रात 3 बजे सोना, सुबह 7 बजे उठना... साथी जज ने बताया कितना काम करते हैं CJI सूर्यकांत

Apr 21, 2026 08:42 am ISTAmit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, मदुरै
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मदुरै जिला न्यायालय में नए कोर्ट परिसर के उद्घाटन के दौरान CJI सूर्यकांत की 18 घंटे की वर्किंग रूटीन की चर्चा हुई। CJI ने निचली अदालतों को न्याय प्रणाली की जीवन रेखा बताया। विस्तार से जानें सुप्रीम कोर्ट के जजों ने क्या अहम बातें कहीं।

रात 3 बजे सोना, सुबह 7 बजे उठना... साथी जज ने बताया कितना काम करते हैं CJI सूर्यकांत

मदुरै जिला न्यायालय परिसर में 19 अप्रैल को अतिरिक्त अदालत भवनों और मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ के लिए एक नए गेस्ट हाउस का उद्घाटन किया गया। इस कार्यक्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत सहित सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय के कई वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल हुए। इस अवसर पर भारतीय न्याय प्रणाली, न्यायिक बुनियादी ढांचे और न्यायाधीशों की जिम्मेदारियों पर विस्तार से चर्चा की गई।

CJI की चुनौतीपूर्ण दिनचर्या: 17-18 घंटे का काम

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एमएम सुंदरेश ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की भूमिका की कठिनाइयों और उनकी कड़ी मेहनत का जिक्र किया। जस्टिस सुंदरेश ने तमिल में बोलते हुए बताया कि इस महान देश का मुख्य न्यायाधीश होना कोई आसान काम नहीं है। उन्होंने CJI सूर्यकांत की दिनचर्या का जिक्र करते हुए कहा कि वे दिन में 17 से 18 घंटे काम करते हैं, रात 3 बजे सोते हैं और सुबह 7 बजे फिर से उठ जाते हैं।

आम नागरिक के लिए जिला न्यायपालिका है जीवन रेखा

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, अपने संबोधन में CJI सूर्यकांत ने भारत की न्याय प्रणाली में ट्रायल (निचली) अदालतों की केंद्रीय भूमिका का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जहां सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय कानून को आकार देते हैं, वहीं जिला न्यायपालिका ही है जो इसे आम लोगों के दैनिक जीवन में वास्तविक अर्थ देती है। देश के अधिकांश नागरिकों के लिए, जिला अदालतें ही कानून के साथ संपर्क का पहला और अक्सर एकमात्र बिंदु होती हैं। इसलिए इन्हें न्याय वितरण प्रणाली की जीवन रेखा माना जाना चाहिए।

CJI ने जोर देकर कहा कि अदालतों तक भौतिक पहुंच बेहद जरूरी है। यदि कोई अदालत नागरिक की पहुंच से बहुत दूर है, तो यह न्याय से वास्तविक रूप में वंचित करने जैसा है। उन्होंने कहा कि एक अच्छी तरह से डिजाइन किया गया कोर्ट रूम अनुशासन को बढ़ावा देता है, दक्षता बढ़ाता है और न्याय प्रक्रिया को गरिमा प्रदान करता है। न्यायाधीशों के लिए काम करने की बेहतर स्थितियां सीधे तौर पर न्याय की गुणवत्ता को सुधारती हैं।

न्याय कोई विशेषाधिकार नहीं, एक 'संवैधानिक कर्तव्य' है

सुप्रीम कोर्ट के अन्य न्यायाधीशों ने भी न्यायपालिका के मूल सिद्धांतों पर अपने विचार रखे। जस्टिस जेके माहेश्वरी ने इस बात पर जोर दिया कि न्याय नागरिकों का कोई विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि यह सिस्टम का एक 'पवित्र ऋण' है जिसे चुकाना उसका संवैधानिक कर्तव्य है। न्याय हमेशा निष्पक्ष और बिना किसी डर या पक्षपात के होना चाहिए।

जस्टिस आर महादेवन ने न्यायिक बुनियादी ढांचे को गतिशील और समय के साथ बदलने वाला बताया। उन्होंने कहा कि मुकदमों की बढ़ती संख्या को नकारात्मक रूप से नहीं, बल्कि न्यायपालिका में जनता के विश्वास के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके शब्दों में- न्यायिक शक्ति कोई ताकत नहीं बल्कि एक संकल्प है; अन्याय के कारण छलकने वाले हर आंसू को पोंछने का संकल्प।

मदुरै के नए न्यायिक परिसर की मुख्य विशेषताएं

मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एसए धर्माधिकारी ने नए बुनियादी ढांचे के आंकड़े और उसके उद्देश्य साझा किए। 1813 में स्थापित मदुरै जिला न्यायपालिका देश की सबसे पुरानी न्यायपालिकाओं में से एक है। 166 करोड़ रुपये की लागत से 18 कोर्ट हॉल वाला यह नया परिसर बनाया गया है। यह आम आदमी की शिकायतों और त्वरित न्याय के संवैधानिक वादे के बीच एक मजबूत सेतु का काम करेगा। बाहर से आने वाले न्यायाधीशों के ठहरने और न्यायिक कार्यों को सुचारू रूप से चलाने के लिए मदुरै पीठ में 17.6 करोड़ रुपये की लागत से एक नया गेस्ट हाउस भी तैयार किया गया है।

Amit Kumar

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