बहस में किसी को बास्टर्ड कहना अपराध नहीं, सुप्रीम कोर्ट का फैसला; जज ने वजह भी बताई
अपूर्वा अरोड़ा बनाम राज्य दिल्ली सरकार के मामले में कोर्ट ने यह फैसला दिया था कि अश्लीलता का संबंध ऐसी सामग्री से है, जो यौन और कामुक विचार जगाती है। जबकि मौजूदा मामले में इस्तेमाल की गई गाली-गलौज या अपशब्दों का ऐसा कोई असर नहीं होता।

IPC यानी भारतीय दंड संहिता की धारा 294(बी) से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष न्यायालय का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति बहस के दौरान बास्टर्ड जैसे शब्द या गाली का इस्तेमाल करता है, तो इसे इस धारा के तहत अश्लीलता का अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने आरोपियों को राहत दी और दोषसिद्धि को रद्द कर दिया है।
हाई कोर्ट के आदेश को दी चुनौती
मद्रास हाई कोर्ट की तरफ से आरोपियों को धारा 294(बी) के तहत दोषी पाया गया था। उनपर बहस के दौरान बास्टर्ड शब्द के इस्तेमाल के आरोप लगे थे। इसके बाद दोनों ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जहां से उन्हें राहत भी मिली है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई
बेंच ने कहा है कि इस धारा के तहत अपराध साबित होने के लिए शब्दों में कोई यौन तत्व शामिल होना जरूरी है। कोर्ट ने उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया है।
बेंच ने कहा, 'हमारा मानना है कि केवल 'बास्टर्ड' शब्द का इस्तेमाल करना किसी व्यक्ति की कामुक इच्छाओं को जगाने के लिए काफी नहीं है। खासकर तब जब आज के दौर में बहस के दौरान ऐसे शब्दों का इस्तेमाल आम बात हो गई है। इसलिए, हमारा मानना है कि IPC की धारा 294(b) के तहत दोषियों को दी गई सजा सही नहीं है और इसे रद्द किया जाता है।'
पूरा मामला समझें
यह मामला एक पारिवारिक संपत्ति के विवाद से जुड़ा हुआ है। संपत्ति की बाउंड्री को लेकर विवाद चल रहा था। दोनों आरोपियों का कहना है कि धारा 294(b) के तहत अपराध नहीं हुआ है। जबकि, सरकारी वकील का कहना है कि बास्टर्ड शब्द का इस्तेमाल मृतक के लिए किया गया था। हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को नहीं सुव्कीर किया।
पीठ ने मामले में आईपीसी की धारा 294 बी के तहत सजा को रद्द कर दिया है, जबकि अन्य आरोपों में सजा को बहाल रखा है।
पुराने फैसले का जिक्र
पीठ ने शिवकुमार व अन्य की ओर से दाखिल अपीलों पर यह फैसला दिया है। पीठ ने कहा कि दंड संहिता में 'अश्लील' शब्द की कोई परिभाषा नहीं दी गई है। लेकिन अपूर्वा अरोड़ा बनाम राज्य दिल्ली सरकार के मामले में कोर्ट ने यह फैसला दिया था कि अश्लीलता का संबंध ऐसी सामग्री से है, जो यौन और कामुक विचार जगाती है। जबकि मौजूदा मामले में इस्तेमाल की गई गाली-गलौज या अपशब्दों का ऐसा कोई असर नहीं होता।
लेखक के बारे में
Nisarg Dixitनिसर्ग दीक्षित न्यूजरूम में करीब एक दशक का अनुभव लिए निसर्ग दीक्षित शोर से ज़्यादा सार पर भरोसा करते हैं। पिछले 4 साल से वह लाइव हिनुस्तान में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं, जहां खबरों की योजना, लेखन, सत्यापन और प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं। इससे पहले दैनिक भास्कर और न्यूज़18 जैसे बड़े मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क तक की भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की, जिसने उनके काम करने के तरीके को व्यावहारिक और तथ्य आधारित बनाया। निसर्ग की खास रुचि खोजी रिपोर्टिंग, ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ स्टोरीज़ में है। वे जटिल मुद्दों को सरल भाषा और स्पष्ट तथ्यों के साथ प्रस्तुत करने में विश्वास रखते हैं। राजनीति और जांच पड़ताल से जुड़े विषयों पर उनकी मजबूत पकड़ है। निसर्ग लोकसभा चुनावों, कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और अहम घटनाओं को कवर कर चुके हैं। साथ ही संसदीय कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों को नियमित रूप से कवर करते हैं। गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी निसर्ग योगदान देते हैं।
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