18 साल से क्यों अटका है गोपनीयता का मामला? EVM 'टोटलाइजर' पर SC ने केंद्र से मांगा जवाब, असली पेच कहां

लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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CJI सूर्यकांत,जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने कहा कि यह तरीका वोटरों की पहचान छिपाने में मददगार और अच्छा हो सकता है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक खास हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।

EVM supreme court
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि कानून में इसके लिए जगह क्यों नहीं बनाई जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि मतगणना के दौरान इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) के वोटों को पहले ही आपस में मिलाने (पूल करने) के लिए 'टोटलाइजर' (Totaliser) उपकरण का उपयोग क्यों नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने सरकार को इस संबंध में एक विशिष्ट हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है। दरअसल, पिछले 18 सालों से चुनाव आयोग यह मांग कर रहा है कि उसे इस बारीक जानकारी को छिपाने (यानी इस सुविधा को बंद करने) वाले उपकरण यानी 'टोटलाइजर' का इस्तेमाल करने का विकल्प दिया जाए।

बता दें कि मतगणना के दिन हर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का कंट्रोल यूनिट एक-एक करके खोला जाता है और उसके नतीजों को उस पोलिंग स्टेशन के नाम के साथ दर्ज किया जाता है जहाँ से वह मशीन आई है। जब तक आखिरी मशीन के नतीजे पढ़े जाते हैं, तब तक उम्मीदवार को न सिर्फ़ यह पता चल जाता है कि वह जीत रहा है या नहीं, बल्कि यह भी पता चल जाता है कि विधानसभा क्षेत्र के लगभग 200 इलाकों में से किन-किन इलाकों ने उसे वोट दिया और किस इलाके के लोगों ने वोट नहीं दिया। यह बारीक जानकारी 'चुनाव संचालन नियम, 1961' के तहत EVM वोटों की गिनती के तरीके का नतीजा है।

कानून में इसके लिए जगह क्यों नहीं?

देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि टोटलाइजर मशीन मतदाताओं की गोपनीयता बनाए रखने के लिए एक बेहतर जरिया हो सकता है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि ईवीएम के मामले में चुनाव संचालन नियम, 1961 के नियम 59ए (Rule 59A) जैसा प्रावधान क्यों नहीं लागू किया जा सकता, जो पहले मतपत्र (paper ballot) प्रणाली में मतगणना से पहले सभी मतों को आपस में मिलाने की अनुमति देता था। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि कानून में इसके लिए जगह क्यों नहीं बनाई जानी चाहिए।

क्या है टोटलाइजर और यह कैसे काम करता है?

चुनाव आयोग के दिसंबर 2016 के एक प्रस्ताव पत्र के अनुसार, टोटलाइजर एक ऐसा उपकरण है जिसे केबल के जरिए ईवीएम से जोड़ा जाता है। यह एक बार में 14 वोटिंग मशीनों में दर्ज किए गए वोटों को आपस में जोड़ देता है। इससे उम्मीदवारों को मिलने वाले कुल वोटों का पता तो चल जाता है, लेकिन किसी एक मशीन (यानी विशेष पोलिंग बूथ) का अलग से नतीजा सामने नहीं आता है। यानी टोटलाइज़र 14 अलग-अलग बूथों के लिए अलग-अलग टैली के बजाय 14 बूथों के लिए एक ही टैली देगा। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड ने 2007 में ही इस तकनीक का प्रदर्शन कर दिया था।

बूथ-वार मतगणना से मतदाताओं को खतरा?

मौजूदा चुनावी व्यवस्था में, प्रत्येक ईवीएम की गिनती अलग-अलग बूथ के अनुसार होती है। इससे राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को यह स्पष्ट रूप से पता चल जाता है कि किस क्षेत्र या पॉकेट के मतदाताओं ने उन्हें वोट दिया और किन्होंने नहीं। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त वी.एस. संपत ने भी 2013 में तत्कालीन कानून मंत्री को लिखे पत्र में चिंता जताई थी कि बूथ-वार गिनती से चुनाव के बाद मतदाताओं को उत्पीड़न, प्रतिशोध, डराने-धमकाने या भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में 'टोटलाइजर' इस खतरे को दूर करने का एक माध्यम बन सकता है।

पक्ष और विपक्ष में बंटे विचार

हालांकि, चुनाव आयोग लंबे समय से इस नियम को बदलने की मांग करता रहा है, लेकिन आयोग के अपने हालिया हलफनामे में कुछ व्यावहारिक आपत्तियां भी दर्ज कराई गई हैं। आयोग के सचिव बी.सी. पात्रा द्वारा 31 अगस्त को दायर हलफनामे के अनुसार, वोटों को मिलाने से सत्यापन की एक महत्वपूर्ण कड़ी टूट जाएगी। फिलहाल, मतदान के बाद फॉर्म 17सी के भाग I में दर्ज वोटों का मिलान मतगणना के दिन भाग II से करके गड़बड़ी का पता लगाया जाता है। अगर 14 मशीनों को एक साथ पूल कर दिया गया, तो किसी एक मशीन में तकनीकी या मानवीय त्रुटि को पकड़ना असंभव हो जाएगा।

राजनीतिक दलों में भी मतभेद

इसके अलावा, वर्ष 2016 में गठित मंत्रियों के एक समूह ने इस प्रस्ताव को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि बूथ-वार मतदान के आंकड़े उम्मीदवारों को यह समझने में मदद करते हैं कि किस क्षेत्र में विकास कार्यों की अधिक आवश्यकता है। दरअसल, राजनीतिक दलों में भी इसे लेकर मतभेद रहा है; देश के छह राष्ट्रीय दलों में से तीन और 29 राज्य स्तरीय दलों में से 18 ने इस विचार का विरोध किया था। मंगलवार को कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को इस मामले के कानूनी पहलुओं और बाधाओं की जांच करने को कहा है। साथ ही, चुनाव आयोग को सुझाव दिया है कि वे सरकार और संसद के पास इस मामले पर पुनर्विचार के लिए दोबारा जाएं क्योंकि नियमों में संशोधन का अधिकार अंततः केंद्र सरकार के पास है।

Pramod Praveen

लेखक के बारे में

Pramod Praveen

प्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।

अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।

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