
BRICS के ‘वॉरगेम्स’ में क्यों नहीं फंसना चाहता भारत? संयुक्त अभ्यास से खुद को अलग कर क्या संदेश
चीन, रूस, ईरान और कुछ हद तक दक्षिण अफ्रीका के लिए ऐसे सैन्य अभ्यास अमेरिका के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत दिखाने का एक जरिया हैं, लेकिन भारत इस तरह के वॉरगेम्स से खुद को जोड़ना नहीं चाहता।
भारत, चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की अगुवाई वाले BRICS ब्लॉक के कई सदस्यों ने हाल ही में दक्षिण अफ्रीका के तट के पास जॉइंट नेवल ड्रिल शुरू किया है। इस अभ्यास का नेतृत्व चीन कर रहा है और रूस, ईरान और यूएई जैसे देश भी इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। जहां एक तरफ दक्षिण अफ्रीका ने इन अभ्यासों को दुनिया भर में बढ़ते समुद्री तनाव के लिए एक जरूरी जवाब बताया है, वहीं दूसरी तरफ भारत ने खुद को इस अभ्यास से अलग कर लिया है। इसके पीछे विशेषज्ञों ने कई वजहें बताई हैं। वहीं लैटिन अमेरिकी देश ब्राजील भी इसमें हिस्सा नहीं ले रहा है। यह इसीलिए अहम है क्योंकि ये दोनों ही देश ब्रिक्स के संस्थापक सदस्य रह चुके हैं।
बता दें कि यह ड्रिल शनिवार को शुरू हुई है। एक हफ्ते तक चलने वाले 'विल फॉर पीस 2026' अभ्यास का आयोजन साइमन टाउन में किया जा रहा है। चीन के रक्षा मंत्रालय ने एक बयान में कहा है कि इनमें बचाव के तरीकों के साथ-साथ समुद्री हमले के ऑपरेशंस से जुड़े तकनीक का भी आदान-प्रदान होगा।
2 संस्थापक देशों ने बनाई दूरी
ब्रिक्स के दो संस्थापक सदस्य देश, भारत और ब्राजील इस बार संयुक्त नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा नहीं ले रहे हैं। जहां ब्राजील इन अभ्यासों में केवल ऑब्जर्वर के तौर पर शामिल हुआ, वहीं भारत ने पूरी तरह दूरी बनाए रखी है। विशेषज्ञों के मुताबिक भारत के इस फैसले के पीछे अमेरिका के साथ रिश्तों को संतुलित रखने की रणनीति एक अहम वजह है। अल जजीरा ने नई दिल्ली स्थित ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन से जुड़े हर्ष पंत के हवाले से बताया कि भारत के लिए इस अभ्यास से बाहर रहना अमेरिका के साथ संतुलन साधने का तरीका है। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि ऐसे सैन्य अभ्यास ब्रिक्स के मूल मकसद है ही नहीं।
ब्रिक्स महज एक आर्थिक समूह
हर्ष पंत के मुताबिक ब्रिक्स कोई सैन्य गठबंधन नहीं है, बल्कि यह विकासशील देशों का ऐसा समूह है, जो आर्थिक सहयोग और व्यापार पर केंद्रित है और पश्चिमी देशों पर निर्भरता कम करने की कोशिश करता है। उन्होंने कहा कि चीन, रूस, ईरान और कुछ हद तक दक्षिण अफ्रीका के लिए ऐसे सैन्य अभ्यास अमेरिका के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत दिखाने का एक जरिया हैं, लेकिन भारत इस तरह के ‘वॉरगेम्स’ से खुद को जोड़ना नहीं चाहता।
अमेरिका भी है वजह
वहीं भारत माजूदा समय में अमेरिका के साथ अपने संबंध को भी संतुलित करना चाहता है। भारत और अमेरिका के रिश्तों में बीते कुछ समय से तनाव नजर आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने के बाद भारत पर दबाव भी बढ़ा है। रूस से तेल खरीदने का हवाला देते हुए ट्रंप ने भारतीय उत्पादों पर 50 फीसदी टैरिफ लगाया है। इतना ही नहीं, रिपोर्ट्स के मुताबिक टैरिफ को बढ़ाकर 500 फीसदी तक करने वाले बिल को भी मंजूरी दी गई है। ऐसे में भारत के लिए अमेरिका के साथ एक व्यापार समझौता अहम है। जाहिर है, इस तरह के अभ्यास, बातचीत में किसी भी तरह की प्रगति को पटरी से उतार सकते हैं।
दक्षिण अफ्रीका में पहले भी हो चुके हैं अभ्यास
दक्षिण अफ्रीका इससे पहले रूस और चीन के साथ ‘एक्सरसाइज मोसी’ के नाम से दो बार संयुक्त अभ्यास कर चुका है। पहला अभ्यास नवंबर 2019 में, वहीं दूसरा फरवरी 2023 में हुआ था। उस समय पश्चिमी देशों ने दक्षिण अफ्रीका की कड़ी आलोचना की थी। तीसरा अभ्यास 2025 के अंत में होना था, लेकिन यह जी-20 शिखर सम्मेलन की वजह से टल गया। अब ‘विल फॉर पीस 2026’ को अभ्यास उसी का तीसरा संस्करण माना जा रहा है।

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Jagriti Kumariजागृति को छोटी उम्र से ही खबरों की दुनिया ने इतना रोमांचित किया कि पत्रकारिता को ही करियर बना लिया। 2 साल पहले लाइव हिन्दुस्तान के साथ करियर की शुरुआत हुई। उससे पहले डिग्री-डिप्लोमा सब जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन में। भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली से पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा और संत जेवियर्स कॉलेज रांची से स्नातक के बाद से खबरें लिखने का सिलसिला जारी। खबरों को इस तरह से बताना जैसे कोई बेहद दिलचस्प किस्सा, जागृति की खासियत है। अंतर्राष्ट्रीय संबंध और अर्थव्यवस्था की खबरों में गहरी रुचि। लाइव हिन्दुस्तान में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान शानदार कवरेज के लिए इंस्टा अवॉर्ड जीता और अब बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर रोजाना कुछ नया सीखने की ललक के साथ आगे बढ़ रही हैं। इसके अलावा सिनेमा को समझने की जिज्ञासा है।
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