पश्चिमी देशों के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए बना था ब्रिक्स, 20 साल में पूरे हुए लक्ष्य?
जेएनयू के प्रोफेसर संजय पांडे का कहना है कि ब्रिक्स गैर पश्चिम देशों के समूह के रूप में उभरा है, लेकिन जो लक्ष्य उसने तय किए थे वे हासिल नहीं हो सके हैं। कुछ और विशेषज्ञों ने अपनी राय बताई है।

ब्रिक्स की स्थापना के 20 साल पूरे हो रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह अपने उद्देश्यों में सफल हुआ या नहीं। इस मामले पर विशेषज्ञों का कहना है कि ब्रिक्स ने पहचान तो बनाई है, लेकिन लक्ष्य से अब भी दूर है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ब्रिक्स को मजबूती, एकता के साथ निडर होकर आगे बढ़ने की जरूरत है। ब्रिक्स क्या है? गौरतलब है कि ब्रिक्स नाम इसके मूल सदस्य देशों के अंग्रेजी नाम के पहले अक्षरों को मिलाकर बना है। ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका इसके सदस्य देश थे। 2006 में ब्रिक्स ने औपचारिक मंच के रूप में काम करना शुरू किया। इसके बाद 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने से यह ब्रिक्स बन गया। अब कई और देश उसका हिस्सा है।
दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर सुधीर सिंह ने कहा कि शीत युद्ध के बाद दुनिया पर पश्चिम का खासकर अमेरिका का दबदबा कायम होता गया। जहां विकासशील और गरीब देशों की कोई सुनवाई नहीं थी। ऐसे में ब्रिक्स की स्थापना महत्वपूर्ण कदम था। इस मंच पर भारत, रूस, ब्राजील और चीन जैसे तेजी से आगे बढ़ते देश एकत्र हुए, जिसका परोक्ष मकसद पश्चिम के एकाधिकार को चुनौती देना था। सिंह कहते हैं कि इन 20 सालों में ब्रिक्स पश्चिम के वर्चस्व को तोड़ने में भले ही विफल रहा है, लेकिन एक मंच के रूप में अपनी पहचान कायम की है। दुनिया आज इस मंच की ओर देख रही है। इसलिए उसका लगातार विस्तार भी हो रहा है। आगे यह उम्मीद है कि वह पश्चिम के वर्चस्व को चुनौती दे सके।
वहीं जेएनयू के प्रोफेसर संजय पांडे का कहना है कि ब्रिक्स गैर पश्चिम देशों के समूह के रूप में उभरा है, लेकिन जो लक्ष्य उसने तय किए थे वे हासिल नहीं हो सके हैं। ब्रिक्स के प्रमुख लक्ष्यों में वैश्विक शासन में सुधार, संयुक्त राष्ट्र महासभा में बदलाव, आईएमएफ, विश्व बैंक में सुधार और वैश्विक वित्तीय शासन में बदलाव जैसे मुद्दे शामिल थे। इसके अलावा डॉलर पर निर्भरता कम करने में भी ब्रिक्स को अब तक बड़ी सफलता नहीं मिल सकी है।
अलग-अलग विचारधाराएं असल चुनौती
प्रो. सुधीर सिंह के अनुसार ब्रिक्स के समक्ष असल चुनौती यह है कि उसमें शामिल देशों की विचारधाराएं अलग-अलग हैं। ब्रिक्स के भीतर धनी और गरीब देशों के बीच एकता नहीं है। उनमें बहुत वैचारिक मतभेद हैं। मध्य एशिया में संघर्ष, रूस-यूक्रेन युद्ध, आपरेशन सिंदूर जैसे तमाम मुद्दों पर यह विरोधाभास दिखे हैं। सिंह कहते हैं कि ब्रिक्स देशों को इन मुद्दों पर एका बनानी होगी। प्रो. संजय पांडे कहते हैं कि ब्रिक्स के बहुत सारे देश आपस में उलझ हुए हैं। चाहे युद्ध हो या सीमा विवाद। रूस, ईरान, यूएई, सऊदी ये सब अलग-अलग दिशाओं में जाते दिखते हैं। भारत-चीन के संबंध इधर सुधरे हैं, लेकिन सीमा विवाद उनके बीच आज भी बड़ी चुनौती है।
आर्थिक विशेषज्ञ अंजन राय कहते हैं कि ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार बढ़ा है। इसके लिए कोशिशें भी जारी हैं, लेकिन सहयोग उस स्तर पर नहीं पहुंचा है कि ब्रिक्स के सभी देश मजबूत आर्थिक शक्ति के रूप में उभरें। चीन की कोशिश अपना व्यापार बढ़ाने तक सीमित है। सबसे ताकतवर देश होने के नाते वह तकनीक और निवेश के जरिये दूसरे सदस्य देशों को मजबूत कर सकता है, लेकिन ऐसा बहुत कुछ नहीं हुआ। दूसरी ओर, रूस की अर्थव्यवस्था उलझी हुई है। वह कहते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था प्रगति कर रही है, लेकिन अब भी तकनीक और निवेश के मामले में उसकी पश्चिम से निर्भरता खत्म नहीं हो पा रही है।
अंजन राय के अनुसार यदि इस ब्रिक्स सम्मेलन में सभी सदस्य देश डिजिटल भुगतान प्रणाली को अपनाने पर सहमत होते हैं, तो यह उनकी बड़ी राजनीतिक एवं कूटनीतिक जीत होगी। यह डॉलर के खिलाफ संदेश भी होगा, लेकिन इससे ब्रिक्स देशों के छोटे कारोबारियों के लिए व्यापार आसान होगा, क्योंकि वे स्थानीय मुद्रा में किफायती भुगतान कर सकेंगे।
भारत की रणनीति
2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाल रहे भारत ने पश्चिमी देशों के साथ व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया है। भारत इस मंच का उपयोग विकासशील देशों की आवाज बुलंद करने और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं (आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक) में निष्पक्ष प्रतिनिधित्व मांगने के लिए कर रहा है।


