BRICS बनाम G-7: कौन है ज्यादा मजबूत? पैसों से लेकर पावर तक जानिए सब कुछ
BRICS Summit Day 2: नई दिल्ली में जारी ब्रिक्स समिट 2026 का आज दूसरा दिन है। पहले दिन नई दिल्ली घोषणा पत्र पर सर्वसम्मति से मुहर लग चुकी है। ऐसे में ब्रिक्स और जी-7 के बीच के अंतर पर सभी देशों की नजर लगी हुई है।

BRICS vs G7 Which is stronger: नई दिल्ली में इस समय ब्रिक्स सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों का जमावड़ा लगा हुआ है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन से लेकर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग समेत कई देशों के प्रमुख भारत की राजधानी में मौजूद हैं। पूरी दुनिया की नजर इस वक्त भारत की राजधानी पर है। खासतौर पर पश्चिम देशों की, जिनको लेकर इस समिट के शुरू होने से पहले ही रूस के राष्ट्रपति ने तंज कस दिया था।
ब्रिक्स समिट दुनिया के लिए इसलिए भी खास है क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे संयुक्त राज्य का विरोधी मानते हैं, वहीं ब्रिक्स के नेता इसे एंटी वेस्ट नहीं बल्कि नॉन वेस्ट बताते हुए नजर आते हैं। हालांकि, अमेरिका ईरान के साथ युद्ध में उलझा हुआ है। ईरान ब्रिक्स का हिस्सा है। वहीं दूसरी ओर पश्चिमी देशों का एक बड़ा समूह रूस के खिलाफ युद्ध में यूक्रेन की मदद कर रहा है। रूस, ब्रिक्स का अहम हिस्सा है। ऐसे में न चाहते हुए भी बात पश्चिम देश बनाम ब्रिक्स पर आ ही जाती है। हालांकि, भारत पूरे जोर-शोर के साथ अपनी कूटनीति के दम पर दोनों पक्षों के साथ बेहतर रिश्ते बनाने में कामयाब रहा है।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने नई दिल्ली में ब्रिक्स बिजनेस फोरम में पश्चिमी देशों के समूह जी-7 पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स पश्चिमी देशों से ज्यादा वैश्विक जीडीपी में हिस्सेदारी देता है। ऐसे में पता नहीं वह क्यों अपने आपको जी-7 (ग्रेट-7 ) बुलाते हैं।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर पश्चिम केंद्रित दुनिया का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन जी-7 और ग्लोबल साउथ का प्रतिनिधित्व करने वाले ब्रिक्स के बीच में कितना अंतर है। आइए जानते हैं।
ब्रिक्स बनाम जी-7 देश
ब्रिक्स शुरुआत में केवल चार देशों का एक समूह था। लेकिन जरूरत के अनुसार उसने अपने आप को बदला और पहले दक्षिण अफ्रीका शामिल हुआ। इसके बाद अब यूएई, इथियोपिया, मिस्त्र, सऊदी अरब, ईरान, इंडोनेशिया इसके सदस्य हैं। दूसरी तरफ जी-7 है, जो अमेरिका केंद्रित दुनिया का प्रतिनिधित्व करता हुआ नजर आता है। जरूरत पड़ने पर जी-20 एक नया समूह बना दिया गया। लेकिन जी-7 में किसी और को शामिल नहीं किया गया है। बीच में कुछ वर्षों के लिए रूस को इसमें शामिल करके इसे जी-8 कहा गया था। लेकिन 2014 में क्रीमिया हमले के बाद रूस को इससे बाहर निकाल दिया गया। हालांकि, जी-7 भारत समेत कई देशों को बीच-बीच में मेहमान के तौर पर बुलाता रहता है।
ब्रिक्स और जी-7 में जनसंख्या और भूगोल का अंतर
