरान पीठ ने माना कि यह तर्क आकर्षक लगता है कि न्यूनतम वेतन के बिना घरेलू कामगारों के समानता, गैर-भेदभाव और निष्पक्ष रोजगार से जुड़े अधिकार (अनुच्छेद 14, 15, 16) प्रभावित होते हैं, लेकिन कोर्ट ने आगाह किया कि अति-सक्रिय ट्रेड यूनियनें इन कामगारों को और बदतर हालात में छोड़ सकते हैं। CJI ने कहा, “कृपया इसके परिणामों पर विचार करें। ट्रेड यूनियनें अंत में इन्हें छोड़ देंगी और इनके पास कहीं जाने की जगह नहीं बचेगी।”

एजेंसियों के शोषण पर भी सवाल

बार एंड बेंच के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू कामगारों को रोजगार देने वाली एजेंसियों की भूमिका पर भी चिंता जताई। मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट परिसर में भी पहले एजेंसियों के जरिए कामगार रखे गए थे। उन्होंने कहा, “हम एजेंसियों को 40,000 रुपये प्रति कर्मचारी देते थे, लेकिन उन गरीब लड़कियों को सिर्फ 19,000 रुपये मिलते थे। यही वजह है कि भरोसा टूटता है।” उन्होंने कहा कि कई आपराधिक घटनाएं भी तब सामने आती हैं, जब घरेलू कामगार एजेंसियों के माध्यम से रखे जाते हैं, न कि सीधे मानवीय संपर्क के आधार पर।

याचिका पर अदालत का रुख

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता जिस तरह का आदेश चाहते हैं, उसके लिए कानून में संशोधन जरूरी होगा और ऐसा निर्देश देना न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। अपने आदेश में कोर्ट ने कहा, “जब तक विधायिका से कानून बनाने को नहीं कहा जाता, तब तक कोई प्रभावी आदेश पारित नहीं किया जा सकता। ऐसा निर्देश देना इस अदालत के लिए उचित नहीं है।” हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्यों को घरेलू कामगारों की स्थिति पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और शोषण रोकने के लिए उपयुक्त तंत्र विकसित किया जाना चाहिए।

क्या थी याचिका

याचिका में मांग की गई थी कि घरेलू कामगारों को न्यूनतम वेतन का मौलिक अधिकार घोषित किया जाए और उन्हें न्यूनतम वेतन अधिनियम या वेज कोड, 2019 से बाहर रखने को असंवैधानिक ठहराया जाए। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि सिंगापुर जैसे देशों में घरेलू कामगारों के लिए छुट्टी और अन्य अधिकार अनिवार्य हैं। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि यह कहना सही नहीं है कि घरेलू कामगारों के लिए कोई कल्याणकारी कानून नहीं हैं। उन्होंने असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायालय आर्थिक नीतियों के मामलों में बेहद सतर्क रहता है।

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लेखक के बारे में

Pramod Praveen

प्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।

अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।

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