देश का दुर्भाग्य है कि..., चुनाव से पहले अधिकारियों के ट्रांसफर मामले में बोले CJI सूर्यकांत

Apr 17, 2026 05:45 am ISTNisarg Dixit हिन्दुस्तान टीम
share

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को भारत के निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा पश्चिम बंगाल में चुनाव के मद्देनजर बड़े पैमाने पर प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के तबादला किए जाने के खिलाफ दाखिल याचिका को खारिज कर दिया।

देश का दुर्भाग्य है कि..., चुनाव से पहले अधिकारियों के ट्रांसफर मामले में बोले CJI सूर्यकांत

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को भारत के निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा पश्चिम बंगाल में चुनाव के मद्देनजर बड़े पैमाने पर प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के तबादला किए जाने के खिलाफ दाखिल याचिका को खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि चुनाव के दौरान अधिकारियों के तबादले कोई नई बात नहीं है बल्कि यह पिछले 20 से 25 सालों से लगातार ‌चलन में है। चुनाव की घोषणा के तुरंत बाद निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल में करीब 1000 से अधिक आईएएस, आईपीएस सहित राज्य सेवा के वरिष्ठ अधिकारियों का तबादला कर दिया था।

सरकार और आयोग में भरोसे की कमी

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और विपुल एम. पंचोली की पीठ ने एक बार फिर पश्चिम बंगाल सरकार और निर्वाचन आयोग के बीच भरोसे की कमी को रेखांकित किया। पीठ ने उच्च न्यायालय के उस फैसले में हस्तक्षेप करने के इनकार कर दिया, जिसमें निर्वाचन आयोग द्वारा राज्य में अधिकारियों के तबादले के खिलाफ दाखिल जनहित याचिका को खारिज कर दिया गया था।

उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दाखिल अपील को खारिज करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने भविष्य के लिए इस कानूनी सवाल को खुला रखा है कि ‘क्या निर्वाचन आयोग को चुनाव वाले राज्यों में प्रशासनिक अधिकारियों के बदलाव करने से पहले संबंधित राज्य से सलाह-मशविरा करना अनिवार्य है।

मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि ‘यह देश का दुर्भाग्य है कि अखिल भारतीय सेवाओं को बनाने का मकसद पूरा नहीं हो पा रहा है। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार और निर्वाचन आयोग के बीच भरोसे की बेहद कमी है और यही वजह है कि मतदाता सूची में विशेष गहन पुनरीक्षण के काम में सुप्रीम कोर्ट को न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त करना पड़ा। उन्होंने कहा कि ‘निर्वाचन आयोग को राज्य सरकार के अधिकारियों पर भरोसा नहीं है और राज्य को उन अधिकारियों पर भरोसा नहीं है जिन्हें वे (निर्वाचन आयोग) लेकर आए हैं।’

सुप्रीम कोर्ट क्या बोला

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 31 मार्च को निर्वाचन आयोग द्वारा राज्य में अधिकारियों के तबादले को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया था। उच्च न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ता अर्का कुमार नाग ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की थी। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने ‘ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी राज्य के मुख्य सचिव का तबादला इस तरह से किया गया हो। उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनावों की अधिसूचना जारी होने के बाद पश्चिम बंगाल में लगभग 1,100 अधिकारियों का तबादला रातों-रात कर दिया गया।

इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ‘यह कोई ऐसी बात नहीं है जो पहली बार हुई हो, या जो सिर्फ इसी राज्य में हुई हो।’ वरिष्ठ अधिवक्ता बनर्जी ने कहा कि इस तरह के तबादले करने से पहले आयोग को राज्य सरकार से सलाह-मशविरा करना चाहिए था। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने सवाल किया कि ‘जिन अधिकारियों का तबादला या पोस्टिंग की गई है, वे सभी पश्चिम बंगाल कैडर के हैं। ऐसा नहीं है कि दूसरे राज्यों के अधिकारियों को नियुक्त किया गया है। वे सभी पश्चिम बंगाल राज्य के सेवारत अधिकारी हैं। चाहे वे ‘ए’ पद पर हों या ‘बी’ पद पर, इससे क्या फर्क पड़ता है?’

इसके जवाब में वरिष्ठ अधिवक्ता बनर्जी ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल में मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और कई पुलिस अधीक्षकों समेत दूसरे सीनियर अधिकारियों को बदल दिया था। उन्होंने कहा कि इन बदलावों के बाद कालियाचक की घटना हुई। दूसरी जगहों पर भी कानून-व्यवस्था से जुड़ी कुछ दिक्कतें थीं और साथ ही यह भी कहा कि निगरानी रखने की शक्ति से विधायी शक्ति खत्म नहीं हो जाती।

सरकार से विमर्श की मांग

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि हम यह नहीं कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट अधिकारियों के तबादले पर रोक लगाए, बल्कि हम इस मामले में कानून से जुड़ा एक बहुत ही अहम सवाल उठा रहे हैं कि ‘क्या निर्वाचन आयोग को अधिकारियों के तबादले से पहले राज्य सरकार से विचार विमर्श नहीं करना चाहिए था? इस पर शीर्ष अदालत ने कहा कि हम इस कानूनी और महत्वपूर्ण सवाल को खुला रख रहे हैं और किसी सही मामले में फैसला करेंगे।

बाहर से आया पर्यवेक्षक हमेशा अच्चा होता है

मुख्य न्यायाधीश ने अधिकारियों के तबादले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि ‘चलिए, हम पश्चिम बंगाल के चुनावों को ध्यान में न रखें। राज्य के बाहर से आया कोई पर्यवेक्षक हमेशा ही सबसे अच्छा होता है।’ इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता बनर्जी ने पूछा कि इस बार पश्चिम बंगाल के चुनावों के दौरान इतने सारे सवाल क्यों उठाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि ‘पहले मैं चुनावों में व्यस्त रहता था। अब मैं अदालतों में व्यस्त हूं। इस बार ही ऐसा क्यों?’ इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि ‘पश्चिम बंगाल के चुनाव तो चुनावी मुकदमों के लिए एक खुला मैदान बन गए हैं।

Nisarg Dixit

लेखक के बारे में

Nisarg Dixit

निसर्ग दीक्षित न्यूजरूम में करीब एक दशक का अनुभव लिए निसर्ग दीक्षित शोर से ज़्यादा सार पर भरोसा करते हैं। पिछले 4 साल से वह लाइव हिनुस्तान में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं, जहां खबरों की योजना, लेखन, सत्यापन और प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं। इससे पहले दैनिक भास्कर और न्यूज़18 जैसे बड़े मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क तक की भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की, जिसने उनके काम करने के तरीके को व्यावहारिक और तथ्य आधारित बनाया। निसर्ग की खास रुचि खोजी रिपोर्टिंग, ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ स्टोरीज़ में है। वे जटिल मुद्दों को सरल भाषा और स्पष्ट तथ्यों के साथ प्रस्तुत करने में विश्वास रखते हैं। राजनीति और जांच पड़ताल से जुड़े विषयों पर उनकी मजबूत पकड़ है। निसर्ग लोकसभा चुनावों, कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और अहम घटनाओं को कवर कर चुके हैं। साथ ही संसदीय कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों को नियमित रूप से कवर करते हैं। गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी निसर्ग योगदान देते हैं।

और पढ़ें