जी-7 संगठन पूरी तरह से अमेरिका केंद्रित संगठन है। इसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी अमेरिका की ही है। दूसरी तरफ अगर ब्रिक्स को देखा जाए, तो चीन और भारत एक बड़ी आबादी के साथ और विस्तृत भूगोल के साथ इसके महत्व को और बड़ा बना देते हैं। 11 सदस्यों वाले यह संगठन दुनिया की करीब आधी से ज्यादा आबादी को अपना हिस्सेदार बनाता है। इसके अलावा ईरान और रूस के पेट्रोलियम से लेकर चीन के खनिज और भारत की युवा शक्ति, अफ्रीका के रिसोर्स इस संगठन को और भी ज्यादा मजबूत करते हैं।
ब्रिक्स की तुलना में जी-7 दुनिया की करीब 10 फीसदी आबादी का ही नेतृत्व करता है। अमेरिका और कनाडा के पास बहुतायत में रिसोर्स हैं। लेकिन जनसंख्या उस स्तर पर नहीं है। ऐसे में इन देशों का सबसे बड़ा मार्केट ग्लोबल साउथ ही है, जो कि ब्रिक्स के नेतृत्व में नजर आता है।
आर्थिक स्तर पर भी जी-7 से आगे नजर आता है ब्रिक्स
जी-7 में सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका है, तो वहीं दूसरी ओर इस मुद्दे पर ब्रिक्स का नेतृत्व चीन करता हुआ नजर आता है। लेकिन इन दोनों संगठनों में सबसे बड़ा अंतर परचेसिंग पावर पैरिटी (PPP) के आधार पर ब्रिक्स एक बड़ा हिस्सा अपने पास रखता है। बढ़ती आबादी और युवा शक्ति इसे एक मजबूत बाजार बनाती है।
हालांकि, जीडीपी मार्केट एक्सचेंज रेट के आधार पर नापने पर जी-7 आगे खड़ा हुआ दिखाई देता है। यह अमेरिका, जर्मनी, जापान और ब्रिटेन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों की बढ़ी हुई प्रति व्यक्ति आय और उनकी विकसित अर्थव्यवस्थाओं को प्रदर्शित करता है। लेकिन शायद इसीलिए ब्रिक्स को विकासशील अर्थव्यवस्थाएं और जी-7 को विकसित अर्थव्यवस्थाएं कहते हैं।
वैश्विक व्यापार में ब्रिक्स बनाम जी-7
इस सेक्टर में भी चीन ब्रिक्स का नेतृत्व करता हुआ नजर आता है। इस पर फार्मा में उसे जब भारत का साथ मिलता है। यह वैश्विक मार्केट के लिए एक बड़ी पावर बन जाता है। चीन को दुनिया की फैक्ट्री कहा जाता है। ऐसे में उसकी ग्लोबल गुड्स ट्रेड में स्थिति ब्रिक्स की अहमियत बढ़ा देती है। संगठन के दूसरे देश एनर्जी, एग्रीकल्चरल कमोडिटी, मिनरल्स और दूसरे रॉ मटीरियल के एक्सपोर्ट के जरिए इसके असर को और भी ज्यादा बढ़ाते हैं।
वहीं, G7 ग्लोबल ट्रेड और सर्विसेज, दोनों में एक बड़ी ताकत बना हुआ है। इसके सदस्यों की स्थिति फाइनेंस, टेक्नोलॉजी, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, फार्मास्यूटिकल्स और दूसरे हाई-वैल्यू सेक्टर में मजबूत है। इसलिए, यह तुलना दोनों गुटों की अलग-अलग ताकतों को दिखाती है।
साफतौर पर देखा जाए, तो जी-7 उस वैश्विक दुनिया का प्रतिनिधित्व करता है, जो अमेरिका और पश्चिमी देशों पर केंद्रित रही है। इसमें ग्लोबल साउथ के देशों को हिस्सेदारी नहीं मिली। दूसरी तरफ ब्रिक्स है, जो एशिया और अफ्रीका के उदय को प्रदर्शित करता है। विरोधियों का तर्क रहता है कि ब्रिक्स में शामिल देशों के आपस में बेहद तनाव है। ऐसे में जी-7 सदस्य देशों का इतिहास उठाकर भी देखा जा सकता है। हालांकि, नई दिल्ली की तरफ से यह साफ कर दिया गया है कि वह दुनिया को मल्टीपोलर चाहती है। यानी वह अमेरिका के नेतृत्व को खत्म करके चीन को नेतृत्व नहीं देने वाला। इसलिए चीन और रूस लंबे समय से डी-डॉलराइजेशन की बात करते आ रहे हैं। लेकिन भारत साफ कर चुका है कि उसका डॉलर की अहमियत को खत्म करने का कोई इरादा नहीं है।


